अनुक्रमणिका
सूर्य ऊर्जा देता और लेता है । इस कारण प्रदूषण नष्ट करने के लिए आवश्यक और पोषक स्थिति अपनेआप निर्मित होती है । इससे पृथ्वी को शांत स्थिति प्राप्त होती है । अग्निहोत्र जनित्र (जनरेटर) है और उसकी अग्नि की लपटें यंत्र (टर्बाईन) हैं । गाय का गोबर, गाय का घी एवं अक्षत (चावल) इन घटकों का अग्नि के माध्यम से परस्पर संयोग होकर ऐसा कुछ अपूर्व-सा उत्पन्न होता है कि वह आस-पास की वस्तु से टकराकर उनके सर्व ओर फैलता है तथा उन में निहित घातक ऊर्जाओं को निष्क्रिय करता है, जिससे वातावरण पोषक बनता है । तत्पश्चात उस वातावरण में सेंद्रिय द्रव्य उत्पन्न होना, बढना एवं उनके विस्तार के लिए पोषक तत्त्वों की आपूर्ति करना, इस प्रकार अग्निहोत्र प्रक्रिया वायुमंडल की प्रत्यक्षरूप से क्षतिपूर्ति करती है । – होम थेरपी नाम का हस्तपत्रक
१. हवनपात्र
१. पिरामिड के आकार का ताम्रपात्र
अग्निहोत्र करने के लिए एक विशिष्ट आकार का ताम्र पिरामिड पात्र आवश्यक है ।
२. हवनद्रव्य
१. गाय के गोबर से बने उपले
गाय के गोबर के चपटे आकार के पतले उपले थापें और सूर्यप्रकाश में सुखाएं । सूखे उपलों से अग्निहोत्र के लिए अग्नि तैयार करें । (उत्तर और दक्षिण अमरीका के निवासी, स्कॅन्डिनेवियन देश, पूर्व और पश्चिम यूरोप, अफ्रीका एवं एशिया संस्कृति में गोवंश का गोबर एक औषधीय पदार्थ माना जाता है ।)
२. चावल (अक्षत)
अखंड तथा पॉलिश रहित चावल में आकृष्ट हुए ईश्वर के मूलतत्त्व टिके रहते हैं । चावलों को पॉलिश करने से उसमें विद्यमान मूल ईश्वरीय तत्त्व लुप्त हो जाते हैं तथा उन्हें कृत्रिमता प्राप्त होती है । इसलिए उनका उपयोग न करें । चावल का दाना टूटने पर उसमें निहित सूक्ष्म ऊर्जा की अंतर्रचना अस्त-व्यस्त हो जाती है; इसलिए वह चैतन्यप्रदाता अग्निहोत्र के लिए अपात्र सिद्ध होता है । इसी कारण अक्षत अर्थात चावल के अखंड दानों का ही उपयोग करना चाहिए ।
३. गाय के दूध से बना घी
गाय के दूध से निकला मक्खन मंद अग्नि पर तपाएं । सतह पर श्वेत रंग का पदार्थ दिखाई देने लगे, तो उसे छलनी से छान लें । इसी द्रव्य को घी कहते हैं । यह घी प्रशीतक में (फ्रिज में) रखे बिना भी बहुत समय तक अच्छा रहता है । घी विशेष औषधीय पदार्थ है । अग्निहोत्र की अग्नि में हव्य पदार्थ के रूप में इसका उपयोग करने पर यह वहन प्रतिनिधि के नाते सूक्ष्म ऊर्जा वहन करने का कार्य करता है । गाय के दूध से बने घी में शक्तिशाली ऊर्जा समाई होती है । – होम थेरपी नाम का हस्तपत्रक
३. अग्निहोत्र की विधि
१. अग्निहोत्र करते समय पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठे ।
२. अग्निहोत्र के लिए अग्नि प्रज्वलित करना
२ अ. अग्नि प्रज्वलित करने की विधि : हवनपात्र के तल में उपले का एक छोटा टुकडा रखें । उस पर उपले के टुकडों को घी लगाकर उन्हें इस प्रकार रखें (उपलों के सीधे-आडे टुकडोें की २-३ परतें) कि भीतर की रिक्ति में वायु का आवागमन हो सके । पश्चात उपले के एक टुकडे को घी लगाकर उसे प्रज्वलित करें तथा हवनपात्र में रखें । कुछ ही समय में उपलों के सब टुकडे प्रज्वलित होंगे । अग्नि प्रज्वलित होने के लिए वायु देने हेतु हाथ के पंखे का उपयोग कर सकते हैं; परंतु मुंह से फूंककर अग्नि प्रज्वलित न करें । ऐसा करने से मुंह के कीटाणु अग्नि में जाएंगे । अग्निप्रज्वलित करने के लिए मिट्टी के तेल जैसे ज्वलनशील पदार्थों का भी उपयोग न करें । अग्नि निर्धूम प्रज्वलित रहे अर्थात उससे धुआं न निकले ।
३. अग्निहोत्र मंत्र
३ अ. मंत्रोच्चारण
१. सूर्योदय के समय
सूर्याय स्वाहा, सूर्याय इदं न मम ।
प्रजापतये स्वाहा, प्रजापतय इदं न मम
२. सूर्यास्त के समय
अग्नये स्वाहा, अग्नय इदं न मम ।
प्रजापतये स्वाहा, प्रजापतय इदं न मम ॥
३ आ. मंत्रों का उच्चार कैसे करें ? : मंत्रों का उच्चार अग्निहोत्र के स्थान पर गूंजे, ऐसी नादमय पद्धति से, मध्यम गति से (न बहुत शीघ्रता से, न अधिक धीमी गति से), स्पष्ट तथा ऊंचे स्वर में करना चाहिए ।
३ इ. मंत्र बोलते समय भाव कैसा हो ? : मंत्रों में सूर्य, अग्नि, प्रजापति शब्द ईश्वरवाचक हैं । इन मंत्रों का अर्थ है, सूर्य, अग्नि, प्रजापति इनके अंतर्यामी स्थित परमात्मशक्ति को मैं यह आहुति अर्पित करता हूं । यह मेरा नहीं । समस्त सृष्टि का निर्माण तथा उसका पालन-पोषण करनेवाली परमात्मशक्ति के प्रति शरणागतभाव का कथन इस मंत्र में किया गया है ।
३ ई. मंत्र का उच्चारण कौन करे ? : घर का एक व्यक्ति अग्निहोत्र करे और उस समय अन्य सदस्य वहां उपस्थित रहकर आहुति देनेवाले के साथ अग्निहोत्र के मंत्र बोल सकते हैं । – डॉ. श्रीकांत श्रीगजाननमहाराज राजीमवाले
४. अग्नि में हवनद्रव्य छोडना
चावल के दो चुटकी दाने हथेली पर अथवा तांबे की थाली में लेकर उस पर गाय के घी की कुछ बूंदें डालें । अचूक सूर्योदय के (या सूर्यास्त के) समय प्रथम मंत्र बोलें तथा स्वाहा शब्द के उच्चार के उपरांत दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका तथा अंगूठे की चुटकी में अक्षत-घी का मिश्रण लेकर अग्नि में छोडें । (चुटकीभर अक्षत पर्याप्त होते हैं ।) अब दूसरा मंत्र बोलें तथा स्वाहा: शब्द बोलने के पश्चात दाहिने हाथ से पहले की भांति अक्षत-घी का मिश्रण अग्नि में छोडें । – होम थेरपी नाम का हस्तपत्रक
५. सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय ही अग्निहोत्र करने का महत्त्व
सृष्टि की प्रत्येक वस्तुमात्र तथा घटना स्थल, काल एवं समय से बंधी होती है । कालानुसार प्रत्येक का स्थल तथा तदनुसार उस कृत्य के होने का समय ईश्वरनियोजित होता है । इस कारण, कोई कार्य कालानुसार (मुहूर्त पर) करने से व्यक्ति को अपेक्षित लाभ मिलता है, जबकि अनुचित मुहूर्त पर करने से हानि होती है । ग्रहणकाल में गर्भधारण होने पर विकलांग संतान जन्म ले सकती है । उसी प्रकार, विवाह निर्धारित मुहूर्त पर न होने पर कालांतर में पति-पत्नी में कलह उत्पन्न हो सकती है । इस कारण सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय ही अग्निहोत्र करने का महत्त्व है ।
४. अग्निहोत्र साधना के रूप में प्रतिदिन करना आवश्यक होने का कारण
अग्निहोत्र करना यह नित्योपासना है । यह एक व्रत ही है । ईश्वर ने हमें यह जीवन दिया है । इसलिए वह हमें प्रतिदिन पोषक सब कुछ देता रहता है । इस हेतु प्रतिदिन कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रतिदिन अग्निहोत्र करना, यह हमारा कर्तव्य है तथा वह साधना के रूप में प्रतिदिन करना भी आवश्यक है ।
संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘अग्निहोत्र’
अणुयुद्ध के कारण होनेवाले प्रदूषण से रक्षा के उपाय : अग्निहोत्र
अग्निहोत्र का महत्त्व ध्यान में रख प्रतिदिन अग्निहोत्र करें !
यज्ञ का प्रथमावतार ‘अग्निहोत्र’के विषय में वैज्ञानिक शोध !