मृत्योपरांत किए जानेवाले क्रियाकर्म (भाग १)

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सगे-संबंधियों द्वारा मृत्यु के पश्चात किए जानेवाले क्रियाकर्म श्रद्धापूर्वक और विधिवत करने से मृत व्यक्ति की लिंगदेह भूलोक में अथवा मर्त्यलोक में न अटकते हुए, उसे सद्गति मिलती है और वह अगले लोकों में जा सकता है । इसकारण उनसे (पूर्वजों द्वारा) परिवारवालों को कष्ट होने की, इसके साथ ही ऐसी लिंगदेह अनिष्ट शक्तियों के नियंत्रण में जाने की संभावना भी घट जाती है ।

इस लेख में आरंभ के क्रियाकर्म, क्रियाकर्म किसे करना चाहिए, क्षौरविधि, दहनविधि की तैयारी, अंत्ययात्रा इत्याधि के विषय में विस्तृत जानकारी दी गई है ।

१. व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात १३ वें दिन तक की जानेवाली महत्त्वपूर्ण कृतियां

व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात धर्मशास्त्र में बताए अनुसार उसका क्रियाकर्म पुरोहित से करवाएं । अधिकांश स्थानों पर अंत्यसंस्कारों के विषय में जानकारी रखनेवाले पुरोहित का तुरंत मिलना कठिन होता है । ऐसे समय पर पुरोहित आने तक आगे दी गई कुछ कृतियां कर सकते हैं । अन्य विधियों के विषय में पुरोहित मार्गदर्शन करेंगे ही; परंतु हमें भी ‘वे विधियां वास्तव में कैसे करनी चाहिए ?’, यह लेख पढकर पहले ही पता रहे और उस समय वे विधियां करना सुलभ हो जाएगा । इनमें से कुछ विधियों में पाठभेद, तथा प्रांतानुसार / परंपरानुसार भेद (अंतर) हो सकते हैं । जहां ऐसे भेद दिखें, वहां अपने पुरोहित से परामर्श करें ।

१ अ.व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात प्रारंभिक क्रियाकम

१ अ १. मृतदेह को भूमि पर रखना : मृत्यु से पहले व्यक्ति को भूमि पर न रखा हो तो मृत्यु के पश्चात तुरंत ही भुमि पर रखें । मृत्यु से पहले व्यक्ति को दक्षिण दिशा में सिर कर लिटाना अपेक्षित है, तब भी मृत्यु के पश्चात मात्र मृतदेह को रखते समय उसके पैर संबंधित प्रांत की पद्धतिनुसार दक्षिण की ओर, उत्तर की ओर अथवा  पश्चिम की ओर करें ।

मृतदेह दक्षिणोत्तर रखें ।

१ अ २. मृतदेह के मुख में गंगाजल डालना : मृत व्यक्ति के मुख में संभव हो तो गंगाजल डालें और उसका मुख बंद करें ।

१ अ ३. मृत देह के मुख पर, इसके साथ ही नाक और कान में तुलसीदल रखना  : मृत व्यक्ति के मुख में तुलसीपत्र रखें । उसके कान और नाक मेें तुलसी के पत्तों को रखकर उन्हें बंद करें । वैद्यकीयदष्टि से आवश्यक हो, तो मुख, कान और नाक में तुलसीपत्र रखने से पहले रुई डालें ।

१ अ ४. मृत व्यक्ति का शरीर सीधा कर उसके हाथ-पैरों के अंगूठे बांधना : मृत व्यक्ति के हाथ-पैर और गर्दन सीधी करें । आंखें बंद करें । दोनों पैरों के अंगूठे एकदूसरे से बांधें । दोनों हाथ शरीर के आगे ले जाकर उनके अंगूठे एकत्र बांधें । मृत्यु के पश्चात कुछ समय उपरांत शरीर कडा हो जाने से यह करना कठिन होता है । (इस कृति का उल्लेख धर्मग्रंथ में नहीं मिलता । यह एक व्यावहारिक कृति है ।)

१ अ ५. मृत व्यक्ति के आसपास थोडा-सा अंतर रखकर अप्रदक्षिणा मार्ग से (घडी के कांटों की विपरीत दिशा में) भस्म अथवा विभूती डालें !

