सजीव प्रतीत होनेवाले एवं चैतन्य की अनुभूति देनेवाले नागोठणे (जिला रायगढ) के सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्मस्थान !

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रायगढ जिले के पनवेल से वाहन द्वारा २ घंटों के (लगभग १०० कि.मी.) के अंतर पर शिवकालीन ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त ‘नागोठणे’ नामक गांव है । सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का जन्म आज से ८१ वर्षाें पूर्व वैशाख कृष्ण सप्तमी को यहां के वर्तक वाडा में हुआ । इस स्थान का आध्यात्मिक महत्त्व ध्यान में रख नागोठणे ग्रामपंचायत ने सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के सामनेवाले मार्ग का नामकरण ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले मार्ग’, किया है । उस निमित्त से इस स्थान के अलौकिक महत्त्व का वर्णन करते हुए बहुत आनंद हो रहा है !

नागोठणे में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का चैतन्यमय जन्मस्थान और उसके सामने का मार्ग

 

नागोठणे शहर का ऐतिहासिक महत्त्व !

श्रीमती रुपाली वर्तक

नागोठणे गांव से कुछ ही अंतर पर छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगढ है । पहले इस गांव में छत्रपति शिवाजी का सिक्के निर्माण करने का कारखाना था । इस गांव में अनेक तालाब हैं । इसलिए यहां छत्रपति शिवाजी महाराज के घोडों के तबेले थे । सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के निकट ही ऐतिहासिक श्रृंगार तालाब हैं । कहा जाता है कि यहां उस काल में हाथियों का श्रृंगार किया जाता था । जन्मस्थान के निकट ‘आंगर आळी’ है । कहते हैं कि ‘कान्होजी आंग्रे पहले यहां आते थे । ‘आंग्रे’ नामक अपभ्रंश होकर इसका नाम अब ‘आंगर आळी’ पड गया है ।

श्रृंगार तालाब

 

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के नागोठणे में जन्मस्थान के दर्शन करते समय श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ का भाव !

नागोठणे में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान को भावपूर्ण वंदन करती हुई श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान पर २.२.२०२३ को उनकी एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ के चरणकमल पडने से उस वास्तु के चैतन्य में वृद्धि !

श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ

 

१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के प्रति भाव

जन्मस्थान की वास्तु को श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ ने अत्यंत भावपूर्ण वंदन किया । संपूर्ण वास्तु एवं वास्तु के आसपास के परिसर का अवलोकन करते हुए उस विषय में वे अत्यंत जिज्ञासावश एवं बारकाई से समझकर ले रही थीं । वास्तु के दर्शन लेते समय वे बोलीं, ‘‘यहां सभी ओर सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी का अस्तित्व अनुभव हो रहा है । सभी ओर उनके स्पंदन हैं । यहां की मिट्टी, जल और वायु, सभी कुछ निराली है । बहुत सात्त्विक है । उन सभी में एक अनोखी सुगंध है । इन सभी का सूक्ष्म परीक्षण करेंगे ।’’ भविष्य में इस वास्तु के रूप में संपूर्ण विश्व को ‘अवतार का जन्मस्थान’ इस रूप में एक अनमोल धरोहर मिलनेवाली है ।

 

२. वास्तु की गत अनेक वर्ष देखरेख करनेवाले स्व. विजय वर्तक के प्रति कृतज्ञताभाव !

