‘किसी व्यक्ति का प्रारब्ध परिवर्तित करना लगभग असंभव होता है । परिवर्तित करना ही हो, तो तीव्र साधना करनी पड़ती है । ऐसा होते हुए शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्तर पर प्रयत्न करने पर भारत का प्रारब्ध परिवर्तित करना क्या संभव है ? उसके लिए आध्यात्मिक स्तर के ही उपचार, अर्थात साधना का बल चाहिए ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
हिन्दुओ, ‘हिन्दू राष्ट्र मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे प्राप्त करके रहूंगा’, ऐसा निश्चय...
पूर्वकाल का परिवार की भांति एकत्र रहनेवाला समाज और आज का टुकड़े-टुकड़े हो चुका समाज...
हिन्दू धर्म में सहस्रों ग्रंथ होने का शास्त्र !
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के कार्य हेतु समष्टि साधना आवश्यक !