भक्तियोग

कई लोग भक्तियोगी होते हैं । वे, भगवान को भक्ति से प्रसन्न करते हैं । प्रस्तुत लेख में भक्तियोग किसे कहते हैं, इस साधना मार्ग की उत्पत्ति, उसकी विशेषताएं आदि के विषय में जानेंगे । भक्त बनने के लिए क्या करना चाहिए; इस विषय में लेख में संक्षेप में बताया गया है ।

 

१. भक्तियोग किसे कहते हैं ?

भगवान की भक्ति करना ही सुख और भगवान को भूलना दुख है ।

आध्यात्मिक उन्नति के लिए साधना करनेवाले ९० से ९५ प्रतिशत व्यक्ति भक्तिमार्ग से साधना करते हैं । अध्यात्म, भक्तियोग का सार है । इस मार्ग से भगवान की भक्ति करने में सुख और उन्हें भूलने से दुख होता है, इस बात को भक्तियोगी जानता है । इसलिए, वह सदैव आर्तभाव से भगवान की भक्ति में लगा रहता है । भक्त का नामजप अखंड होता रहता है; इसलिए उससे होनेवाला कर्म, अकर्म होता है, अर्थात ऐसे कर्मों का फल उसे नहीं मिलता, अर्थात वह कर्मों के बंधन में नहीं पडता ।

संदर्भ : सनातन-प्रकाशित ग्रंथ ‘ अध्यात्म का प्रास्ताविक विवेचन ‘

२. निर्मल हृदय में भक्ति का उदय होता है, जिससे जीव भक्त होता है

भगवान अतिशय शुद्ध और पवित्र हैं । निर्मल और प्रेमी भगवान से एकरूप होने के लिए भक्त को भी उनके समान निर्मल और प्रेमी होना चाहिए । सत्यवचनों से जीव का मन शीघ्र निर्मल होने लगता है । ऐसे निर्मल हृदय में भक्ति का उदय होकर जीव भक्त हो जाता है और परम सत्य की अनुभूति होने के लिए पात्र बनता है । सत्यकथन से मन का त्याग होता है और उसका मनोदेह अल्प अवधि में शुद्ध होता है । – ईश्‍वर (कुमारी मधुरा भोसले के माध्यम से, ५.७.२००६, सायं. ७)

३. ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर के साधक के आंतरिक चैतन्य से
वह कर्मकांड, उपासनाकांड और मानसपूजा अर्थात वास्तविक भक्तियोग का अधिकारी बनता है

ऐसे साधक में पूजाकर्म से प्रक्षेपित होनेवाली शक्तितरंगों को धारण करने की क्षमता आ जाती है । इससे उसका आंतरिक चैतन्य धीरे-धीरे बढने लगता है तथा उसे उपासना के लिए बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं रहती । इसके पश्‍चात, वह प्रत्यक्ष कर्मकांड से उपासनाकांड और मानसपूजा की ओर बढने लगता है । अर्थात, वह वास्तविक भक्तियोगी बनता है ।

 

४. भक्तिमार्ग, साधना का अगला चरण – परात्पर गुरु डॉ. आठवले

प.पू. डाॅ. आठवले

आजकल बहुसंख्य लोग साधना नहीं करते । साधना करनेवाले अनेक साधक नहीं जानते कि साधना में स्तर के अनुसार परिवर्तन होता रहता है । इसलिए, वे जन्मभर एक ही साधना करते हैं । किसी भी योगमार्ग से साधना करने पर, ऐसा ही होता है । यहां भक्तियोग का उदाहरण दिया है ।