स्व. विजय (नाना) वर्तक

जन्मस्थान की वास्तु में पूर्व में हुआ संतों का आगमन और वास्तु की देखभाल करनेवाले स्व. विजय (नाना) वर्तक (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ममेरे भाई, मृत्यु के समय उनका आध्यात्मिक स्तर ६५ प्रतिशत था ।) के विषय में सुनते समय उनके मुखकमल पर अत्यंत कृतज्ञता के भाव उभर रहे थे । इस वास्तु की अच्छी प्रकार से देखरेख करना महत्त्वपूर्ण था । यह वास्तु और उसके आसपास का परिसर बडा होने से उस संभालना आसान नहीं । इस संदर्भ में श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ ने कहा, ‘‘नाना होने के कारण इस वास्तु की देखभाल करने के लिए अब तक न तो सनातन संस्था को कुछ करना पडा और न ही आपको (पुत्र श्री. अभय और पुत्रवधु श्रीमती रूपाली वर्तक को) ! उन्होंने सब अकेले ही संभाला । उस माध्यम से उनकी साधना हो गई ।’’

– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ.(१०.५.२०२३)

 

३. नागोठणे गांव एवं सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान पर साधक और समाज के व्यक्ति को हुई अनुभूति

२५ वर्षाें पूर्व नागोठणे स्थानक पर उतरने पर अत्यंत भारी मात्रा में सात्त्विकता के स्पंदन प्रतीत होते थे । अब लोकबस्ती बढने से वह उतनी अधिक मात्रा में तो नहीं प्रतीत होते, तब भी अन्य गांवों की तुलना में नागोठणे में आने पर अच्छा लगता है ।

१. सनातन के ६१ वें संत पू. अनंत पाटील (तात्या) जन्मस्थान की वास्तु में अनेक वर्षाें तक नियमित आकर नामजप करते थे । ‘पू. पाटीलतात्या ने इस वास्तु का लाभ लिया’, ऐसे उद्गार सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने पू. तात्या के संत होने पर कहे थे ।

२. ६८ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के साधक श्री. तुकाराम (बापू) लोंढे ने बताया, ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान आते समय नागोठणे गांव के निकट आते ही मेरा नामजप शुरू हो गया ।’

३. फोंडा, गोवा की साधिका कु. वैदेही शिंदे के सगे-संबंधियों के साथ नागोठणे के सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान पर आने पर उसकी बहुत भावजागृति हुई ।

४. हमारे यहां साफ-सफाई आदि की सेवा करनेवाली श्रीमती शोभाताई हमेशा कहती हैं, ‘मुझे भले ही कितना भी कष्ट हो रहा हो, तब भी यहां आने पर सब दूर हो जाता है और मुझे बहुत अच्छा लगता है । यहां परिश्रम का काम होते हुए भी मेरी पूरी थकान यहां आने पर चली जाती है ।’

 

४. श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ का उच्च भाव !

श्री. अभय विजय वर्तक

१. हम सभी साधक देवद आश्रम से नागोठणे जाने के लिए निकले, तब से ही श्रीसत्‌शक्ति बिंदाताई के मुखमंडल पर गुरुदेवजी के जन्मस्थान के प्रति अत्यंत उच्च भाव प्रतीत हो रहा था । उनकी आंखें अधिकाधिक सजल हो रही थीं ।’

२. नागोठणे के जन्मस्थान पर पहुंचने पर श्रीसत्‌शक्ति बिंदाताई उस वास्तु को धीरे से और भावपूर्ण स्पर्श कर रही थीं । मानो ‘वह वास्तु गुरुदेवजी का सगुण रूप ही हो ।’

३. मेरे पिता स्व. नाना वर्तक के पास अनेक मजदूर आते थे । श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदाताई ने उनकी कुशलक्षेम पूछी ।

‘गुरुदेवजी के जन्मस्थान की वास्तु काल के प्रवाह में जीर्ण हो जाने से उसका उत्तम पद्धति से संवर्धन करने के लिए क्या करना है’, इसका भी वे अध्ययन कर रही थीं । श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदाताई ने इस भेट के माध्यम से हमें बहुत आनंद दिया ।’

– श्री. अभय विजय वर्तक, सनातन संस्था. (१०.५.२०२३)

 

५. नागोठणे में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान में हुए बुद्धिअगम्य परिवर्तन

१.सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के कक्ष की फर्श का पीला रंग न्यून और सफेद रंग बहुत अधिक बढ गया है ।

२. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के वास्तु की और पूजाघर के देवी-देवताओं के चित्रों का रंग भी फीका हो गया है । ऐसा लगता है कि वे चित्र निर्गुण स्तर पर गए हैं ।

– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ. (१०.५.२०२३)

यहां प्रकाशित की गई अनुभूतियां ‘भाव वहां भगवान’ इस उक्तिनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । ऐसा कदापि नहीं है कि सभी को इसीप्रकार की अनुभूतियां आएंगी । – संपादक

 

६. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्म हुआ, उस कक्ष में रामनाथी आश्रम समान चैतन्य है ! – श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती.) अंजली गाडगीळ

 

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्म हुआ, वह चैतन्यमय कक्ष

कुछ वर्षाें पूर्व सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी की अन्य एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ भी नागोठणे आईं थीं । तब उन्होंने कहा था कि ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्म हुआ, उस कक्ष में सनातन के ‘रामनाथी आश्रम समान चैतन्य है ।’ उन्होंने ऐसा भी कहा था कि यह वास्तु श्री. नाना वर्तक ने संभाली, इसके लिए भी सतत कृतज्ञता लगनी चाहिए ।’

– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ. (१०.५.२०२३)

 

७. श्रीमती रूपाली अभय वर्तक को हुई अनुभूति

अ. नागोठणे के घर में जाने का आकर्षण

श्रीमती रुपाली वर्तक

नागोठणे में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी का जन्म जिस घर में हुआ, वहां बहू के रूप में आने का सौभाग्य मुझे मिला । विवाह के उपरांत पहले दस वर्ष वहां अधिक बार जाने का योग नहीं आया; परंतु जब-जब जाने का प्रसंग आता, तब वहां जाने का एक विशेष आकर्षण प्रतीत होता था । अब ध्यान में आता है कि वह आकर्षण यहां के सात्त्विक वातावरण के कारण था । प्रत्यक्ष में वहां शहर के घरों समान आधुनिक सुविधा न होते हुए भी ऐसा कभी नहीं लगा कि नागोठणे नहीं जाना चाहिए ! इसके पीछे भी इस वास्तु का चैतन्य ही कारणीभूत है !

आ. कितना भी परिश्रम करें, तब भी शारीरिक कष्ट न होना

वर्ष २०१४ के उपरांत वर्ष में ३-४ बार ३-४ दिनों के लिए इस पवित्र वास्तु में रहने का और उसे अनुभव करने का सौभाग्य मिला । गत २ वर्षाें में विविध कारणों से अनेक दिनों तक यहां वास्तव्य कर पाए । मैं सदैव अनुभव करती हूं कि यहां दिनभर भले ही कितना भी परिश्रम करें, तब भी शारीरिक कष्ट नहीं होता । यदि कभी-कभार बीमार पड भी गई, तो अत्यंत अल्प अवधि में स्वास्थ्य में सुधार हो जाता है ।

इ. वास्तु की सजीवता और चैतन्य की अनुभूति !

यहां वास्तु में एक प्रकार की सजीवता है । ऐसा अनुभव होता है कि यहां के कण-कण में अत्यधिक चैतन्य कूट-कूटकर भरा है । यहां कभी-कभी आनंद के स्पंदन भी प्रतीत होते हैं और उससे प्रसन्नता लगती है ।

ई. फूलों को भी ध्यान में आया जन्मस्थान का चैतन्य !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान के कक्ष में छायाचित्र को चढाए गए फूल अगले दिन सवेरे तक ताजे दिखाई देते हैं । इतने ताजे मानो अभी-अभी चढाए गए हों ! यह अनुभूति भी मैं अनेक वर्षाें से लेती आ रहा हूं ।

उ. वास्तु के चैतन्य के कारण बनाई गई रसोई में भी आती है अभूतपूर्व मिठास !

