पिंडदान करने का अध्यात्मशास्त्र

प्रस्तुत लेख में हम ‘श्राद्ध में भात के (पके हुए चावल के) पिंड का दान क्यों करें’ ‘गर्भवती पिंड न देखे, इसका कारण क्या है?’ ‘शुभकार्य के उपरांत पिंडदान वर्ज्य क्यों माना जाता है ?’ इत्यादि कृत्यों का अध्यात्मशास्त्र जानकर लेंगे ।

१. श्राद्ध में भात के (पके हुए चावल के) पिंड का दान क्यों करें ?

भात का गोला बनाकर उस पर संस्कार
करने से उसका रूपांतर पिंड में होने के कारण लिंगदेह के लिए
 वायुमंडल में आकर मंत्रोच्चारण से आगे का मार्गक्रमण करना सुगम होना

‘भात बनाने के लिए प्रयुक्त चावल सर्वसमावेशक हैं । चावल का जब भात पकाया जाता है, तब उसमें विद्यमान रजोगुण बढता है । इस प्रक्रिया में चावल में पृथ्वीतत्त्व की मात्रा न्यून होकर आपतत्त्व की मात्रा बढती है । आपतत्त्व के प्रभाववश भात से प्रक्षेपित सूक्ष्म-वायु में आद्र्रता की मात्रा अधिक होती है । दसवें दिन जब मृतदेह का आवाहन कर भात का गोला बना कर उस पर संस्कार किए जाते हैं, तब उसका रूपांतर पिंड में होता है । अर्थात भात के सर्व ओर निर्मित आद्र्तादर्शक प्रभामंडल की ओर लिंगदेह से प्रक्षेपित रज-तमात्मक तरंगों का संस्करण होता है । इसके फलस्वरूप भात की यह प्रतिकृति लिंगदेह के पिंडसमान अर्थात प्रकृतिसमान प्रतीत होती है; इसलिए उसे ‘भात का पिंड’ कहा जाता है । इस रजोगुणी पिंड की वातावरण-कक्षा में, लिंगदेह के लिए प्रवेश करना सुगम होता है । अतः मंत्रोच्चारण से संचारित वायुमंडल का उसे लाभ होकर सूक्ष्म बल प्राप्त होता है, जिससे आगे का मार्गक्रमण सुगम होता है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से

 

२. पिंड के लिए सर्व प्रकार के अन्न का
थोडा-थोडा भाग लेने का अध्यात्मशास्त्रीय आधार क्या है ?

सभी अन्नपदार्थों का भाग पिंड के
माध्यम से प्राप्त होने पर लिंगदेह की आसक्ति संबंधी भावना
न्यून होने में सहायता होकर लिंगदेह के भूलोक में अटके रहने की आशंका अल्प होना

‘पिंड लिंगदेह का  प्रतिनिधित्व करता है । जब लिंगदेह स्थूल देह से विलग होता है, वह वायुमंडल में मन के संस्कारों के अनेक आवरणसहित बाहर आता है । आसक्तिदर्शक घटकों में अन्न का सहभाग सर्वाधिक होता है । प्रत्येक जीव की अन्न संबंधी रुचि-अरुचि भिन्न होती है । इन सभी रुचियों के निदर्शक के रूप में मीठा, तीखा, ऐसे प्रत्येक स्वाद के पदार्थों से युक्त अन्न का थोडा-थोडा अंश लेकर उसकी सहायता से पिंड बनाकर श्राद्धस्थल पर रखा जाता है । फलस्वरूप श्राद्ध के मंत्रोच्चारण की संकल्प-विधि की पिंडों पर की गई संस्करणात्मक क्रिया के कारण विशिष्ट अन्नपदार्थों की सूक्ष्म-वायु सक्रिय होकर बाह्य वायुमंडल में प्रक्षेपित होती है । श्राद्ध की संकल्प-विधि के फलस्वरूप श्राद्धस्थल पर आए लिंगदेहों को विशिष्ट अन्न का हविर्भाग सूक्ष्म-वायु के माध्यम से मिलना संभव होता है, जिससे लिंगदेह संतुष्ट होते हैं । उन विशिष्ट पदार्थों का अंश मिलने से लिंगदेह की आसक्ति संबंधी भावना न्यून होने में सहायता होती है और लिंगदेह के भूलोक में अटकने की आशंका घट जाती है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से

 

३. पिंड मधु के साथ क्यों दें ?

मधु में पितरतरंगों को आकृष्ट और पिंड
में ही बद्ध करने की क्षमता होने के कारण पिंड मधु के साथ दिया जाना

मधु-रस से प्रक्षेपित आह्लाददायक और ठंंडक उत्पन्न करनेवाली आपतत्त्वयुक्त तरंगों की ओर पितरतरंगें अल्पावधि में आकृष्ट होकर पिंड में ही बद्ध होती हैं । मधु में पृथ्वी और आप तत्त्वों से संबंधित पितरतरंगों को अपनी मधुरतायुक्त सुगंध से प्रसन्न करने की एवं उन्हें पिंड में ही बद्ध करने की क्षमता होती है । अतः पिंड मधु के साथ देने से वह दीर्घकाल तक पितर-तरंगों से संचारित रहता है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से

 

४. पितृपक्ष में किए जानेवाले श्राद्ध के धर्मपिंड से माता और पिता
दोनों के कुल के, ब्रह्मदेव से लेकर स्वयं की पीढी तक के सर्व पितरों को  कैसे लाभ होता है ?

