भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनकर जिसने निद्रानाश से मुक्ति पाई, वह इटली का तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी !

 

भारतीय शास्त्रीय संगीत गायक पंडित
ओंकारनाथ ठाकुर ने मुसोलिनी को राग ‘पूरिया’ सुनाकर निद्राधीन किया !

  • ऐसे प्रसंगों से अद्वितीय हिन्दू संस्कृति का महत्त्व अधोरेखित होता है !  
  • आज के समय में हिन्दुओं को सूर्यप्रकाश की भांति दीप्तमान संस्कृति तथा सीख का विस्मरण होना बडा दुर्भाग्यजनक ! इसके लिए हिन्दुओं को धर्मशिक्षा देना ही समय की मांग है, इसे ध्यान में लें !

वर्ष १९२२ से १९४३ तक इटलीपर अधिराज्य चलानेवाला तथा विश्‍व में कुख्यात तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ! एक बार वह निद्रानाश के विकार से ग्रस्त हुआ । उसके लिए उसने अनेक प्रकार के उपचार लिए; परंतु उसका उपयोग नहीं हो रहा था । उसके अनेक प्रेमिकाओं में से एक प्रेमिका बंगाल की थी । उसे संगीत का अच्छा ज्ञान था । जब उसने मुसोलिनी को भारतीय संगीत में निद्रानाश की चिकित्सा की क्षमता है, ऐसा बताया, तब मुसोलिनी उसपर हंस पडा । उसी अवधि में अर्थात वर्ष १९३३ में भारतीय शास्त्रीय संगीत गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर युरोप की यात्रापर थे । जब वे रोम पहुंचे, तब मुसोलिनी की उक्त बंगाली प्रेमिका पंडित ठाकुर से मिली और उन्हें मुसोलिनी के इस विकार के विषय में बताया और उन्हें मुसोलिनी के बंगलेपर आने हेतु आमंत्रित किया ।


तब पंडित ठाकुर मुसोलिनी के निवासपर पहुंचे और उन्होंने मुसोलिनी से गायन प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी । उन्होंने उस रात मुसोलिनी को शाकाहारी भोजन ग्रहण करने का अनुरोध किया । भोजन के पश्‍चात पंडित ठाकुर ने राग पुरिया के आलाप लेना आरंभ किया । इस राग में ऐसा एक चमत्कारिक प्रकार था कि जिससे मुसोलिनी केवल १५ मिनटों में ही निद्राधीन हुआ । दूसरे दिन पंडित ठाकुर को मुसोलिनी के २ पत्र मिले । एक पत्र में उसने पंडित ठाकुर का धन्यवाद किया था, तो दूसरे पत्र में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की वहां के विश्‍वविद्यालय के संगीत विभाग के निदेशक के रूप में नियुक्ति किए जाने का उल्लेख था । पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने मुसोलिनी के इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया; क्योंकि उन्हें अपनी मातृभूमि को वापस जाना था ।

उसके पश्‍चात मुसोलिनीने ठाकुर को अपने अतिथि के रूप में कुछ दिनोंतक रख लिया । पंडितजी द्वारा प्रस्तुत अलग-अलग रागों से मुसोलिनी को विविध अनुभूतियां भी हुइँ । एक दिन पंडितजी ने मुसोलिनी के सामने राग छायानत गाया, तब मुसोलिनी के आंखों से आंसू आने लगे । उसने पंडितजी से कहा, ‘‘मेरे जीवन में मैने इतना अच्छा अनुभव कभी नहीं किया था ।’’ (भारतीय राग सुनते समय मुसोलिनी जैसे सबसे क्रूर तानाशाह की आंखों में भी आंसू आते हैं, इससे भारतीय संगीत की अलौकिकता ध्यान में आती है ! – संपादक)

कालांतर से पंडित मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय की स्थापना की । जब इस विश्‍वविद्यालय में संगीत एवं कला विभाग की स्थापना की गई, तब पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ही इस विभाग के पहले अधिष्ठाता बन गए । केवल एक कलाकार और शिक्षक के रूप में ही नहीं, अपितु एक प्रशासक के रूप में भी उन्होंने अपने कार्य की मुद्रा अंकित की ।

(संदर्भ : संगीत क्षेत्र से संबंधित प्रसिद्ध अमेरिकी जालस्थल bibliolore.org’)

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