ऐसा अनेक बार अनुभव हुआ है कि इस वास्तु में बनाई गई रसोई भी बहुत स्वादिष्ट होती है । अनेक बार साधक, सगे-संबंधी कहते हैं कि भोजन बहुत अच्छा बना है । इससे यह स्पष्टरूप से ध्यान में आता है कि यहां पर चैतन्य ही चैतन्य है ।’

हे भगवन, ‘इस वास्तु का आध्यात्मिक लाभ लेने के लिए मैं सदा अल्प पडती हूं । यहां के चैतन्य का मैं अधिकाधिक लाभ ले पाऊं, इसलिए आप ही मुझसे भाव के स्तर पर प्रयत्न निरंतर करवा लीजिए’, यही आपके श्रीचरणों में प्रार्थना है ।’

– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ. (१०.५.२०२३)

 

८. जन्मस्थान के परसबाग की विशेषताएं !

इस वास्तु के परिसर का बाग चैतन्य की खान है । इसके आसपास के परिसर में मेरे ससुर श्री. विजय (नाना) वर्तक (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले के ममेरे भाई) ने कई पेड-पौधे लगाए थे । उनमें से कुछ अब भी हैं । अन्य स्थानों के पेड-पौधों और जन्मस्थान के परसबाग के पेड-पौधों में भेद तुरंत ही ध्यान में आता है । नाना अत्यंत प्रेम से इन वृक्षों को संभालते थे । वे दिनभर इस बाग में नामजप करते हुए सेवा करते थे ।

१. बाहर के कुछ वृक्षों के फूल, पत्ते छोटे आकार के, कृश अथवा फीके रंग के होते हैं । ‘जन्मस्थान के परसबाग में उसी जाति के पेड-पौधों के फूल, पत्ते अत्यंत ताजे, अधिक सुंदर, अधिक तेजस्वी और अधिक बडे आकार के होते हैं’, यह मैं अनेक वर्षाें से निरंतर अनुभव करता आया हूं ।

२. यहां के शोभा के पेड-पौधों (showplant) को देखकर भी अच्छा लगता है । अन्य स्थान की तुलना में जन्मस्थान के परसबाग में नए पेड-पौधे लगाना और उनके टिके रहने की मात्रा भी अधिक है ।

३. यहां के सभी पेड-पौधे बाहर की तुलना में अधिक हृष्ट-पुष्ट लगते हैं ।’

– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ. (१०.५.२०२३)

 

९. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के जन्मस्थान की वास्तु के विषय में समाज के लोगों का अपनापन !

श्री. राजा सोष्टे

‘श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ के आने पर पहले नाना के पास नियमित आनेवाले और प्रेम से उनकी देखभाल करनेवाले गांव के कुछ लोग भी आए थे । (नाना के पास गांव के लोगों का नियमित आना-जाना होने से मैं और मेरे पति भी निश्चिंत रहते थे । उनमें से एक थे श्री. राजा सोष्टे ! कुछ निर्माणकार्य व्यावसायिक सदैव जन्मस्थान के जगह के संबंध में पूछताछ करते थे; परंतु यह विषय नाना तक अधिक नहीं पहुंचने देते और स्वयं ही व्यावसायिकों को बताते, ‘‘यह वास्तु निर्माणकार्य व्यावसायिकों को नहीं देनी है । यहां आगे आश्रम बननेवाला है ।’’

यह प्रसंग श्रीसत्‌शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ को बतानेपर वे बोलीं, ‘‘इन सभी ने नाना को संभाला और नाना ने वास्तु की देखभाल की !’’ नाना का निधन हुए ५ माह हो गए, तब भी श्री. सोष्टे आज भी प्रतिदिन संध्याकाल के समय वास्तु के दर्शन लेने आते हैं ।’
– श्रीमती रूपाली अभय वर्तक, नागोठणे, जिला रायगढ. (१०.५.२०२३)

इस लेख में प्रकाशित अनुभूतियां ‘‘भाव वहां भगवान’’ इस उक्तिनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूति हैं । सभी को उसीप्रकार आएंगी, ऐसा नहीं है । – संपादक

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