 भक्तियोग में प्रगति के अनुसार साधक का आध्यात्मिक स्तर

 साधना का प्रकार साधकों का अनुभव और अनुभूति साधकों का आध्यात्मिक स्तर (प्रतिशत) (टिप्पणी १) साधना में इस स्तर तक पहुंचने के तत्त्व
 १. पूजापाठ
(सर्वसाधारण व्यक्ति)
१५-२० मिनट में पूजा समाप्त करना, पश्‍चात दिनभर भगवान को भूूल जाना । २० प्रतिशत परिवार के संस्कार
 २. भावपूर्ण पूजापाठ (साधक) बीच-बीच में ईश्‍वर का स्मरण होना ३० प्रतिशत भाव का महत्त्व समझना
 ३. मानसपूजा ईश्‍वर का अनेक बार स्मरण होना ४० प्रतिशत स्थूल से अधिक सूक्ष्म को श्रेष्ठ समझना
 ४. नामस्मरण नाम से अधिकाधिक एकरूप होना ५० प्रतिशत अनेक से एक में जाना महत्त्वपूर्ण है यह समझने पर, मानसपूजा के अनेक घटकों में (उदा. स्नान, गंध, अक्षत, फूल इत्यादि) से एक नामजप चुनना
 ५. भावपूर्ण नामस्मरण आनंद ७० प्रतिशत शब्दों से परे भगवान से एकरूप होने का आरंभ होना
 ६. नाम से एकरूप होना (मुक्ति / मोक्ष) शांति १०० प्रतिशत भगवान से एकरूप होना (अद्वैत)

टिप्पणी १ : सर्वसाधारण व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर २० प्रतिशत होता है और मोक्ष प्राप्त व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर १०० प्रतिशत होता है । इस आधार पर आध्यात्मिक स्तर बताया गया है ।

– परात्पर गुरु डॉ. आठवले

 

५. प्रधान गुण और भक्तियोग के अनुसार सहायक साधना

पू. (डॉ.) वसंत बाळाजी आठवले

अ. तमोगुण प्रधान व्यक्ति

ऐसे व्यक्ति आलसी होते हैं और नामजप नहीं करते हैं । ऐसे लोगों को अवतार की कहानियां, गुरुचरित्र, शिवलीलामृत आदि ऊंचे स्वर में पढने के लिए कहना चाहिए । वह समझ सके, ऐसी कहानियां अथवा कुछ भाग पढने के लिए कहना चाहिए । उसी प्रकार, उसे प्रतिदिन एक हजार बार नामजप अथवा एक बार विष्णुसहस्रनाम लिखने के लिए कहना चाहिए ।

आ. रजोगुण प्रधान व्यक्ति

ऐसे व्यक्ति नाम पर मन एकाग्र नहीं कर सकते । उन्हें विष्णुसहस्रनाम, गणेशसहस्रनाम अथवा पुरुषसूक्त आदि ऊंचे स्वर में पढना चाहिए अथवा श्रीमद्भगवदगीता का कोई अध्याय पढना चाहिए ।

इ. सत्त्वगुण प्रधान व्यक्ति

ऐसे व्यक्ति में एक स्थान पर मन को केंद्रित करने की क्षमता होती है । इसलिए, उसे कोई एक नाम अथवा गुरुमंत्र का जप करना चाहिए । सात्त्विक व्यक्ति में भी कभी-कभी रज-तम गुण बढ जाते हैं, उस समय नामस्मरण करना कठिन होता है । ऐसे समय नाम अथवा गुरुमंत्र ऊंचे स्वर में बोलना चाहिए । विष्णुसहस्रनाम पढना भी उचित है । सत्त्वगुण बढने पर, पहले की भांति नाम अथवा गुरुमंत्र का जप करना चाहिए ।

– (पू.) डॉ. वसंत बाळाजी आठवले (ई.स. १९८१)

 

६. भक्तों को व्यवहार के समय मन में निम्नांकित भाव रखने चाहिए

अ. समभाव

१. समान वय के लोगों से भाई अथवा बहन की भांति बात करनी चाहिए ।

२. बडे लोगों से उनके बच्चों जैसा व्यवहार करना चाहिए ।

३. छोटे बच्चों से उन्हीं जैसा व्यवहार करना चाहिए ।

आ. आत्मीयता

सबके साथ आत्मीयता रखनी चाहिए, अर्थात सब से अपने समान ही प्रेम करना चाहिए ।

इ. देवताभाव

अपने प्रिय देवता को सब में देखना चाहिए और सब से आदरपूर्वक व्यवहार करना चाहिए ।

ई. ईश्‍वरीय भाव

भक्त को सभी प्राणियों और वस्तुआें में ईश्‍वर की अनुभूति होती है । इसलिए, वह उस प्रकार का व्यवहार करता है ।

– (पू.य) डॉ. वसंत बाळाजी आठवले (ई.स. १९९०)

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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