१ अ ६. मृत व्यक्ति के सिर के पास तेल का दीप जलाना : परिवार के व्यक्ति की मृत्यु होने पर तुरंत ही घर में तेल का दीप जलाने की परंपरा प्रचलित है । (धर्मशास्त्रानुसार दीप जलाना बंधनकारक नहीं ।) मृतदेह के सिर से कुछ अंतर पर गेहूं के आटे से दीप बनाकर , उसमें एक ही वात रखकर तेल का दीप जलाएं । इस दीप की ज्योत दक्षिण दिशा की ओर करें ।

१ अ ७. परिजनों को प्रार्थना और नामजप करते हुए सब क्रियाकर्म करना है : परिवार के लोगों को मृत व्यक्ति की लिंगदेह का अनिष्ट  शक्तियों के आक्रमणों से रक्षा होने के लिए बीच-बीच में भगवान दत्तात्रेय से रक्षा होने के लिए प्रार्थना करें – ‘हे दत्तात्रेया, …(मृत व्यक्ति का नाम लें) के लिंगदेह के सर्व ओर आपका सुरक्षाकवच सतत रहे । उन्हें अगली गति मिले, यही आपके चरणों में प्रार्थना है!’
‘श्री गुरुदेव दत्त’ का नामजप करते हुए आगे दिए सभी क्रियाकर्म करें ।

१ अ ८. मृतदेह के समीप भगवान दत्तात्रेय का नामजप ध्वनिमुद्रक पर (टेप रिकॉर्डर अथवा भ्रमणभाषपर) लगाकर रखें : सात्त्विक आवाज में भगवान दत्तात्रेय का नामजप https://www.sanatan.org/hindi/audio-gallery ‘लिंक’पर ‘श्राव्य दालन’में उपलब्ध है ।

१ अ ९. क्रियाकर्म की सामग्री की तैयारी करना

१. कर्ता को परिधान करने के लिए कोरी (नई) धोती;

२. मृतदेह को लगाने के लिए तुलसी की जडों की मिट्टी, भस्म अथवा विभूती और गोपीचंदन;

३. मृतदेह ढकने के लिए सफेद कपडा (मृतदेह को ढकने के पश्चात उस सफेद कपडे का एक चतुर्थांश भाग कर्ता को उपरण के रूप में शेष रह जाए ।);

४. १ कटोरी दही और एक कटोरी देसी घी का मिश्रण;

५. १ कटोरी पंचगव्य (गोमूत्र, गोमय, दूध, दही और देसी घी का मिश्रण);

६. सत्तू के / चावल के आटे के ७ गोले;

७. २५० ग्राम काले तिल;

८. ५०० ग्राम देसी घी;

९. तिल, फूल आदि सामग्री रखने के लिए ४ – ५ पत्रावली (पत्तलें), ८ – ९ द्रोण (दोने);

१०. कर्ता और पुरोहितों को बैठने के लिए १-१ आसन;

११. आचमनी-पंचपात्र, लोटा और पूजापात्र (भगवान की प्रतिमा को नहलानेवाली थाली);

१२. अर्थी के लिए बांस (इनकी लंबाई और संख्या स्थानीय परंपरानुसार निश्चित करें);

१३. अर्थी बांधने के लिए नारियल के छिलके से बनी मोटी रस्सी (साधारण एक किलो) और हंसिया;

१४. अग्नि ले जाने के लिए एक छोटी मटकी, उपले या लकडी के छोटे-छोटे टुकडे, फुकनी और दियासलाई (माचिस);

१५. एक बडा मटका और पानी;

१६. मृतदेह को पहनाने के लिए काले खस की जडों का हार (संभव हो तो) और गुडहल के फूलों का हार (संभव हो तो);

१७. मृतदेह को पहनाने के लिए तुलसी का हार, सगे-संबंधियों की संख्या के अनुसार आवश्यक उतने फूलों का हार, सफेद फूल, गेंदे के फूल, ५ – १० तुलसी की मंजिरी;

१८. मृतदेह के अवयवों पर रखने के लिए ७ और चिता के नीचे रखने के लिए १, ऐसे कुल ८ सोने के टुकडे (संभव हो तो);

१९. काई;

२०. शमी की छोटी टहनी;

२१. दर्भ (यह पुरोहित लेकर आते हैं । मृत व्यक्ति के देश-कालानुसार ‘कितनी दर्भों का उपयोग किया जाए ?’, यह निश्चित होता है);

२२. चिता रचने के लिए आम, कटहल इत्यादि वृक्षों की लकडी, गोबर के उपले

२३. चिता भली-भांति प्रज्वलित होने के लिए तिल का तेल, नारियल का तेल, प्राकृतिक घटकों से तैयार किया गया अन्य तेल अथवा देसी घी (साधारण ४ – ५ लीटर);

२४. १०० ग्राम कपूर;

२५. गंगाजल (५-१० मि.ली.).

