कुंभमेलेके मूल प्रयोजनका ध्यान रखें !

सारिणी


१. धर्मचर्चा

कुंभमेलेमें साधु-संत एवं हिंदू समाज बडी संख्यामें एकत्रित होता है; क्योंकि पुण्यकालमें पर्वस्नान करनेके साथ ही एकत्रित धर्मचर्चा करनेका भी बडा महत्त्व है । कुंभमेलेके उपलक्ष्यमें संपूर्ण भारतवर्ष मात्र धर्मके एक सूत्रपर एकत्रित होता है, अतः उसमें हिंदुओंकी धार्मिक तथा आध्यात्मिक समस्याओंपर विचारविमर्श करनेके साथ-साथ हिंदू धर्मियोंकी वर्तमान स्थिति, धर्मनिर्णयोंमें कालपरिस्थितिनुसार करनेयोग्य परिवर्तन, श्रद्धालुओंको हिंदू धर्मकी शिक्षा प्रदान करना, इतना ही नहीं; अपितु हिंदुओंकी समस्याओंका समाधान करना इत्यादि सूत्रों पर भी विचारविमर्श करना अपेक्षित है । आज कुंभक्षेत्रमें धर्मचर्चाका स्वरूप केवल रामायण तथा महाभारतकी कथाओंका श्रवण करनेतक ही सीमित रह गया है ।

 

२. धर्मजागृति

कुंभमेला धर्मचर्चा करनेके साथ ही श्रद्धालुओंका धर्मप्रबोधन करनेका महत्त्वपूर्ण स्थान है ।

 

२ अ. साधु-संत एवं हिंदू संगठनोंद्वारा
‘कुंभमेला अर्थात धर्मविषयक प्रबोधन करनेका सुनहरा अवसर’, ऐसा दृष्टिकोण रखना आवश्यक !

‘२००३ में नासिकके कुंभमेलेमें कुछ स्थानोंपर साधुओंके अखाडे एवं संप्रदायोंकी ओरसे पर्वकालके उपलक्ष्यमें यज्ञयाग, तो कुछ स्थानोंपर अखंड नामसंकीर्तन अथवा निर्धारित समयपर प्रवचनोंका आयोजन किया गया था; परंतु ‘हिंदू धर्मियोंकी विद्यमान स्थिति कैसी है’ एवं ‘हिंदुओंको उसपर क्या उपाय करना चाहिए’, इन विषयोंपर कहीं भी ठोस विचार प्रस्तुत नहीं किए गए । धर्मप्रबोधन निरंतर जारी रखा जानेवाला कृत्य है । इस समय ऐसा दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए कि इस पार्श्वभूमिपर साधु-संतोंके अखाडे एवं संप्रदायोंद्वारा ‘कुंभमेला अर्थात बडी संख्यामें एकत्रित होनेवाले सामान्य श्रद्धालुओंका धर्मप्रबोधन करनेका एक सुनहरा अवसर है’ । – डॉ. दुर्गेश सामंत, भूतपूर्व संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक (२८.९.२००३).

२ आ. कुंभमेलेमें राष्ट्र एवं धर्मके विषयमें सक्रिय धर्मजागृति करनेसे धर्महानिसे बचना संभव होगा !

‘२००४ में उज्जैनके कुंभमेलेमें सहस्त्रो साधु तथा सैकडों संत आए थे । उनकेद्वारा निर्मित बडे-बडे मंडपोंमें जगह-जगह प्रवचन चल रहे थे । कुछ स्थानोंपर ध्यानधारणा सिखाई जा रही थी । कोई प्राणायाम सिखा रहा था, तो कोई यज्ञयाग कर रहा था । इस अवसरपर राष्ट्र एवं धर्मके विषयमें उनमें पाई गई उदासीनताके कुछ उदाहरण आगे दे रहे हैं ।

२ इ अ. ऐसा कहीं भी नहीं पाया गया कि इन उपक्रमोंद्वारा ‘कोई सामान्यजनको राष्ट्र एवं धर्मकी रक्षा हेतु योग्य मार्गदर्शन कर कार्यप्रवण कर रहा है अथवा देशके भ्रष्ट राजनेता तथा अकार्यक्षम प्रशासनमें परिवर्तन लाने हेतु सक्रिय बना रहा है ।’

२ इ आ. सर्व साधुजन यही बताते थे कि ‘राष्ट्र एवं धर्मकी स्थितिमें सुधार लाने हेतु अध्यात्म ही चाहिए’; परंतु ऐसा कहीं दिखाई नहीं दिया कि धर्मके नामपर होनेवाले अनुचित कृत्योंको रोकने हेतु उनमेंसे कोई सक्रिय हो रहा है ।