‘ब्रह्मदेव इच्छाशक्ति से संबंधित होते हैं । अतः स्वयं को ब्रह्मात्मक इच्छा-ऊर्जा का अंश समझकर आवाहन करने से ब्रह्मांड की इच्छातरंगें कार्यरत होती हैं । इससे अपने कुल से संबंधित, तथा लेन-देन से संबंधित सर्व लिंगदेहों को इस आवाहन द्वारा किए गए श्राद्धकर्म से गति प्राप्त होती है और हमारा साधनामार्ग सुलभ होता है । इसलिए ब्रह्मा की  इच्छाशक्ति के बल पर लिंगदेहों का आवाहन करना महत्त्वपूर्ण होता है । विभिन्न स्तरों पर अटके लिंगदेह अनेक बार वासनाओं से, अर्थात विविध प्रकार की इच्छा-आकांक्षाओं से संबंधित होते हैं । उसी प्रकार इन सर्व भाव-भावनाओं की मूल निर्मिति ही ब्रह्मदेव की इच्छाशक्ति से हुई है । अतः मंत्रों में ‘ब्रह्मदेव से’ ऐसा उल्लेख किया है । ब्रह्मदेव की इच्छाशक्ति सूक्ष्म है, इसलिए उसकी व्याप्ति तथा प्रभावकारिता भी अधिक होती है । अतः इस इच्छाशक्ति के बल पर किए एक पिंडदान से सभी को लाभ होने में सहायता होती है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से

 

५. किसी वासनात्मक लिंगदेह का गर्भ की ओर
आकृष्ट होकर गर्भ के माध्यम से जन्म लेने की संभावना होने के कारण गर्भवती पिंड न देखे 

‘गर्भ अत्यंत संस्कारक्षम, संवेदनशील और वातावरण की किसी भी प्रकार की तरंगों को आर्किषत करता है । इसलिए यथासंभव गर्भवती स्त्री को रज-तमात्मक वायुमंडल में न ले जाएं । उसी प्रकार वह कोई भी रज-तमात्मक कृत्य न करे; क्योंकि इसका परिणाम गर्भ पर होता है तथा उस पर रज-तमात्मक संस्कार होने की संभावना होती है । गर्भवती द्वारा पिंड देखने का अर्थ है, रज-तमात्मक वातावरण में आना । मृत्युपरांत की विधियों में किए जानेवाले आवाहन में पिंड के निकट विशिष्ट लिंगदेह आती हैं । कोई वासनात्मक लिंगदेह गर्भ की ओर आकर्षित होकर गर्भ के माध्यम से जन्म लेकर सभी को कष्ट दे सकती है । इस कारण उस लिंगदेह के भी पुनः भूलोक में अटकने की संभावना होती है, तथा गर्भवती और गर्भ, इन दोनों को ही कष्ट की संभावना होती है । इसलिए यथासंभव गर्भवती का रज-तमात्मक वातावरण से दूर रहना श्रेयस्कर है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से

 

६. शुभकार्य के उपरांत पिंडदान वर्जित क्यों माना जाता है ?

‘पिंड प्रत्यक्ष सगुण रूप में लिंगदेह का प्रतिनिधित्व करता है । शुभकार्य में देवताओं को उद्देशित कर सभी आवाहनात्मक विधियां की जाती हैं, जिससे वास्तु भी चैतन्य से पवित्र हो जाती है । श्राद्धविधि में पिंड को उद्देशित कर पितरों के विषय में सर्व विधियां की जाती हैं । इसलिए जहां पिंड स्थापित किए जाते हैं, वहां थोडी-बहुत मात्रा में रज-तमयुक्त तरंगों का संक्रमण होता है । इसलिए पिंड के माध्यम से प्रत्यक्ष लिंगदेह को स्थान न देकर श्राद्ध की सर्व विधियां संकल्प से पूर्ण की जाती हैं एवं शुभकार्य के फलस्वरूप निर्मित सात्विक तरंगों को स्थिर करने का प्रयत्न किया जाता है । उसी प्रकार शुभकार्य के उपरांत पिंडसहित श्राद्ध करने से, पितर एवं उन्हें कष्ट देनेवाली अन्य अनिष्ट योनियों का वायुमंडल में प्रवेश होने की संभावना बढती है । इसलिए श्राद्धकर्म द्वारा निर्मित कष्टदायक स्पंदनों में न्यूनता लाने के लिए शुभकार्य के उपरांत पिंडदान वर्जित माना जाता है तथा श्राद्ध संपन्न होने के उपरांत भी प्रत्येक बार दत्तात्रेय देवता से यह प्रार्थना की जाती है कि ‘इस वास्तु में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों का निर्दालन हो ।’ और यही इष्ट है ।

 – एक विद्वान श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळ के माध्यम से |

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ – ‘श्राद्ध (भाग २) श्राद्धविधि का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’

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