अणुयुद्ध के कारण होनेवाले प्रदूषण से रक्षा होने के लिए किए जानेवाले उपाय : अग्निहोत्र

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इस लेख में हम अग्निहोत्र करने का महत्त्व, तीसरे महायुद्ध की भीषणता एवं उस पर उपाय एवं साधकों सहित सामान्य जनता के प्राण बचाने के लिए उपाय, इन विषयों में जानकारी लेंगे ।

 

१. अग्निहोत्र करने का महत्त्व

त्रिकालज्ञानी संतों ने बताया ही है कि अब आगे भीषण आपातकाल है और उसमें जगभर की बडी जनसंख्या नष्ट होनेवाली है । आपातकाल का आरंभ हो ही गया है । अनिष्ट शक्तियों के बढते प्रकोप के कारण कलियुग के आपातकाल में तीसरा महायुद्ध होगा । आतंकवादी व्यवस्था से संपूर्ण देश को, समाज को, परिणामस्वरूप स्वयं को बचाना हो, तो अग्नि की सहायता से ब्रह्मांडमंडल के उस-उस देवता की तरंगें भूमंडल की ओर आकृष्ट करने हेतु और महिला, पुरुष, बच्चे सभी जिसे कर सकते हैं ऐसा है यह अग्निहोत्र !

 

२. तीसरे महायुद्ध की भीषणता एवं उस पर उपाय

तीसरे महायुद्ध में अणुबम का किरणोत्सर्ग प्रदूषण होनेवाला है । दूसरे महायुद्ध की तुलना में अब तो जगत के अधिकतर सभी राष्ट्रों के पास महासंहारक अण्वस्त्र हैं । इसलिए वे एक-दूसरे के विरोध में उपयोग किए जाएंगे । इस युद्ध में बचना हो, तो उसके लिए अण्वस्त्र निष्क्रिय करनेवाला और इसके साथ ही उन अण्वस्त्रों से निकलनेवाला किरणोंत्सर्ग को भी नष्ट करनेवाला उपाय चाहिए । उसके लिए स्थूल के उपाय उपयोगी नहीं; कारण अणुबम यह बम की तुलना में सदैव सूक्ष्म है । स्थूल (उदा. बाण मारकर शत्रु का नाश करना), स्थूल के साथ सूक्ष्म (उदा. मंत्र कहते हुए बाण मारना), सूक्ष्मतर (उदा. केवल मंत्र कहना) एवं सूक्ष्मतम (उदा. संतों का संकल्प), ऐसे अधिकाधिक प्रभावशाली चरण होते हैं । स्थूल की तुलना में सूक्ष्म, अनेक गुना प्रभावी होता है ।

अणुबम समान प्रभावी संहारक अस्त्र के किरणोत्सर्ग का प्रभाव रोकने के लिए सूक्ष्म से कुछ तो करना होगा । उसके लिए ऋषि-मुनियों ने यज्ञ का प्रथमावतार अर्थात ‘अग्निहोत्र’ उपाय बताया है । यह करने के लिए अत्यंत सरल और अत्यंत अल्प समय में होनेवाला; परंतु अत्यंत प्रभावी सूक्ष्म में परिणाम साध्य करवानेवाला, ऐसा अद्भुत उपाय है । इससे वातावरण चैतन्यदायी बनता है और संरक्षककवच भी निर्माण होता है । अग्निहोत्र, यह यज्ञ बंधनमुक्त होने से उसे स्त्री, पुरुष, बच्चे कोई भी सहजता से कर सकते हैं । अग्निहोत्र करना, यह आकाशमंडल के सूक्ष्म देवताओं के तत्त्वों को जागृत कर उनकी तरंगें भूमंडल पर खींचने का एक प्रभावी माध्यम है । अग्निहोत्र के कारण वायुमंडल में तैयार होनेवाला दिव्य तेजोमंडल पारदर्शक कांच के तेजोगोले समान होता है । अत: अणुबम में अत्यंत सूक्ष्म संहारक किरणों के लिए भी इस वायुमंडल को भेदना असंभव होता है । इस कारण संहारक घटकों से भी अग्निहोत्र करनेवाले जीव की रक्षा एवं उस वायुमंडल की रक्षा हो सकती है ।

