ईश्वर की कृपा संपादन करने का सुलभ मार्ग है ‘प्रार्थना’ !

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‘भगवान अथवा गुरु की शरण जाकर याचना करके मनोवांछित फल मांगना, अर्थात प्रार्थना । मन से की गई प्रार्थना के कारण भगवान एवं गुरु का कृपाशीर्वाद निरंतर मिलता है ।

प्रार्थना से होनेवाले लाभ

१. चिंता न्यून हो जाती हैं और भगवान पर श्रद्धा बढती है ।
२. जो बातें असंभव लगती हैं, वे संभव हो जाती हैं ।
३. साधना की अडचनें न्यून हो जाती हैं ।
४. अहं शीघ्रता से घटता है ।
५. आसुरी शक्ति से रक्षा होती है ।

विद्यार्थियों के करने योग्य प्रार्थनाएं

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पढाई आरंभ करने से पूर्व प्रार्थना करते हुए

१. कुलदेवता

‘आपकी कृपा मुझ पर सदा बनी रहे और मुझे आपके नामजप का सतत स्मरण रहने दें !’

२. श्री गणेशजी

‘आप विघ्नहर्ता एवं बुद्धि के दाता हैं । मेरी पढाई में आनेवाली बाधाएं दूर होने दीजिए । मेरी पढाई अच्छी होने हेतु आप ही मुझे सुबुद्धि और शक्ति प्रदान कीजिए ।’

३. श्री सरस्वतीदेवी

‘आप विद्या की देवी हो । इसलिए पढाई में आप ही मेरा मार्गदर्शन करें ।’

प्रार्थना क्यों करनी चाहिए ?

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प्रार्थना करते हुए

‘देवता अथवा गुरु की शरण जाकर मनोवांछित फल याचना करके मांगना, अर्थात प्रार्थना । प्रार्थना से भगवान एवं गुरु का कृपाशीर्वाद निरंतर मिलता है । चिंता न्यून हो जाती हैं और भगवान पर श्रद्धा बढती है । जो बातें असंभव लग रही थीं, वे संभव हो जाती हैं और आसुरी शक्तियों से रक्षा होती है ।’

प्रार्थना करने के कुछ उदाहरण

श्री अन्नपूर्णादेवी

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श्री अन्नपूर्णादेवी को प्रार्थना करते समय

‘आपकी कृपा से मिले इस अन्न के सेवन से मुझे साधना करने के लिए / कार्य करने के लिए शक्ति और स्फूर्ति मिलने दें । इस अन्न का सेवन मुझसे नामजप सहित और उपास्यदेवता के प्रति / गुरु के प्रति भाव जागृत रखकर होने दें ।’

‘मेरे अन्नमयकोष में अन्नसंबंधी जो भी वासना हैं, वह नष्ट होने दें । इस अन्नद्वारा गुरुकार्य के लिए आवश्यक शक्ति और विचार मुझे मिलने दें । मेरा पहला निवाला इसलिए हो कि भगवान मेरे साथ सदैव रहें । दूसरा निवाला इसलिए कि मुझे भगवान के आशीर्वाद मिलें । तीसरा निवाला हनुमानजी जैसी भक्ति मिले । चौथा निवाला भगवान मुझसे साधना करवा लें । पांचवां निवाला मुझमें चैतन्य निर्माण होने हेतु हो । मेरा छठा निवाला मुझसे अध्यात्म का अभ्यास होने हेतु हो और सातवां निवाला हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु हो ।’

श्री गणेश

 

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श्री गणेशजी से प्रार्थना करते समय

‘आप विघ्नहर्ता और बुद्धिदाता हैं । आपकी कृपा से मेरी सेवा में / कार्य में आनेवाली सर्व अडचनों का निवारण होने दें । आप विघ्नहर्ता और बुद्धिदाता हैं । इसके साथ ही मुझे सेवा / कार्य योग्य प्रकार से करने की सुबुद्धि हो और अनिष्ट शक्तियों के कष्टों से मेरी रक्षा होने दें ! ‘

नामजप से मेरी प्राणशक्ति बढने दें और मेरा स्वास्थ्य अच्छा रहे । जिससे मुझसे राष्ट्र और धर्म कार्य होता रहे । आप आरंभ देवता है, इससे मेरी आध्यात्मिक प्रगति का आरंभ होने दें । आप बुद्धिमान हैं, इसलिए महर्षि व्यासजी ने महाभारत लिखने के लिए आपसे प्रार्थना की थी, इसका मुझे स्मरण रहने दें ।

श्री सरस्वतीदेवी

‘हे श्री सरस्वतीदेवी, आप विद्या की देवी हैं । गुरुसेवा में / मैंने हाथ में जो कार्य लिया है, उसमें मुझे योग्य मार्गदर्शन करें । संत ज्ञानेश्‍वर महाराजजी ने ’अभिनव वाग्विलासिनी’ कहकर आपका गुणगान किया है । आपसे प्रार्थना है कि अन्यों का मन जीतनेवाले शब्द मुझे सूझने दें ।’

ग्रामदेवता और क्षेत्रपालदेवता

‘हे …. (ग्रामदेवता का नाम) और …. (क्षेत्रपालदेवता का नाम), आप अनिष्ट शक्ति और अन्य संकटों से मेरी रक्षा करें और यहां का वातावरण मेरी साधना के लिए पोषक बनाएं ।’

अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होने हेतु उपास्यदेवता से की जानेवाली प्रार्थना

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‘हे … (उपास्यदेवता का नाम लें), मैं नामजप और साधना करता हूं, उनका फल भूत, पिशाच आदि अनिष्ट शक्तियों को न मिले । मेरी साधना में और गुरु के कार्य में बाधाएं निर्माण करनेवाली अनिष्ट शक्तियों का कष्ट शीघ्र दूर हो और मेरे आसपास निरंतर सुरक्षाकवच बना रहे, ऐसी आपसे प्रार्थना है ।’

राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना

‘हे श्रीकृष्णा, राष्ट्रद्रोही, धर्मद्रोही, अनिष्ट शक्तियां आदि विविध माध्यमों से राष्ट्र और धर्म पर होनेवाले आघात आपकी कृपा से निष्प्रभ होकर राष्ट्र और धर्म की रक्षा होने दें । हम सभी को राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक बल मिलने दें ।’

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ भावजागृति के लिए साधना’