साधिका के मन की भाव स्थिती
गोपियों के हाथ से कृष्ण मक्खन खाते हैं; उन्हें प्रत्यक्ष भगवान के साथ रहने के लिए मिलता है’,ऐसा प्रतीत होकर, स्वयं भी साधना करने का विचार मन में आना एवं श्रीकृष्ण की कृपा से प्रत्यक्ष उनका संसार करना
गोपियों के हाथ से कृष्ण मक्खन खाते हैं; उन्हें प्रत्यक्ष भगवान के साथ रहने के लिए मिलता है’,ऐसा प्रतीत होकर, स्वयं भी साधना करने का विचार मन में आना एवं श्रीकृष्ण की कृपा से प्रत्यक्ष उनका संसार करना
आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे ‘शिष्य’ कहते हैं । शिष्यत्व का महत्व यह है कि उसे देवऋण, ऋषिऋण, पितरऋण एवं समाजऋण चुकाने नहीं पडते ।
माता उमा ने ध्यान-धारणा करते समय योग्य आसन कौन सा ? यह प्रश्न पूछने पर भगवान शिवजी कहते हैं; ‘निश्चित स्थान पर दर्भासन पर बैठकर साधना करनी चाहिए अथवा स्वच्छ गुदडी की घडी बनाकर उस पर बैठना चाहिए ।’
ईश्वरप्राप्ति के लिए की गई साधना में सेवा का महत्त्व है । हमें सेवा इस प्रकार करनी चाहिए जिससे हमारे स्वभावदोष नष्ट हों, गुण बढें, सेवा का आनंद मिले और हमारी शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होगी
स्वतंत्रतापूर्वकाल में अफगानिस्तान और ब्रिटेन में युद्ध चल रहा था । इलाहाबाद के मार्टिन डेल नामक ब्रिटिश अधिकारी को भी युद्ध पर भेजा गया था । वह अपनी पत्नी को पत्र लिखता था ।
‘श्रीमद्भगवद्गीता से यह ज्ञान मिलता है कि ‘जीवन को कैसे जीना चाहिए और कैसे नहीं ।’ वह मार्ग से भटके लोगों का मार्गदर्शन करती है तथा दुःखी-पीडित लोगों को आश्वस्त करती है ।
अपेक्षारहित, अंतर्बाह्य शुद्ध, सभी कर्मों के आरंभ में ही कर्तापन का त्याग किया हुआ, ऐसा भक्त ईश्वर को प्रिय होता है ।
भक्तियोग किसे कहते हैं, भक्तियोग इस साधना मार्ग की उत्पत्ति, उसकी विशेषताएं आदि के विषय में जाने एवं भक्त बनने के लिए क्या करना चाहिए ?
आनंद अर्थात ज्ञानेंद्रियों, मन तथा बुद्धि का उपयोग किए बिना जीवात्मा अथवा शिवात्मा को होनेवाली अनुकूल संवेदना. जब चित्त सदैव संतुष्ट रहने लगे, तब उसमें जो वृत्ति उभरती है, उसे आनंद’ कहते हैं ।
प्राचीन काल से ही भारत और भारतीयों की पहचान आध्यात्मिक देश और व्यक्ति के रूप में रही है । देश को अध्यात्मशास्त्र भिन्न प्रकार से सिखाने की अथवा समझाने की आवश्यकता नहीं थी ।