१ आ. मृत व्यक्ति का क्रियाकर्म किसे करना चाहिए ?

मृतक को अग्नि देने से लेकर संपूर्ण क्रिया समाप्ति तक विधि करने का अधिकार मृत व्यक्ति के बडे पुत्र को है । किसी अनिवार्य कारणों से बडा पुत्र क्रियाकर्म करने में असमर्थ हो, तो छोटे पुत्र को क्रियाकर्म करना चाहिए । वह भी उपलब्ध न हो, तो क्रमशः बीच का कोई भी पुत्र, दामाद अथवा अन्य परिजन क्रियाकर्म कर सकते हैं । क्रियाकर्म करनेवाले पुरुष को ‘कर्ता’ कहते हैं ।

१ आ १. कर्ता क्षौर करे (शिखा छोडकर सिर के केश पूर्णतः निकालें) तथा दाढी-मूंछ और नख भी काटें ।

१ आ २. कर्ता स्नान करे तथा कोरा वस्त्र उदा. धोती धारण करे । उत्तरीय (ऊपरका वस्त्र) धारण न करे ।

१ आ ३. मृतदेह को स्नान करवाएं ।

१ आ ४. मृतदेह को नए वस्त्र पहनाएं ।

१ आ ५. मृत व्यक्ति का अनुलेपन करना :  वैसे स्नान के उपरांत तुलसी के जडों की मिट्टी का (भस्म, चंदन समान) सर्वांग का अनुलेपन करें ।

१ आ ६. मृत व्यक्ति के गले में हार डालना

१ आ ७. मृत व्यक्ति को सफेद वस्त्र से ढकना

२. इसे टालें !

अ. व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके नाम से अथवा याद कर आक्रोश करना, जोर से रोना-चिल्लाना न करें । मृत व्यक्ति को अगली गति मिलने के लिए मृत्यु के उपरांत क्रियाकर्म करना होता है ।  नाते-रिश्तेदारों के आक्रोश करने पर मृत व्यक्ति की लिंगदेह सगे-संबंधियों की भावनाओं में अटक सकती है । इससे उसे अगली गति मिलने में बाधा आ सकती है ।

आ. अनेक स्थानों पर पति की मृत्यु होने पर पत्नी के मंगलसूत्र के मुहूर्तमणि, इसके साथ ही सोने की तार में पिरोए गए काले मणि को अलग कर उसे पति की मृत देह के साथ चिता पर रखने की पद्धति है । ऐसे समय पर मंगलसूत्र का अन्य सुवर्ण और सौभाग्यालंकार निकालकर सुरक्षित रखा जाता है । इस विषय में अपने प्रांत की पद्धतिनुसार करें ।

इ. मृतदेह को कोई भी अनावश्यक स्पर्श न करे ।

३. आगे दिए गए किसी गुट में आनेवाले व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसका अंतिम  संस्कार पुरोहितों से पूछकर करें ।

अ. ३ वर्षों से अल्प आयु के बच्चे

आ. रजस्वला अवस्था में मृत स्त्री

इ. अविवाहित स्त्री अथवा पुरुष

ई. संन्यासी

उ. मृतदेह छिन्नविच्छिन्न हुआ व्यक्ति

ऊ. बाढ, जंगल में लगी आग, वणवा इत्यादि दुर्घटनाओं में मृत हुए; परंतु मृतदेह विधि के लिए उपलब्ध न हुए व्यक्ति

ए. उपरोक्त परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी असाधारण स्थिति में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति

४. अंतिमयात्रा की पूर्वतैयारी

४ अ. अर्थी बांधना : अर्थी के लिए बांस का उपयोग किया जाता है । ऐसा होते ही भी बांंस के उपयोग में बांस के उपयोग के विषय में धर्मग्रंथों में उल्लेख नहीं है । अर्थात अर्थी के लिए अन्य लकडी का उपयोग कर सकते हैं ।

