अन्य पंथीय व्यक्ति को हिन्दू धर्म में प्रवेश का अध्यात्मशास्त्र !

एक जिज्ञासु का प्रश्‍न : मैंने अन्य पंथ की लडकी से विवाह किया है । इसलिए हमारे परिजन हमारा विरोध कर रहे हैं । हमने अपने घरवालों को बहुत समझाने का प्रयत्न किया; परंतु घर के सदस्य पत्नी और उसके स्पर्शित अन्न को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं । मेरे परिजन हिन्दू रीति और जातिव्यवस्था को मानते हैं ।

हमारे यहां के हिन्दू धर्म के एक ज्ञानी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने मेरे परिजनों से कहा, दूसरे पंथ में विवाह करना पाप है । आप लोग हमसे न बोलें और कोई संबंध भी न रखें । धर्म मनुष्य-निर्मित नहीं है, इसे भगवान ने बनाया है । व्यक्ति को जन्म से ही धर्म मिला होता है । वह प्रयत्न कर भी अपना धर्म नहीं बदल सकता । यह कहकर उसने लडकी को नाममंत्र नहीं दिया। लडकी हिन्दू धर्म स्वीकारने के लिए तैयार है; परंतु उस प्रतिष्ठित व्यक्ति के कहने में आकर मेरे माता-पिता मेरी बात सुनने को तैयार नहीं हैं । कृपया आप इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करें । – एक जिज्ञासु, कोलकाता, बंगाल. (१३.१.२०१७)

उत्तर

१. धर्म की व्याख्या

धर्म वह है –

अ. जो हमें अंतिम सत्य से परिचित कराए,

आ. जो मनुष्य को भगवान की ओर जाने का मार्ग दिखाए,

इ. जो मनुष्य को जीवन में आनंदपूर्वक जीना सिखाए,

ई. जो जीवन को सार्थक करने का मार्ग दिखाए,

उ. जिसका आरंभ-अंत नहीं, अर्थात जो शाश्‍वत सत्य है,

ऊ. जो मनुष्य और परमेश्‍वर के बीच सीढी समान कार्य करे,

ए. जो व्यवहार में उत्तम आचरण करना सिखाए,

ऐ. जो जीवन का मुख्य उद्देश्य बताए और

ओ. मनुष्य की व्यावहारिक और आध्यात्मिक उन्नति हेतु बनाए गए लिखित और अलिखित नियम भी धर्म हैं ।

२. सनातन हिन्दू धर्म का स्वरूप

सृष्टि की उत्पत्ति के पश्‍चात, आदर्श जीवन जीने की पद्धति को धर्म कहा गया है । ऋषियों को जब बोध हुआ कि धर्म ईश्‍वर-निर्मित होने से चिरंतन है, तब वे उसे सनातन धर्म कहने लगे । कालांतर में, सनातन हिन्दू धर्म यह नाम प्रचलित हुआ ।

पृथ्वी पर केवल एकमात्र धर्म ऐसा है, जो परमेश्‍वर-निर्मित है और वह है, सनातन हिन्दू धर्म । परमेश्‍वरप्राप्ति के अन्य धर्म, धर्म नहीं, पंथ हैं । उन्हें शास्त्रीय आधार अल्प है । इसलिए इनका आरंभ, स्थिति और अंत होता है ।

३. पंथ

विशिष्ट विचारों की अपरिपक्व अवस्था को पंथ कहते हैं । पंथों को अपरिपक्व इसलिए कहा गया है, क्योंकि उनमें सनातन धर्म के अनंत सूक्ष्म मूल्यों का अत्यधिक अभाव है ।

४. पंथों की उत्पत्ति और उनके अनुयायी बनने के कारण

४ अ. धर्मनिंदा

आज से पहले मनुष्य के लाखों जन्म हो चुके हैं । तत्पश्‍चात व्यक्ति से साधना अल्प होने लगी । उसने अहंकारवश कुछ जन्मों में स्वधर्म की निंदा की । इसका उसे पाप लगा । इस पाप के कारण संबंधित व्यक्ति के मन में अगले जन्म में अन्य पंथ बनाने का अथवा उसमें जन्म लेने का विचार आया । ऐसे विचारों से, वह मूल धर्म से दूर होने लगा।

