‘जिस प्रकार निरक्षर का कहना कि ‘सर्व भाषाओं के अक्षर…

‘जिस प्रकार निरक्षर का कहना कि ‘सर्व भाषाओं के अक्षर समान होते हैं’, उसका अज्ञान दर्शाता है, उसी प्रकार जो ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहते हैं, वह अपना अज्ञान दर्शाते हैं । ‘सर्वधर्मसमभाव’ कहना उसी सामान है जैसे कहना कि,‘सभी औषधियां, सभी कानून समान हैं ।’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

व्यक्तिगत जीवन के लिए अधिक पैसे मिलते हैं; इसलिए सभी…

‘व्यक्तिगत जीवन के लिए अधिक पैसे मिलते हैं; इसलिए सभी लोग आनंद से अधिक समय (ओवर टाइम) काम करते हैं; परंतु राष्ट्र और धर्म के लिए एक घंटा सेवा करने हेतु कोई तैयार नहीं होता !’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

ʻव्यवहार में अधिकाधिक कमाना होता है, तो साधना में सर्वस्व…

ʻव्यवहार में अधिकाधिक कमाना होता है, तो साधना में सर्वस्व का त्याग होता है; इसलिए व्यवहार के लोग दुःखी रहते हैं, तो साधक आनंदी रहते हैं ।ʼ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

भक्त को, साधना करनेवाले को ही ईश्वर बचाते हैं, यह…

भक्त को, साधना करनेवाले को ही ईश्वर बचाते हैं, यह ध्यान में रखकर अभी से तीव्र साधना करें, तो ही ईश्वर आपातकाल में बचाएंगेʼ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

ʻआपातकाल में बचने के लिए साधना करेंʼ

‘न मे भक्तः प्रणश्यति ।’ – श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्‍लोक ३१ अर्थ: मेरे भक्त का नाश नहीं होता । भक्त को, साधना करनेवाले को ही ईश्वर बचाते हैं, यह ध्यान में रखकर अभी से तीव्र साधना करें, तो ही ईश्वर आपातकाल में बचाएंगेʼ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

हिन्दुओ, राजनैतिक नहीं, अपितु धर्मसंस्थापना की विजय हेतु सीमोल्लंघन करें !

‘विजयादशमी का त्योहार शत्रु के राज्य में जाकर विजय हेतु सीमोल्लंघन करने की सनातन परंपरा बतानेवाला त्योहार है । यह दिन महिषासुर का वध करनेवाली श्री दुर्गादेवी और कौरवों का अकेले पराभव करनेवाले अज्ञातवासी अर्जुन का संस्मरण करने का दिन है । वर्तमान में विजयादशमी के दिन सीमोल्लंघन कर्मकांड के रूप में किया जाता है … Read more

भारत को पुनः ‘विश्वगुरु’ बनाने हेतु ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करें !

गुरुपूर्णिमा निमित्त परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी का संदेश ‘गुरुपूर्णिमा अर्थात गुरुतत्त्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन ! सनातन धर्म की ज्ञानपरंपरा गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही प्रवाही है । इसी परंपरा ने भारत को ‘विश्‍वगुरु’ बनाया है । भारत के अध्यात्मविश्‍व में आज भी महान गुरु-शिष्य परंपरा कार्यरत है । आज … Read more

‘हिन्दु’ इस नाम से परिचय देते समय मुझे अभिमान प्रतीत होता है !

पाश्चात्त्य सिद्धांतों के अनुसार पाश्चात्त्य मनुष्य स्वयं के संबंध में कहते समय प्रथम अपने शरीर को प्राधान्य देता है तथा तत्पश्चात् आत्मा को । अपने सिद्धांतों के अनुसार मनुष्य प्रथम आत्मा है तथा तत्पश्चात् उसे एक देह भी है । इन दो सिद्धांतों का परीक्षण करने के पश्चात् आप के ध्यान में यह बात आएगी … Read more