महाशिवरात्रि का महत्त्व एवं शिवजी काे अभिषेक करने का शास्त्राधार

सारिणी

१. महाशिवरात्रि के विषय में

२. महाशिवरात्रि का शास्त्रीय दृष्टि से महत्त्व

३. शिवजी काे अभिषेक करने का महत्त्व एवं शास्त्राधार

४. शिवपिंडी पर संततधार अभिषेक करने के प्रमुख कारण

५. बिल्वार्चन

६. महाशिवरात्रि के पर्व पर शिवजी की पूजा में केवडे के सुगंधवाला इत्र एवं उदबत्ती का उपयोग क्यों करें ?


१. महाशिवरात्रि के विषय में

पृथ्वीका एक वर्ष स्वर्गलोकका एक दिन होता है । पृथ्वी स्थूल है । स्थूलकी गति अल्प होती है अर्थात स्थूलको ब्रह्मांडमें यात्रा करनेके लिए अधिक समय लगता है । देवता सूक्ष्म होते हैं एवं उनकी गति भी अधिक होती है । इसलिए उन्हें ब्रह्मांडमें यात्रा करनेके लिए अल्प समय लगता है । यही कारण है कि, पृथ्वी एवं देवता इनके कालमानमें एक वर्षका अंतर होता है । शिवजी रात्री एक प्रहर विश्राम करते हैं । उनके इस विश्रामके कालको ‘महाशिवरात्रि’ कहते हैं । महाशिवरात्रि दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्रमें शक संवत् कालगणनानुसार माघ कृष्ण चतुर्दशी तथा उत्तर भारतमें विक्रम संवत् कालगणनानुसार फाल्गुण कृष्ण चतुर्दशीको आती है ।

देखिए, महाशिवरात्र के लघु-चलचित्र / वीडियो (Video 25)

 

२. महाशिवरात्रि का शास्त्रीय दृष्टि से महत्त्व

महाशिवरात्रिको शिवजी जितना समय विश्राम करते हैं, उस कालको ‘प्रदोष’ अथवा ‘निषिथकाल’ कहते है । इस समय शिव ध्यानावस्थासे समाधि-अवस्थामें जाते हैं । पृथ्वीपर यह काल सर्वसामान्यतः एक से डेढ घंटेका होता है । इस कालमें किसा भी मार्गसे, ज्ञान न होते हुए, जाने-अनजानेमें उपासना होनेपर भी अथवा उपासनामें कोई दोष अथवा त्रुटी भी रहे, तो भी उपासनाका १०० प्रतिशत लाभ होता है । इस दिन शिवतत्त्व अन्य दिनोंकी तुलनामें एक सहस्रगुना अधिक कार्यरत रहता है । इस दिन की गई शिवकी उपासनासे शिवतत्त्व अधिक मात्रामें ग्रहण होता है । इस कालावधिमें शिवतत्त्व अधिकसे अधिक आकृष्ट करनेवाले बिल्वपत्र, श्वेतपुष्प इत्यादि शिवपिंडीपर चढाए जाते हैं । इनके द्वारा वातावरणमें विद्यमान शिवतत्त्व आकृष्ट किया जाता है । शिवतत्त्वके कारण अनिष्ट शक्तियोंसे हमारी रक्षा होती है । महाशिवरात्रिके दिन शिवतत्त्वके अधिक मात्रामें कार्यरत होनेसे आध्यात्मिक साधना करनेवालोंको विविध प्रकारकी अनुभूतियां होती हैं ।

३. शिवजी का अभिषेक करने का महत्त्व एवं शास्त्राधार

महाशिवरात्रिपर कार्यरत शिवतत्त्वका अधिकाधिक लाभ लेने हेतु शिवभक्त शिवपिंडीपर अभिषेक भी करते है । इसके रुद्राभिषेक, लघुरुद्र, महारुद्र, अतिरुद्र ऐसे प्रकार होते हैं । रुद्राभिषेक अर्थात रुद्रका एक आवर्तन, लघुरुद्र अर्थात रुद्रके १२१ आवर्तन, माहारुद्र अर्थात ११ लघुरुद्र एवं अतिरुद्र अर्थात ११ महारुद्र होते है ।

४. शिवपिंडी पर संततधार अभिषेक करने के प्रमुख कारण

४ अ. शिव-पार्वतीको जगतके माता-पिता मानते हैं । अभिषेकपात्रसे गिरनेवाली संततधारके कारण पिंडी एवं अरघा नम रहते हैं । अरघा योनिका प्रतीक है । जगन्माताकी योनि निरंतर नम रहना अर्थात गीली रहना शक्तिके निरंतर कार्यरत होनेका प्रतीक है । शक्ति शिवको कार्यान्वित करनेका कार्य करती है । शिव तत्त्व कार्यान्वित होना अर्थात शिवका निर्गुण तत्त्व सगुणमें प्रकट होना । अभिषेक करनेसे पूजकको शिवकी सगुण तरंगोंका लाभ मिलता है ।

४ अा. पिंडीमें शिव-शक्ति एकत्रित होनेके कारण अत्यधिक मात्रामें ऊर्जा निर्मित होती है । सामान्य दर्शनार्थियोंमें यह ऊर्जा सहनेकी क्षमता न होनेके कारण उन्हें इस उर्जासे कष्ट हो सकता है । इसलिए पिंडीपर निरंतर पानीकी धारा प्रवाहितकी जाती है । इससे दर्शनार्थियोंके लिए वहांकी शक्ति सहने तथा ग्रहण करनेयोग्य बनती है ।

५. बिल्वार्चन

महाशिवरात्रिपर कुछ लोग विशेष रूपसे शिवजीको बिल्वार्चन करते हैं । शिवजीके नामका जप करते हुए अथवा उनका एक-एक नाम लेते हुए शिवपिंडीपर बिल्वपत्र अर्पण करनेको बिल्वार्चन कहते हैं । इस विधिमें शिवपिंडीको बिल्वपत्रोंसे संपूर्ण आच्छादित करते हैं । शिवजीको अगरबत्ती दिखाते समय तारक उपासनाके लिए चमेली एवं हीना इन गंधोंकी अगरबत्तियोंका उपयोग किया जाता है तथा इन्ही सुगंधोंका इत्र अर्पण करते है । परंतु महाशिवरात्रिके पर्वपर शिवजीको केवडेके सुगंधवाला इत्र एवं अगरबत्तीका उपयोग बताया गया है ।

६. महाशिवरात्रि के पर्व पर शिवजी की पूजा में
केवडे के सुगंधवाला इत्र एवं अगरबत्ती का उपयोग क्यों करें ?

केवडेमें ज्ञानतरंगोंके प्रक्षेपणकी क्षमता अधिक होती है । केवडा ज्ञानशक्तिके स्तरपर मारक रूपी कार्य करता है । इसलिए उसे पूर्णतः लयकारी कहा गया है । पूजाविधि लयकारी शक्तिसे संबंधित नहीं है, इसलिए जहांतक संभव हो, शिवपूजनमें केवडेका उपयोग नहीं करते । तत्पश्चात भी अनिष्ट शक्तियोंके कष्टोंपर उपायस्वरूप केवडेके पत्तेका उपयोग किया जाता है । इस दृष्टिसे महाशिवरात्रिके पर्वपर शिवजीके मारक रूपकी उपासनाके लिए केवडेके सुगंधवाला इत्र एवं अगरबत्तीका उपयोग करनेके लिए कहा गया है ।

 संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘शिव

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