पंद्रहवां संस्कार : समावर्तन संस्कार 

व्याख्या

ब्रह्मचर्यव्रत धारण किए विद्यार्थी के गुरुगृह से स्वगृह लौटने को समार्वतन कहते हैं ।

 

विधि

इस समय आगे दी गई बातें मंत्रपूर्वक करते हैं – वस्त्रधारण, काजलधारण, कुंडलधारण, पुष्पमालाधारण, पादत्राणधारण, छत्रधारण, दंडधारण, स्वर्णमणिधारण । अब पुत्र गृहस्थाश्रम में लौटनेवाला है, अतः उसे इस विधि द्वारा गृहस्थाश्रम में रहना सिखाया जाता है ।

स्नातक

अर्थ – विद्याध्ययन हो जाने पर, कभी-कभी पुरुष का विवाह होने तक कुछ काल का अंतर होता है । इस मध्य की अविवाहित अवस्था को स्नातकावस्था कहते हैं अर्थात, ब्रह्मचर्यावस्था एवं गृहस्थावस्था के मध्य की यह अवस्था है । समावर्तन हो जाने के उपरांत विवाह तक की कालावधि में द्विज स्नातक होता है ।

प्रकार

स्नातकों के तीन प्रकार हैं – विद्यास्नातक, व्रतस्नातक एवं विद्याव्रतस्नातक । विद्यास्नातक वह है जो ब्रह्मचर्याश्रम के बारह वर्ष का काल पूर्ण होने से पहले वेेदाध्ययन कर समावर्तन करता है; उपनयन, सावित्रीव्रत एवं वेदव्रत का अनुष्ठान कर वेद समाप्ति होने के पूर्व जो समावर्तन करता है, वह है व्रतस्ना तक तथा ब्रह्मचर्य के लिए पर्याप्त अवधि एवं वेदाध्ययन पूर्ण कर जो समावर्तन करता है, वह है विद्याव्रतस्नातक ।

स्नातकनियम

अ. बिना कारण संध्याकाल में अथवा रात्रि में, तद्वत ही नग्न होकर स्नान नहीं करूंगा ।

आ. (विवाहके उपरांत) मैथुन के अतिरिक्त अन्य समय नग्न स्त्री को नहीं देखूंगा ।

इ. वर्षा के समय यात्रा नहीं करूंगा अथवा दौडूंगा नहीं ।

ई. वृक्ष पर नहीं चढूंगा ।

उ. कुएं में नहीं उतरूंगा ।

ऊ. हाथ चला कर तैर कर नदी को पार नहीं करूंगा ।

ए. जिस कारण से प्राण संकट में पड सकते हैं, ऐसा कृत्य नहीं करूंगा ।

इन नियमों का मैं पालन करूंगा ।, ऐसा संकल्प करन के पश्‍चात कौपीन (लंगोटी) एवं मेखला छोडने चाहिए ।

 

अशौच

उपनयन हो जाने पर, ब्रह्मचर्याश्रम में रहते हुए यदि अपने किसी संबंधी की मृत्यु हो जाए, तो समावर्तन हो जाने पर तीन दिन तक उसका अशौच (सूतक) पालन करें । एक से अधिक परिजनों की मृत्यु हुई हो, तो भी अशौच का पालन केवल तीन दिन ही करें ।

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ सोलह संस्कार

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