कहां केवल अनुमान व्यक्त करनेवाला विज्ञान और कहां ज्योतिषशास्त्र !

‘कहां भविष्य में क्या होनेवाला है, इसके विषय में किसी एक व्यक्ति के संदर्भ में भी सभी जांच करने के उपरांत भी न बता पानेवाला तथा प्रकृति के संदर्भ में केवल अनुमान व्यक्त करनेवाला विज्ञान; और कहां केवल प्रकृति का ही नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति का भविष्य जन्मकुंडली तथा नाडी पट्टिकाओं एवं संहिताओं के आधार … Read more

वास्तविक बुद्धिमान व्यक्ति ‘ईश्वर नहीं हैं’, ऐसा कहेगा क्या ?

‘बुद्धिप्रमाणवादियो और विज्ञानवादियो, क्या कभी सोचा है कि वैज्ञानिकों को खोज करने की बुद्धि किसने दी ? वह बुद्धि ईश्वर ने दी है । ऐसे में ‘ईश्वर नहीं हैं’, ऐसा कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति कहेगा क्या ?’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

बुद्धिवादियों की अपेक्षा ‘मुझे दिखाई नहीं देता’, यह सत्य स्वीकार करनेवाला श्रेष्ठ !

‘मोतियाबिंदु से ग्रस्त व्यक्ति को बारीक अक्षर दिखाई नहीं देता । यदि कोई वह बारीक अक्षर पढ़कर सुनाए, तो मोतियाबिंदु से ग्रस्त व्यक्ति यह नहीं कहता कि, वहां अक्षर है, ऐसा झूठ कहकर आप भ्रमित कर रहे हैं । वह कहता है ‘मुझे बारीक अक्षर दिखाई नहीं देते ।’ चष्मा लगाने पर वह बारीक अक्षर … Read more

वास्तविक ‘दूरदर्शिता’ !

‘स्वयं के सुख के लिए दूसरों को दुःख देकर धन का संग्रह करना पाप है; परंतु भविष्यकाल को ध्यान में रखकर उसके लिए अपनी तैयारी उचित प्रकार से करने को ‘दूरदर्शिता’ कहते हैं ‌।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

संतों की श्रेष्ठता !

‘अपने पुत्र का आगे कैसे होगा ?’, यह चिंता उसके माता-पिता को होती है । इसके विपरीत ʻराष्ट्र के सभी लोगों को संत अपनी संतान मानते हैं । इस व्यापक भाव के कारण संत सदैव आनंदी रहते हैं ।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

विज्ञानवादियों का शोध बच्चों के खेल समान !

‘पांच ज्ञानेंद्रियों, मन और बुद्धि से परे ज्ञान देनेवाला सूक्ष्म कुछ है, यह ज्ञात न होने से विज्ञानवादियों का शोध बच्चों के खेल समान है !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

हिन्दुओं का कल्पनातीत सर्वधर्मसमभाव

‘भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्रीराम ने रावण को युद्ध में मारा ।उसी रावण के भारत में २-३ स्थानों पर ‘रावण महाराज’ के नाम से मंदिर हैं ! इसलिए हिन्दूओं को कोई सर्वधर्मसमभाव न सिखाए !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

आदिमानव बनने की ओर बढते आधुनिकतावादी !

‘जैसे-जैसे मानव की प्रगति होती है, वैसे-वैसे उसमें नम्रता ,सब कुछ पूछकर करने की वृत्ति इत्यादि गुण निर्माण होते हैं । आधुनिकतावादियों में पूछने की और सीखने की वृत्ति नहीं होती । इसके विपरीत ‘मुझे सब पता है । जो मुझे पता है, वही उचित है’, ऐसा अहंकार होता है । इसलिए वे आदिमानव बनने … Read more

मानव की प्रगति किसे कहते हैं यह भी विज्ञान को ज्ञात नहीं !

‘पश्चिम का विज्ञान कहता है, ‘आदिमानव से अभी तक मानव ने प्रगति की है ।’ वास्तव में मानव ने प्रगति नहीं की, अपितु वह उच्चतम अधोगति की ओर जा रहा है । सत्ययुग का मानव ईश्वर से एकरूप था । त्रेता और द्वापर युग में उसकी थोडी अधोगति होती गई । अब कलियुग के आरंभ … Read more

कहां विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और कहां संत !

‘अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉक्टर, अधिवक्ता, लेखापाल (अकाउंटेंट) इत्यादि में से कोई भी अपने क्षेत्र के प्रश्नों के उत्तर तत्काल नहीं बता सकते । ‘प्रश्न का अध्ययन कर,जांच कर, आगे उत्तर बताता हूं’, ऐसा वे कहते हैं । इसके विपरीत संत एक ही क्षण में किसी भी प्रश्न का कार्यकारण भाव तथा उपाय बताते हैं … Read more