भाव का महत्त्व

साधक के जिवन में भाव का महत्त्व

  • ‘भाव में आनंद है । भाव के पश्‍चात शांति का चरण है । भाव की स्थिति में रहना कठिन होता है । उसके लिए निरंतर शरणागत भाव से रहने हेतु प्रयास करने होंगे । भाव के स्तरपर स्थित साधकों की प्रार्थना ईश्‍वर को सुननी ही पडती है ! भाव-भक्ति बढने से शक्ति बढती है ।

  • चीनी की मिठास जिस प्रकार से शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है, उसी प्रकार से भाव भी शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता । निरंतर ईश्‍वर के अनुसंधान में बने रहने का सबसे निकट मार्ग है निरंतर भावावस्था में रहने का प्रयास करना ।

  • भाव का अर्थ अध्यात्म का ‘अ’। उसके उत्पन्न होनेतक साधक की साधना मानसिक स्तर की होती है और भाव उत्पन्न होनेपर वह आध्यात्मिक स्तरपर आरंभ होती है ।’

‘भाव’ का अर्थ ईश्‍वर की ओर जाने हेतु पारपत्र (पासपोर्ट) !

व्यावहारिक जीवन जीते समय कभी सुख,
तो कभी दुख अनुभव करते हैं । सुख-दुख की शृंखला
सतत चालू ही रहती है, और इसी सुख-दुख के चक्र में अटके हुए हैं ।

संत तुकाराम महाराजजी का कथन है कि, ‘सुख राई जैसा जान पडता है और दुख पर्वत समान’ – इसे अनेक लोगों ने अनुभव किया होगा । कलियुग में साधारणतः मानवीय जीवन में सुख २५ प्रतिशत और दुख ७५ प्रतिशत रहता है । आनंदप्राप्ति कैसे हो सकती है, यह पता न होने से प्रत्येक व्यक्ति पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि द्वारा थोडी देर के लिए ही सही, सुख पाने का प्रयत्न करता है; उदाहरणार्थ, मनपसंद पदार्थ खाकर । साथ ही, वह दुख दूर करने का प्रयत्न भी करता है; उदाहरणार्थ, जब उसे कुछ बीमारियां होती हैं, तब वह औषधि लेकर वेदना दूर करने का प्रयत्न करता है, दूरदर्शन संच (टी.वी.) में कुछ तकनीकी बिगाड होने पर वह उसे ठीक करता है, इसके यह दुख कुछ कालावधि के लिए दूर हो सकता है, परंतु सदा के लिए ही वह दूर हो जाएगा, इसकी हम निश्‍चिती नहीं दे सकते । जैसे बुढापा, गंभीर रोग एवं मृत्यु के बारे में मानव कुछ भी नहीं कर सकता । संसार में निश्‍चिति नहीं है, पग-पग पर संकट आते हैं । ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक स्तर के उपाय (उदा. नामजप, प्रार्थना, ईश्‍वर का स्मरण) ही काम आते हैं, उसी के साथ इसके कारण परमार्थ में आनंदप्राप्ति भी निश्‍चित है ।

केवल मनुष्य की ही नहीं, अपितु अन्य प्राणिमात्र की भागदौड भी अधिकाधिक सुखप्राप्ति के लिए ही होती है । जैसे चींटियों को अपने भोजन के लिए दाना-दाना इकट्ठा करना पडता है, तब उन्हें इसके लिए अथक संघर्ष करना पडता है । फिर भी अपने आनंद के लिए वे ऐसा करती रहती हैं । इससे हमें ध्यान में आता है कि इतना छोटासा जीव भी आनंदप्राप्ति हेतु प्रयत्नशील है । इसीप्रकार प्रत्येक व्यक्ति भी पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धिद्वारा सुख भोगने का प्रयत्न करता है; परंतु सुख तात्कालिक होता है; जबकि आत्मसुख अर्थात आनंद चिरकालीन एवं सर्वोच्च श्रेणी का होता है ।

यह आनंद केवल ईश्‍वर ही दे सकता है, क्योंकि  हम सभी सुख-दुख के चक्र में फंसे हैं; ईश्‍वर एकमात्र सुख-दुख से परे है । उसका स्वरूप सत्-चित्-आनंदस्वरूप है ।

इसलिए खरा आनंद ईश्‍वर के स्मरण में ही है । आपमें से अनेक जन अपने इष्ट देवता की उपासना करते रहेंगे, किसी गुरु का मार्गदर्शन भी आपने लिया होगा अथवा अध्यात्म के विषय में कथा-कीर्तन सुनते रहेंगे । कुछ जन ध्यान करते रहेंगे, कुछ जन नामजप करते रहेंगे । यह सब अध्यात्म से संबंधित है; परंतु यह कृतियां हम कुछ समय के लिए; परंतु प्रत्येक क्षण जीना हमारे लिए असंभव है । वह आनंद उतने कालावधि के लिए सीमित न रखते हुए, दिनभर का प्रत्येक क्षण अर्थात २४ घंटे आनंद अनुभव करना चाहिए । वह आनंद कब मिलता है ? जब हम ईश्‍वर का सतत स्मरण करते हैं । आनंदस्वरूप ईश्‍वर के सतत स्मरण से आनंद का संस्कार हम पर होता है । ईश्‍वर का स्मरण का ही दूसरा नाम है भाव !

भाव – शब्दार्थ

जिसके कारण हमारे अंदर के तेजतत्त्व की अर्थात परमेश्‍वर तत्त्व की वृद्धि होती है, वह है भाव ! भगवान का अस्तित्व प्रत्येक कृति करते समय तथा प्रत्येक क्षण अनुभव करना, प्रत्येक कृति करते समय भगवान के अस्तित्व की अनुभूति लेना, अथवा ईश्‍वर के अस्तित्व का भान होना, यही है भाव !

दैनंदिन जीवन में हम दिनभर कुछ न कुछ करते हैं, तब प्रत्येक कृति करते समय हमें स्वयं के अस्तित्व का भान रहता है । मुझे क्या करना है, कैसे करना है, ऐसे ही स्वरूप के विचार दिनभर रहते हैं । और उन्हीं विचारों का संस्कार हमारे मन पर रहता है । उसमें भी ईश्‍वर का अस्तित्व निर्माण करने का जो भान हमारे मन पर होता है और उसे अनुभव करने के लिए हम जो प्रयत्न करते हैं, वह है भाव !

भाव का महत्त्व

जिसप्रकार हमें जीवन जीने के लिए प्रत्येक श्‍वास आवश्यक है, उसीप्रकार जीवन में साधना भी आवश्यक है और उस साधना को भाव की जोड देना आवश्यक है । साधना में भाव का अत्यधिक महत्त्व है । ‘जहां भाव, वहीं ईश्‍वर’ यह हमने अनेक बार अनुभव किया है । अनेक भगवद्भक्त तथा संतों के उदाहरणों से हमें वह सीखने मिलता है । जैसे त्रेतायुग में प्रभु श्रीरामजी का अवतार हुआ, तब श्रीरामभक्त हनुमान, लक्ष्मण, शबरी जैसे  भक्त थे । द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्णजी का अवतार हुआ तब राधा, गोपियां, सुदामा, अर्जुन जैसे श्रीकृष्णभक्त थे और अब कलियुग में भी अनेक संतों के उदाहरण हैं, जैसे संत मीरा, संत कबीर, संत तुलसीदासजी, रामकृष्ण परमहंस, संत नामदेव आदि । उन्होंने जो भाव अनुभव किया, वही भाव हम भी आज स्वयं में अनुभव करनेवाले हैं ।

ईश्‍वर नें जब हमें जन्म दिया, तो उसी समय प्रत्येक में भाव का बीज बोया ही है । परंतु हमारे मन के अहंकार के कारण अथवा कभी-कभी कुछ परिस्थितिवश हम वह भाव स्वयं में अनुभव नहीं कर पाते ।

 

अभी यह भाव जागृत कैसे करना है ? या यदि भाव है,
तो उसका स्वरूप कैसा होता है, ऐसे कुछ सूत्र समझकर लेंगे ।

भाव के विभिन्न स्वरूप !

प्रत्येक का ईश्‍वर के प्रति होनेवाला भाव यह अलग-अलग प्रकार का हो सकता है । कुछ लोगों का भाव उनकी कृतियों से व्यक्त भी होता है, जैसे कोई दिनभर सतत नामजप करता है, कोई सवेरे जब घर में देवतापूजन करता है, इस भाव से करता है जैसे प्रत्यक्ष ईश्‍वर का पूजन ही कर रहा है अथवा ईश्‍वर की मूर्ति देखकर किसी की आंखों से अश्रु बहने लगते हैं, यह उसके ईश्‍वर के प्रति भाव के कारण होता है ।

ईश्‍वर की कृपा का स्मरण कर, उसकी आंखें भर आती हैं, अथवा आखों से अश्रु बहने लगते हैं । अश्रुओं के माध्यम से उनके मन में ईश्‍वर के प्रति जो भाव है वह व्यक्त होता है । इसे ही भावजागृति अर्थात मन का भाव जागृत होना, ऐसे कहते हैं ।

यह भाव का एक प्रकार है । उसीप्रकार भाव का दूसरा भी एक प्रकार है, जिसमें वह व्यक्ति दिनभर ईश्‍वर के विषय में कुछ भी न करते हुए दिखाई देगा; परंतु दिन की प्रत्येक कृति ईश्‍वर को अनुभव करते हुए ही करता है । अथवा किसी की दिन की शुरुआत भी ईश्‍वर को प्रार्थना करते हुए होती है । इसप्रकार अनेक उदाहरण हमें प्रकृति अनुसार भाव दर्शाते हैं । इन सभी सूत्रों से सिद्ध होता है कि ईश्‍वर के प्रति मन में होनेवाला भान अथवा प्रेम भी भाव है । जिस माध्यम से हम ईश्‍वर से जुड सकते हैं ।

भावजागृति के प्रयास

भावजागृति के लिए कैसे प्रयास करने चाहिए, यह अभी हम समझकर लेंगे ।

हम स्थूल से जैसे शरीर से कृति करते हैं, वही कृति मन से करते हैं अर्थात इसे मन के स्तर पर करते हैं । इसी को व्यवहारिक भाषा में ‘कल्पना करना’ कहते हैं । अनेक बार शरीर को मर्यादा होती है, परंतु मन को कोई बंधन नहीं है ।