२ इ इ. अधिकांश लोगोंके प्रवचनोंके विषय रामकथा अथवा भागवत ही थे; परंतु ये कथाएं श्रवण करनेवालोंमेंसे किसीको भी ऐसा प्रोत्साहन नहीं मिल रहा था कि ‘श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादिके आदर्शसे प्रेरित होकर दुष्टोंको दंड देना चाहिए ।’ यदि ऐसा होता, तो कुंभक्षेत्रमें देवताओंका अनादर होता न दिखाई देता ।

२ इ ई. उज्जैनमें सिंहस्थके लिए बाहरसे आए साधुजन महाकालेश्वरके प्रति अपनी श्रद्धा होनेकी बात कर रहे थे; परंतु इस क्षेत्रमें शंकर एवं हनुमान जैसी वेशभूषा कर भीख मांगनेवालोंको वैसा करनेसे किसीने भी परावृत्त नहीं किया । साधु-संतोंके प्रवचन अथवा कथाओंका निरूपण करना अथवा उससे संबंधित ध्वनिचक्रिकाएं (ऑडियो सीडी) बेचनेके लिए रखनेका अर्थ प्रबोधन नहीं ! उनका स्वयं कार्यप्रवण होना अथवा अपने अनुयायियोंको धर्महानिके विरोधमें कार्यप्रवण करना अथवा धार्मिक दृष्टिसे अनुचित कृत्योंके विषयमें जागृति करना, यही वास्तविक रूपमें धर्मप्रबोधन है । कुंभमेलेमें राष्ट्र एवं धर्मके विषयमें सक्रिय धर्मजागृति कर धर्महानि रोक सकते हैं !’ – डॉ. दुर्गेश सामंत, भूतपूर्व संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक (१२.९.२००४).

 

३. हिंदूसंगठन

३ अ. कुंभमेलेद्वारा हिंदुओंका धार्मिक संगठन करनेका
आद्य-शंकराचार्यजीका उद्देश्य उनके कालखंडमें साध्य हुआ;
परंतु विगत कुछ दशकोंसे वह साध्य नहीं हो रहा है, यह ध्यानमें आना

आद्यशंकराचार्यजीने कुंभमेलेद्वारा हिंदुओंका धार्मिक संगठन करनेकी संकल्पना प्रस्तुत की थी । उन्हें लगता था कि हिंदू धर्मियोंमें धार्मिक विचारोंका आदान-प्रदान करना, धर्मविषयक विचारविमर्श कर उनकी संकुचित वृत्ति नष्ट करना, साथ ही उनका संगठन करना, ऐसे धर्महितकारी कृत्योंके लिए कुंभमेलेका लाभ उठाना आवश्यक है; परंतु विगत कुछ दशकोंके कुंभमेलोंका विचार करनेपर आद्यशंकराचार्यजीको अपेक्षित ऐसा धर्महितका विचार साध्य होता नहीं दिखता । आजकी स्थितिमें शैव तथा वैष्णव पंथीय साधुओंके अखाडोंमें शत्रुताकी भावना बढने लगी है । इन साधुओंके मन मिलाने एवं सश्रद्ध हिंदुओंके संगठन हेतु सामर्थ्यशाली हिंदुत्ववादी संगठनोंको आगे आना चाहिए !

 

३ आ. कुंभमेलेमें हिंदुत्ववादी संगठनोंद्वारा हिंदुत्वके लिए
अधिकाधिक पूरक उपक्रमोंका आयोजन आवश्यक !

‘आजतक सामर्थ्यशाली संगठनोंद्वारा कुंभमेलेमें हिंदूसंगठनका दृष्टिकोण रखकर श्रद्धालुओं एवं प्रशासनके लिए सहायक निश्चित उपक्रम नहीं चलाया गया । २००३ में नासिकके कुंभमेलेमें सामर्थ्यशाली हिंदुत्ववादी संगठनोंका उल्लेखनीय कार्य दिखाई ही नहीं दिया । कुंभनगरीमें संतमहंतोंके दो दिवसीय धर्मसंसदका आयोजन करना तथा अपने नेताओंके चार रंगोंमें बडे चित्र, महंगे एवं श्रद्धालुओंको शुभकामनाएं देनेवाले भव्य फलक (होर्डिंग) सर्वत्र लगाना, यहांतक ही उनका कार्य सीमित था ।’ – डॉ. दुर्गेश सामंत, भूतपूर्व संपादक, ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक (२८.९.२००३)

