सीताफल के औषधीय उपयोग
शरीर में पित्त का विस्फोट होकर बुखार आता हो, तो उसके लिए सीताफल खाएं; परंतु उसे सुबह के समय न खाएं ।
शरीर में पित्त का विस्फोट होकर बुखार आता हो, तो उसके लिए सीताफल खाएं; परंतु उसे सुबह के समय न खाएं ।
‘सर्दियों में ऋतु के अनुसार ठंड और सूखापन बढता है और उनका उचित प्रतिकार न करने से विविध विकार होते हैं । इनमें से अधिकांश विकारोंपर तेल का उचित उपयोग करना और सेंकना, इन चिकित्साओं का प्रभावशाली नियंत्रण किया जा सकता है ।
आजकल की बदली हुई जीवनपद्धति के कारण, विशेषरूप से घर अथवा कार्यालय में बैठकर काम करनेवाले व्यक्तियों में शरीर को धूप लगने की संभावना बहुत ही घट गई है ।
‘तुफानी चक्रवात, भूस्खलन, भूकंप, बाढ, तीसरा महायुद्ध आदि संकटकालीन स्थिति किसी भी क्षण उत्पन्न हो सकती है । ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ?, इसका ज्ञान न होने से सर्वसामान्य व्यक्ति चकरा जाता है और उसका मनोबल भी गिर जाता है ।
कुछ जिलों में अतिवृष्टि के कारण बाढस्थिति निर्माण हुई थी । जिससे सहस्रों नागरिकों के घर जलमय होकर जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया । इसलिए वहां के नागरिकों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया ।
पुणे के महान संत प.पू . आबा उपाध्येजी द्वारा व्याधि निवारण हेतु बताए गए कुछ उपाय
मां के गर्भ में पल रहे लगभग ६ से ८ मास के शिशु में प्राणों का प्रवेश होता है, ऐसा नहीं है, अपितु जिस क्षण गर्भाशय में शुक्राणु एवं स्त्रीबीज का संयोग होता है, उसी क्षण उसमें जीवात्मा प्रवेश करता है । गर्भ की वृद्धि होने के लिए भी चैतन्य ही कारणभूत होता है ।
गर्मी के विकारोंपर घरेलु औषधियां। गला, छाती अथवा पेट में जलन होना; मूत्रविसर्जन के समय जलन होना; शरीरपर फोडे आना; आंखें, हाथ अथवा पैरों का गर्म हो जाना; मासिक धर्म के समय अधिक रक्तस्राव होना तथा शौच में रक्त जाना।
विज्ञान के माध्यम से अग्निहोत्र का वातावरणपर क्या परिणाम होता है ?, इसके अध्ययन हेतु महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण हेतु यू.टी.एस्. (युनिवर्सल थर्मो स्कैन) उपकरण का उपयोग किया गया ।
सृष्टिरचना के समय साक्षात ईश्वर ने ही आयुर्वेद का निर्माण किया; इसलिए आयुर्वेद के सिद्धांत विश्व के आरंभ से आजतक अबाधित हैं । युगों-युगों से प्रतिवर्ष वही ऋतु आते हैं और आयुर्वेद द्वारा बताई गई ऋतुचर्या भी वही है ।