सामान्य लोग यदि केवल इतना भी करें, तो पर्याप्त है । इससे भी प्रभावी, अर्थात सूक्ष्म उपाय है साधना करना । साधना से आत्मबल प्राप्त होता है और अपने कार्य को बल मिलता है । सामान्य व्यक्ति को अग्निहोत्र करने से जो लाभ मिलेगा, वह लाभ साधना करनेवाले एवं ६० प्रतिशत आध्यात्मिक प्रगति किए साधक को केवल प्रार्थना से साध्य होता है ।

आगामी आपातकाल में अपने साथ-साथ अन्यों के भी प्राण बचा पाएं, इसके लिए अग्निहोत्र एवं साधना करें !

 

३. साधकों के साथ सामान्यजनों के प्राण बचाने के लिए उपाय

अ. बमविस्फोट अर्थात ‘भस्मासुर’

इस संहारकाल में अनेक लोगों के पास देवताओं की तेजरूपी शक्ति नहीं; इसलिए दुर्जन उस स्तर पर अत्युच्च स्तर पर अधिकतम स्तर पर विध्वंसक तेजरूपी ऊर्जा बनानेवाले विस्फोटक तैयार कर उनका उपयोग करने का नियोजन करते हैं । यह तेजरूपी ऊत्सर्जित होनेवाली रजतमात्मक ऊर्जा वायुमंडल की बची-खुची सात्विकता को भी निगल जाती है । इसीलिए बमविस्फोट को ‘भस्मासुर’कहा जाता है ।

आ. अणुयुद्ध के कारण होनेवाले प्रदूषण से रक्षा होने के लिए किए जानेवाले उपाय

अणुयुद्ध से होनेवाला प्रदूषण वायुमंडल में भयंकर मात्रा में रज-तमात्मक प्रक्रिया होती है । इसलिए उस संदर्भ में मनुष्य को अभी से कदम उठाने चाहिए, अन्यथा यह प्रदूषण अनेक मानवी जीवों के संहार के लिए कारणीभूत होगा ।

इ. श्रीराम ने १४ हजार वर्ष किया राज्य
एवं युधिष्ठिर द्वारा किए गए दो राजसूय यज्ञों के कारण
किरणोत्सर्ग का परिणाम नष्ट हुआ । अब इस कलियुग में हम क्या कर सकते हैं ?

उपरोक्त उद्धृत वाक्य आनेवाले महासंहारक काल की आहट दर्शानेवाला है, इसलिए उससे अपनी रक्षा के लिए उपाय भी बताए हैं । अत: मनुष्य को उसके लिए प्रयत्न करना अत्यंत आवश्यक है । यह प्रयत्न तेज-निर्मिति का होगा, तब ही ऐसे बमविस्फोटों से उत्सर्जित होनेवाले भयंकर विनाशकारी तेज का सामना करने के लिए उसकी देह की चेतना की रक्षा हो सकती है । यह उपाय अर्थात अग्निहोत्र एवं साधना करना !

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ ‘अग्निहोत्र’

 

४. वायु प्रदूषण के ठोस उपाय – अग्निहोत्र !

अग्निहोत्र करते समय

गत कुछ दिनों से बढते प्रदूषण के कारण दिल्लीवासी हैरान हो गए थे । प्रदूषण के स्तर पर उच्चांक प्राप्त करने से वहां आरोग्यमंत्री ने अपने वाहन रास्ते पर लाने के लिए ‘सम-विषम’ संकल्पना पुन: लागू करना निर्धारित किया है । ‘सफर इंडिया’ (सिस्टीम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग रिसर्च) नामक संस्था द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार गत ५ वर्षाें में सबसे अधिक प्रदूषण इस वर्ष हुआ है । वहां का प्रदूषण अपनी चरमसीमा तक पहुंच गया है इसलिए विद्यालय बंद रखने पडे एवं अंतिम पर्याय के रूप में ऐसी सूचना दी गई थी कि लोग अपने घर से बाहर न निकलें । प्रदूषण की समस्या इतनी गंभीर होने तक शासन ने समय पर उपाययोजना क्यों नहीं निकाली, यह प्रश्न भी उतना ही गंभीर है । जैसे राजधानी देहली में प्रदूषण है, उतना ही भारत के अन्य स्थानों पर भी है ।

इस घटना के उपरांत मुंबई एवं पुणे सहित अन्य राज्यों के महत्त्वपूर्ण शहरों में बढते प्रदूषण के विषय में चर्चा होने लगी है । ‘सफर इंडिया’की रिपोर्ट के अनुसार देहली के पीछे-पीछे प्रदूषित शहर के रूप में पुणे का क्रमांक लगा है । मुंबई देश की आर्थिक राजधानी होते हुए भी पुणे ने प्रदूषण में मुंबई को भी पीछे छोड दिया है । विशेषज्ञों के मतानुसार पुणे का तापमान अल्प होने के कारण यहां का प्रदूषण बढ गया है । हवा में बढते प्रदूषकों के कारण सर्दी, खांसी एवं श्वसन के अनेक विकारों के कारण पुणेवासी भी त्रस्त हो गए हैं । उसमें ही पुणे में दुपहिया वाहनों की संख्या भी अधिक होने से प्रदूषण में वृद्धि हो रही है । एक समय शुद्ध हवा एवं पानी के लिए पहचाने जानेवाले पुणे की पहचान अब प्रदूषित शहर के रूप में होना, इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे ।

प्रदूषण के अनेक दुष्परिणाम विद्यायलीन पाठ्यपुस्तकों में दिए जाते हैं; परंतु उस पर कोई ठोस उपाय आचरण में नहीं लाया जाता । पृथ्वी का संतुलन बिगडने के लिए प्रदूषण महत्त्वपूर्ण घटक है; इसके साथ ही प्रदूषण के कारण मानवी शरीर एवं मन का संतुलन बिगड जाता है । शारीरिक विकारों के कारण मनुष्य निराश हो जाने से सकारात्मक विचार ग्रहण करने की क्षमता अल्प होती है । परिणामस्वरूप अयोग्य विचारों के कारण अयोग्य कृति भी अनजाने में हो जाती है । वेद एवं पुराणों में मनुष्य सकारात्मक रहकर आनंदी कैसे रहे, इसके अनेक रहस्य लिखकर रखे हैं । मनुष्य का मन सकारात्मक होने के लिए उसके आसपास का परिसर भी सकारात्मक, स्वच्छ और सुंदर होना चाहिए । परिसर स्वच्छ होने के लिए हवा स्वच्छ होनी चाहिए और हवा स्वच्छ होने हेतु नियमित अग्निहोत्र करना, यह उपाय है ।

अग्निहोत्र के परिणाम स्वरूप भौतिकरीति से वायु की शुद्धि होने से मानवी मन की शुद्धि होती है । मन शुद्ध होने पर अपनेआप ही उसका विचार-आचार पर प्रभाव पडता है और अंतिमत: मनुष्य आनंदी होता है । अग्निहोत्र में उपयोग की जानेवाली सामग्री के कारण हवा के प्रदूषित घटकों की मात्रा अल्प होती है, यह शास्त्रीयदृष्टि से प्रमाणित हुआ है । जगभर के अनेक देशों में इस विषय में अभ्यास होने पर वहां के भी प्रदूषण पर उपाय के रूप में अग्निहोत्र का अवलंब किया जा रहा है । इससे वैदिक परंपरा का महत्त्व ध्यान में आता है । वायुशुद्धता के बाह्य उपायों के साथ ही साधना अर्थात धर्माचरण करना भी उतना ही आवश्यक है । हिन्दू संस्कृति का महत्त्व समझकर यदि सरकार उसकी ऐसी कुछ धार्मिक कृत्यों को प्रोत्साहन देगी, तो देश का मार्गक्रमण खरे विकास की ओर होगा ।

– कु. ऋतुजा शिंदे, पुणे.

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