३ इ. हिंदू समाजका संगठन करनेके लिए हिंदुत्ववादी संगठनोंको हिंदू समाजका विश्वास संपादित करना महत्त्वपूर्ण होता है । इस हेतु उन्हें समाजके सुख-दुःख एवं समस्याओंसे एकरूप होकर जनताकी सहायता करना आवश्यक है; क्योंकि हिंदू समाजके उत्थान हेतु सक्रिय रहना ही उनका कर्तव्य है । समाजसहायताके दृष्टिकोणसे कुंभक्षेत्रमें प्रथमोपचार सेवा, देवालयोंकी (मंदिरोंकी) स्वच्छता, यात्रा सुनियोजन, धर्मशिक्षा देनेवाले प्रवचन इत्यादि उपक्रम वे आयोजित कर सकते हैं । हिंदुत्वके लिए अधिकाधिक पूरक ऐसे उपक्रम हिंदुत्ववादी संगठनोंद्वारा आयोजित किए जानेसे कुंभक्षेत्रमें एकत्रित होनेवाला हिंदू समाज उनके पीछे ‘हिंदूशक्ति’के रूपमें दृढतासे खडा रहेगा !

 

३ ई. कुंभक्षेत्रमें संतोंके संगठनका आरंभ करना, हिंदूसंगठनकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य !

२००४ में उज्जैनकी कुंभनगरीमें पूर्वानुभवको देखते हुए अभूतपूर्व सिद्ध हों, इतने सर्व संप्रदायोंके अनेक संत आए थे; परंतु किसीने इन संतवृंद को एक मंचपर लाकर हिंदू राष्ट्र एवं धर्महितकारी कृत्य करनेके प्रयास नहीं किए ।

 

४. धर्मरक्षा

कुंभमेलेका एक अन्य प्रयोजन है ‘धार्मिक आक्रमणोंसे हिंदू समाजकी रक्षा कर उसे अभयदान देने हेतु साधु-संतोंके सम्मेलनोंका आयोजन करना ।’ वर्तमानमें इस प्रयोजनका विस्मरण होनेसे वर्तमान स्थितिमें ‘कुंभमेलेमें अखाडेके साधुओंद्वारा शस्त्र धारण करना’, एक कर्मकांड बन गया है ।

 

४ अ. धर्मरक्षाके लिए साधु-संतोंका आगे बढना अनिवार्य !

सांप्रत कालमें हिंदू धर्मीय चारों ओरसे संकटसे घिरे हुए हैं, इसलिए हिंदूसंगठन की सर्वाधिक आवश्यकता है । ऐसे समयमें हिंदू धर्मके संतश्रेष्ठोंको कुंभमेले जैसे पुण्ययोगका धर्मरक्षाके लिए लाभ उठाना चाहिए । कुंभपर्वके उपलक्ष्यमें विभिन्न राज्यों से कुंभक्षेत्रमें पदार्पण करनेवाले जगद्गुरु, धर्माचार्य अथवा संतमहंतोंसे समस्त देशवासियोंको धार्मिक नेतृत्वकी अपेक्षा है । हिंदू धर्मके इन साधु-संतोंको शपथ लेनी चाहिए, ‘सनातन वैदिक हिंदू धर्मकी रक्षा हेतु भारतवर्षके हिंदुओंको एकत्रित करेंगे’ एवं उसकी पूर्तिके लिए परिश्रम करना चाहिए । ऐसा होनेपर ही वास्तविक रूपमें कुंभपर्वका प्रयोजन धर्मरक्षा करनेवाला सिद्ध होगा !

 

५. हिंदू धर्मका पुनरुत्थान !

जिनमें श्रद्धाके बलपर गंगादर्शनकी आस है, ऐसे श्रद्धालु समस्त संकटोंसे संघर्ष करते हुए कुंभमेलेके अवसरपर गंगादर्शनके लिए आएंगे । वे तीर्थदर्शन, स्नान, पितृतर्पण इत्यादि धार्मिक विधि कर साधु-संतोंके साथ हिंदू धर्मके विषयमें विचारविमर्श करेंगे । इस अवसरपर साधु-संत एवं हिंदुत्ववादी संगठन स्वधर्मियोंमें जागृति होनेके लिए श्रद्धालुओंसे संवाद करेंगे । जब सर्व पंथ तथा संप्रदायोंमें विद्यमान भेद दूर कर संतशक्तिसहित हिंदूशक्ति एकत्रित होगी एवं अखिल विश्वमें विद्यमान हिंदू धर्म एवं संस्कृतिको संजोए रखनेके लिए कटिबद्ध होगी, तभी वास्तविक रूपमें हिंदू धर्मका पुनरुत्थान आरंभ होगा । हिंदू धर्मका ऐसा पुनरुत्थान धर्मचर्चा, धर्मजागृति, हिंदूसंगठन तथा धर्मरक्षाद्वारा करना, यही सांप्रतकालमें कुंभमेलेका वास्तविक प्रयोजन होना चाहिए । कुंभमेलेका यह प्रयोजन ध्यानमें रखते हुए ईश्वरचरणोंमें यही प्रार्थना है कि साधु-संत एवं सश्रद्ध हिंदू समाज अविलंब सक्रिय हो !

( संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा )