प्रार्थना किसे कहते हैं एवं उससे क्या लाभ होता है ?

‘उषःकाल में प्रार्थना की कुंजी से दिन का द्वार खोलें और रात को प्रार्थना की कुंडी डालकर उसे बंद कर लें’, ऐसा सुवचन है । प्रार्थनाके साथ ही सर्वांग साधना करने पर ही जीवन में निरंतर आनंद प्राप्त होगा !

१. प्रार्थना किसे कहते हैं ? इससे क्या लाभ होता है ?

भगवान के समक्ष विनम्र होकर इच्छित वस्तु उत्कंठा पूर्वक मांगने को ‘प्रार्थना’ कहते हैं । प्रार्थना में आदर, प्रेम, विनती, श्रद्धा और भक्तिभाव अंतर्भूत हैं । भगवान से प्रार्थना करने से आशीर्वाद तथा कार्य का इच्छित फल मिलता है । साथ ही आत्मशक्ति एवं आत्मविश्वास में वृद्धि होती है । इससे कार्य उत्तम और सफल होता है । मन की शांति मिलती है । स्थिर और शांत मन से किया गया कोई भी काम अच्छा होता है ।’ अब यह वैज्ञानिक प्रयोगोंद्वारा भी सिद्ध हो गया है कि प्रार्थना से व्यक्ति को व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं ।’ (मासिक ‘ऋषि प्रसाद’, नवंबर २०१०) व्यक्ति के हाथों कोई चूक हो गई हो, तो प्रार्थना कर ईश्वर अथवा गुरु की शरण में जाने पर वे क्षमा कर देते हैं ।

२. प्रकार

इसके दो प्रकार हैं – सकाम और निष्काम प्रार्थना ।

सकाम प्रार्थना

सकाम प्रार्थना अर्थात ‘स्वयं की इच्छापूर्ति, ऐहिक सुख आदि के लिए की जानेवाली प्रार्थना ।

उदाहरण : ‘हे भगवान, मुझे ढेर सारा धन मिल जाए’, ‘हे प्रभु, मेरा पेटदर्द दूर हो जाए’ इत्यादि ।

निष्काम प्रार्थना

निष्काम प्रार्थना अर्थात जिस प्रार्थना में कोई लौकिक मांग न हो । भगवान के चरणों में आत्म-समर्पण होता है । इस प्रकार की प्रार्थना से हमारे अहंकार और वासनाओं का लय होकर आध्यात्मिक उन्नति होती है । आध्यात्मिक उन्नति अथवा गुरुकार्य के संदर्भ में की गई प्रार्थना भी निष्काम श्रेणी की होती है ।

उदाहरण : ‘हे भगवन्, आपको अपेक्षित धर्मकार्य मुझसे करवा लीजिए ।’ – पू. डॉ. वसंत बाळाजी आठवले, चेंबूर, मुंबई (वर्ष १९८०)

३. प्रार्थना, बंधनरहित साधना है ! ऐसा क्यों ?

प्रार्थना को स्थल, काल एवं शौच-अशौच का बंधन नहीं है । सवेरे उठने से लेकर रात सोने तक थोडे-थोडे अंतराल पर और केवल दु:ख में ही नहीं, सुखके क्षणों में भी प्रार्थना करें । नामजप के समान ही प्रार्थना भगवान के सामने, घर में, आंगन में, कार्यालय में, खेत में, पाठशाला में, उपाहारगृह में, चिकित्सालय में, यात्रा करते समय, आसंदी पर (कुर्सी पर) बैठकर, बिस्तर पर लेटकर आदि कहीं भी कर सकते हैं । प्रार्थना एकाग्रता से करने की वृत्ति बनने के (आदत होने के) लिए प्रारंभ में उसे भगवान के सामने करना इष्ट है । तत्पश्चात धीरे-धीरे अन्य स्थानों में भी करें । इसके साथ ही नामजप के समान ही प्रार्थना के संदर्भ में भी शुचिर्भूतता, जननाशौच-मरणाशौच (सूतक) आदि बंधनों का पालन करने की आवश्यकता नहीं होती ।

४. प्रार्थना कैसे करें ?

१. प्रार्थना के समय मन स्थिर और शांत रखें ।

२. नमस्कार की मुद्रा के समान हाथ जोडें ।

३. ‘देवता अथवा गुरु प्रत्यक्ष हमारे सामने हैं’, ऐसी कल्पना करें अथवा देवता के / गुरु के चरण आंखों के सामने लाएं ।

४. कुछ क्षण देवता अथवा गुरु के चरणों पर मन एकाग्र करें ।

५. प्रार्थना स्पष्ट शब्दों में करें । प्रार्थना की वृत्ति (आदत) बनाने के लिए आरंभ में मुख से प्रार्थना का उच्चारण करना सुविधाजनक होता है । आगे प्रार्थना मन ही मन करें ।

६. प्रार्थना के शब्द और अर्थ पर मन केंद्रित करें ।

७. प्रार्थना केवल पढें नहीं; अपितु प्रार्थना के माध्यम से देवता से / गुरु से स्पष्टरूप से बोलने का प्रयास करें, उदा. ‘मेरी साधना में आनेवाली बाधाएं दूर होने दीजिए’, यह प्रार्थना करते समय साधना में बार-बार आनेवाली बाधाओं का स्मरण कर सुनिश्चितरूप से देवता को / गुरु को बताएं ।

८. ‘देवता ने / गुरु ने ही प्रार्थना करवा ली’, इस हेतु देवता के / गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें ।

संदर्भ : सनातन निर्मित लघुग्रंथ ‘प्रार्थना‘