४ आ. अग्नि की मटकी रखने के लिए  बांस की पटि्टयों से विशिष्ट त्रिकोण बनाना : अग्नि रखी हुई मटकी ले जाने के लिए बांस (अथवा अन्य लकडी) चीरकर उसकी तीन पटि्टयां निकालें । अग्नि की मटकी के आकार के अनुसार उन्हें तिकोने आकार में बांधें ।।

४ इ. मृत व्यक्ति द्वारा अंतिम दिन में उपयुक्त किए गए कपडे और बिस्तर (ओढावन-बिछावन)  एकत्र करना : ये वस्तुएं स्थानीय परंपरानुसार चिता पर रखते हों तो उन्हें अंतिमयात्रा में साथ ले जाएं । किसी प्रांत में अन्य परंपरा (उदा. इसप्रकार वस्तुदान करना) हो, तो उस अनुसार करें ।

४ ई. अग्नि प्रज्वलित करना : कर्ता उपले, कपूर इत्यादि का उपयोग करते हुए पुरोहित की सहायता से विधिवत् अग्नि प्रज्वलित करे । प्रज्वलित की हुई अग्नि छोटी मटकी में रखें ।

४ उ. अर्थी बनानेके लिए साधारणतः ६ फुट के दो बांस भूमि पर आडे रखें । उन दोनों में लगभग डेढ फुट का अंतर रखकर उनके मध्य में बांस की पट्टियां बांधें । पट्टियां बांधते समय रस्सी को कहीं भी न काटें । प्रत्येक बाजू में / छोर के शेष रस्सी का उपयोग मृतदेह को अर्थी से बांधने के लिए करें ।

५. अंतिम यात्रा

१. स्मशान में जाते समय अंतिमयात्रा में सम्मिलित हुआ कोई भी व्यक्ति प्रज्वलित अग्नि की मटकी अपने दाएं हाथ में लेकर अर्थी के आगे चले । अंतिमयात्रा में ‘आगे अग्नि रखी हुई मटकी लिए व्यक्ति और उसके पीछे अर्थी’, ऐसा होना चाहिए । अग्नि और अर्थी के बीच कोई न हो । सभी को अर्थी के पीछे चलना चाहिए ।

२. कर्ता अर्थी को कंधा दे । उसके साथ अन्य परिवारवालों को, सगे-संबंधियों और यदि वे भी उपस्थित न हों, तो पडोसियों को कंधा देना चाहिए । अर्थी को एक समय पर चार लोगों को कंधा देना चाहिए ।

३. अंतिम यात्रा में मृतदेह का सिर आगे की दिशा में करें ।

४. अंतिम यात्रा में कोई भी व्यक्ति पानी से भरा मटका ले ।

५. अंतिम यात्रा स्मशान में पहुंचने तक सभी को धर्मशास्त्र में बताए अनुसार ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘नारायण’ का नामजप ऊंचे स्वर में करना योग्य है, तब भी अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का नामजप ऊंचे स्वर में करना अधिक योग्य होने से वह करना चाहिए । दत्त का नामजप करना अधिक योग्य है, तब भी अपनी-अपनी श्रद्धानुसार श्रीराम अथवा नारायण का नामजप भी कर सकते हैं ।

६. अंतिम यात्रा के आधे रास्ते पहुंचने पर अर्थी नीचे रखें ।

७. कर्ता पुरोहित के बताए अनुसार पिंड देने की विधि करें ।

८. तदुपरांत अर्थी पुन: कंधे पर लेते समय कंधे पर रखनेवाले अब उसे दूसरे कंधे पर लें । इसका अर्थ है, अर्थी नीचे रखने से पहले जिन २ लोेगों ने उसे अपने बाएं कंधे पर लिया था, वे अब दाएं कंधे पर लें । अन्य दो लोगों को भी इसीप्रकार कंधे बदलने हैं । तदुपरांत अर्थी आगे लें ।

व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात १३ वें दिन तक की जानेवाली शेष महत्त्वपूर्ण कृतियों के विषय की विस्तृत जानकारी के लिए पढें, ‘मृत्यु के उपरांत किए जानेवाले क्रियाकर्म (भाग २)’

संदर्भ : सनातन-निर्मित लघुग्रंथ ‘मृत्युपरान्तके शास्त्रोक्त क्रियाकर्म’

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