४ आ. धर्महानि

कुछ जन्मों में व्यक्ति से हुए अनुचित आचरण से धर्म की बहुत हानि हुई होती है । इस पाप के कारण उसका अगला जन्म हिन्दू धर्म में नहीं, दूसरे पंथ में होता है ।

४ इ. अधर्माचरण

कुछ जन्मों में व्यक्ति जब धर्म की आड में धर्मविरुद्ध आचरण करता है, तब उसका जन्म अन्य पंथ में होता है ।

५. पंथों की उत्पत्ति से हानि 

मनुष्य को आनंदपूर्वक व्यावहारिक जीवन जीने का मार्ग मिले और अंततः ईश्‍वर की प्राप्ति हो, इसके लिए सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई है । अन्य पंथी, हिन्दू धर्म पर विविध प्रकार से आक्रमण कर, उसे अपने अधीन करने लगे । इससे बहुसंख्य समाज मूल धर्म से दूर होता गया । इसी प्रकार ये पंथ मानव-निर्मित होने से उनके अधिकतर विचार संकीर्ण और घातक होते हैं । इससे इन पंथीयों का मन अशुद्ध होने लगा ।

६. अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में प्रवेश
करने की इच्छा होने का शास्त्रीय कारण

    व्यक्ति को, पिछले जन्मों के पाप के कारण, विशिष्ट पंथ में जन्म लेने की इच्छा होती है । जब वह पिछले जन्मों के पाप भोगकर समाप्त करता है, तब उसे हिन्दू धर्म में, अर्थात स्वधर्म में लौटने की इच्छा होती है । ऐसा होना, प्रारब्ध अनुकूल होने का लक्षण है ।

७. हिन्दू धर्म में प्रवेश से पहले शुद्धीकरण के धार्मिक कृत्यों का महत्त्व

७ अ. अन्य पंथों की अनुचित विचारधारा से
चित्त की हुई मलिनता, हिन्दू धर्म के शुद्धीकरण कृत्यों से दूर होना

प्रत्येक जीव परमेश्‍वर-निर्मित होता है, इसलिए मूलतः शुद्ध ही रहता है । परंतु अन्य पंथों की अनुचित विचारधारा से उसका चित्त मलिन होता है । इस मलिनता से, अन्य पंथ में प्रवेश करनेवाले जीव में दोष उत्पन्न हुआ रहता है । इसके अतिरिक्त, उसे स्वधर्म छोडकर अन्य पंथ में जाने का पाप भी लगता है । शुद्धीकरण के धार्मिक कृत्यों से यह दोष दूर होता है और संबंधित जीव शुद्ध होता है । यह शुद्ध जीव हिन्दू धर्म में प्रवेश करनेयोग्य होता है ।

८. हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठता

८ अ. हिन्दू धर्मशास्त्र से भगवान की प्रीति और क्षमाशीलता अभिव्यक्त होना

भगवान में प्रीति और क्षमाशीलता, ये दो गुण भी हैं । तो यह कैसे हो सकता है कि उसके बनाए हुए धर्म में ये गुण न हों ? भगवान के इन गुणों के कारण ही हिन्दू धर्म ने मनुष्य से जाने-अनजाने हुए अपराधों के लिए अनेक प्रायश्‍चित कर्म बताए हैं । प्रायश्‍चित कर्म करने से व्यक्ति दोषमुक्त होता है । ऐसे व्यक्ति को भगवान क्षमा करते हैं, उसपर कृपा करते हैं और आगे का उचित मार्ग दिखाते हैं ।

९. अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में प्रवेश की इच्छा
करनेवाले व्यक्ति की सहायता करना, सबसे बडा धर्मकार्य

    स्वधर्म में लौटने की इच्छा होना, अर्थात व्यक्ति को जीवन का खरा मार्ग मिलना । धार्मिक कृत्यों से शुद्ध हुआ व्यक्ति जब स्वधर्म में प्रवेश करता है, तब देवता उसे आशीर्वाद देते हैं और इस कार्य में सहायता करनेवालों को पुण्य मिलता है । हिन्दू धर्म की उत्पत्ति का मूल उद्देश्य ही समाज का परम हित है, जो इन कृत्यों से साध्य होनेवाला रहता है ।

१०. हिन्दू धर्म में कट्टर और एकांगी विचारों को स्थान नहीं

ऋषियों ने विविध धर्मग्रंथ लिखे हैं । उनके इन प्रयत्नों से पृथ्वी पर सनातन धर्म की स्थापना हुई । धर्मग्रंथों में, भगवान को अपेक्षित शास्त्र विस्तार से बताया गया है; परंतु ऐसा करते समय, इसमें अमानवीय कट्टरता को स्थान नहीं दिया गया । धर्मग्रंथ का प्रत्येक नियम मानव की क्षमता समझकर ही बनाया गया है ।

हिन्दू धर्मशास्त्र, भगवान का मनुष्य से प्रेम और क्षमाशीलता गुणों का मूर्तरूप है । शास्त्र का आचरण करते समय आनेवाली अनेक बाधाआें का भी विचार धर्म ने किया है । उसके अनुरूप उसने मनुष्य को विविध वैकल्पिक मार्ग सुझाए हैं । मनुष्य से चूक होनेपर, दंड अथवा प्रायश्‍चित कर्म भी बताया है । इसका उद्देश्य मनुष्य का कल्याण ही है  अतः किसी को अन्य पंथ से स्वधर्म में प्रवेश की अनुमति न देना अथवा उससे संबंध न रखना, इस प्रकार की एकांगी और अमानवीय कट्टरता को हिन्दू धर्म में स्थान नहीं है ।

११. अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में
प्रवेशके इच्छुकों के लिए ध्यान देनेयोग्य सूत्र

शास्त्र में बताए हुए शुद्धीकरण के कृत्य कर, हिन्दू धर्म में निःसंकोच प्रवेश करें और उनका आचरण कर, जीवन में खरा आनंद प्राप्त करें ।

१२. अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में प्रवेश
के विषय में हिन्दू परिवारों के लिए उचित दृष्टिकोण

अन्य पंथ का व्यक्ति जब हिन्दू धर्म में प्रवेश करता है, तब उसका कल्याण होता है । व्यक्ति जब अपने मूल धर्म में लौटता है, तब हमारा बिछडा भाई घर लौटा है, यह समझकर उससे आत्मीयता और प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए । संबंधित परिवार का यही खरा धर्म है ।

१३. अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में प्रवेश करते समय विरोध होनेपर, उचित दृष्टिकोण

अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में प्रवेश करनेवाले व्यक्ति की सहायता करने में जब स्वजन विरोध करते हों, तब समझना होगा कि ऐसे प्रसंगों का धैर्यपूर्वक सामना करना, धर्माचरण का ही एक भाग है । ऐसे लोगों को सर्वशक्तिमान ईश्‍वर ही आधार देते हैं ।

१४. सनातन हिन्दू धर्म कहता है कि अन्य पंथ से हिन्दू धर्म में आनेवालों को क्षमा करो और उन्हें प्रेमपूर्वक गले लगाओ

– श्री. राम होनप, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (५.३.२०१७)

धर्म-परिवर्तन के इच्छुक और धर्मांतरित दोनों से निम्नांकित प्रश्‍न पूछें !

१. जिससे ऐहिक और पारलौकिक कल्याण साध्य होता है, वह धर्म है, क्या हिन्दू धर्म की यह व्याख्या समझ में आई है ?

२. सबसे प्राचीन एकमेव धर्म, हिन्दू धर्म है, क्या यह सत्य ज्ञात है ?

३. आज विविध देशों के अन्य पंथीय लोग क्यों हिन्दू धर्म के अनुसार साधना कर रहे हैं ?

४. धर्म-परिवर्तन के लिए शत्रु द्वारा अमानवीय यातनाएं दिए जाने पर भी संभाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह के छोटे बच्चे – फतेहसिंह और जोरावरसिंह जैसे वीरों ने प्राण त्याग किए, पर स्वधर्म का त्याग क्यों नहीं किया ?

धर्म-परिवर्तन रोकना व धर्मांतरितों को स्वधर्म में लाने हेतु प्रबोधन करना, यह प्रत्येक हिन्दू का धर्मकर्तव्य ही है

– पू. (श्री.) संदीप आळशी

स्रोत : सनातन प्रभात हिन्दी