विश्‍व का सबसे बडा धार्मिक मेला : कुम्भ मेला

प्रयागराज में संपन्न हो रहे कुम्भ मेले के उपलक्ष्य में…

कुम्भ मेला एक प्रकार का धार्मिक मेला है । कुम्भ मेले में सभी पंथों तथा संप्रदायों के साधु-संत, सत्पुरुष तथा सिद्धपुरुष लाखों की संख्या में एकत्र आते हैं । करोडों श्रद्धालु भी कुम्भ पर्व में देवता-दर्शन, गंगास्नान, साधना, दानधर्म, तिलतर्पण, श्राद्धविधि, संतदर्शन इत्यादि धार्मिक कृत्य करने के लिए आते हैं । करोडों हिन्दुओं के जनसमूह की उपस्थिति में संपन्न होनेवाला कुम्भ क्षेत्र का मेला विश्‍व का सबसे बडा धार्मिक मेला है ।

कुम्भ मेला भारत की सांस्कृतिक महानता का केवल दर्शन ही नहीं, अपितु संतसंग आध्यात्मिक सम्मेलन है । कुम्भ मेले में भारत के विविध पीठों के शंकराचार्य, १३ अखाडों के साधु, महामंडलेश्‍वर, शैव तथा वैष्णव संप्रदाय के अनेक विद्वान, संन्यासी, संत-महात्मा एकत्रित आते हैं । इस कारण कुम्भ मेले का स्वरूप अखिल भारतवर्ष के संतों के सम्मेलन के समान भव्य-दिव्य होता है । कुम्भ मेले के श्रद्धालुओं को संतसत्संग का सबसे बडा अवसर उपलब्ध होता है । हरिद्वार, उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्‍वर-नासिक, इन चार क्षेत्रों में १२ वर्ष संपन्न होनेवाले इस पर्व का हिन्दू जीवनदर्शन में महत्त्वपूर्ण स्थान है । कुम्भ मेले की आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक महिमा अनन्य है । ‘हिन्दू-एकता’ कुम्भ मेले की घोषणा है । इस वर्ष १५ जनवरी से ४ मार्च तक प्रयागराज में कुम्भ मेला हो रहा है ।

(संदर्भ : कुम्भ मेले की महिमा एवं पवित्रता की रक्षा)

विश्‍व का सबसे बडा धार्मिक मेला ‘कुम्भ मेला’ का प्रातिनिधिक छायाचित्र

हिन्दुओं के लिए परम वंदनीय इन कुंभ मेलों के नियोजन की ओर राज्यकर्ता तथा प्रशासन गंभीरता से देखते नहीं पाए जाते । कुंभ मेले के लिए आरक्षित भूभाग पर अतिक्रमण, नियोजन में स्थानीय प्रशासन की अत्यधिक अनदेखी, प्रशासन का हिन्दुओं और उनके परम वंदनीय साधु-संतों की ओर ध्यान भी न देना, परधर्मियों का तुष्टीकरण करनेवाले राज्यकर्ताओं का हिन्दू-द्वेष भी प्रत्येक स्थान पर दिखाई दिया । राज्यकर्ताओं के हाथों की कठपुतली बनी पुलिस का अशोभनीय आचरण तथा प्रति १२ वर्षों में होनेवाले कुम्भ मेले की पूर्वतैयारी में नियोजन के अभाववश हो रही धांधली, ऐसे अनेक प्रकरण कुछ कुंभ मेलों में अत्यलत प्रकर्षता से दिखाई दिए । कुंभ मेले की पवित्रताहनन का कार्य करने में राज्यकर्ता, प्रशासन और पुलिस के साथ ही धर्माभिमानशून्य हिन्दुओं का भी हाथ है । धर्म संबंधी अज्ञान और अनास्था के कारण हिन्दुओं को स्वधर्म का अभिमान नहीं है । इसी कारण कुंभ मेलों में हिन्दुओं का आचरण किसी पर्यटक की भांति दिखाई देता है । इन पवित्र पर्वों का अपनी साधना हेतु लाभ उठाने की अपेक्षा अन्यों को अधिकाधिक लूटने का कुकर्म भी कुछ हिन्दू और वहां के व्यवसायियों द्वारा किया जाता है । इसके साथ ही कुछ हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों की कर्तव्यविमुखता का विदारक दर्शन भी यहां होता है ।

 

कुम्भ मेले में हिन्दुओं की दयनीय स्थिति

धर्मशिक्षा का अभाव, धर्म के प्रति अविश्‍वास और उदासीनता एवं व्यावहारिक लाभ की दृष्टि से अध्यात्म की ओर देखने के कारण कुम्भ मेले में सम्मिलित हिन्दू किस प्रकार अनुचित आचरण करते हैं, यह आगे दिए कुछ उदाहरणों से हम समझ लेते हैं ।

अ. कुंभ मेले की पवित्रता बनाए रखने के प्रति उदासीन हिन्दू !

कुंभ मेले में श्रद्धालु हिन्दुओं को ध्यान रखना चाहिए कि उनके आचरण से उस स्थान की पवित्रता बनी रहे । श्रद्धालु कुंभ मेले में केवल इसी कारण से न आएं कि पर्वकाल में पवित्र तीर्थस्नान करने सेे पापहरण होता है ।’ इस पवित्र स्थान पर आकर तीर्थस्नान करने से पाप धुल जाएंगे । पुण्यसंचय भी होगा; परंतु यह लाभ किसे मिलेगा ? जो श्रद्धापूर्वक तीर्थक्षेत्र में धर्माचरण करेगा, उसी को इसका लाभ होगा ! प्रत्यक्ष में इस स्थल पर भ्रमण करनेवाले बहुसंख्यक हिन्दूू इससे अनभिज्ञ हैं । धार्मिक स्थल की पवित्रता बनाए रखना, यहां की सात्त्विकता बढाना, इन बातों से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता । १२ वर्ष में एक बार आनेवाले पवित्र पर्व पर योग्य आचरण न करनेवाले और तीर्थक्षेत्र की पवित्रता न बनाए रखनेवाले प्रतिदिन धर्माचरण कैसे करते होंगे ?

आ. कुम्भ मेले का महत्त्व न समझकर उसकी
ओर केवल त्वचा को पवित्र जल लगाना, इतने संकीर्ण दृष्टिकोण से
देखनेवालों का मन वहां की पवित्रता, सात्त्विकता एवं लाभ का अनुभव कैसे करेगा ?

वर्ष २००३ में नासिक में हुए कुम्भ मेले में आए अनेक लोगों में बारह वर्ष में आनेवाले कुम्भ मेले का लाभ कैसे लेना है’, इसकी थोडी भी जागृति नहीं दिखाई दी । बस एक डुबकी लगाना और चल पडना ! इसके लिए ही तो यहां आए हैं ! और यहां क्या करना है ?’, ऐसी प्रतिक्रिया भी अनेक लोगों ने दी । धर्म जीवित रहा, तो राष्ट्र जीवित रहेगा और राष्ट्र जीवित रहा, तो ही संस्कृति जीवित रहेगी ! – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

जिसमें ईश्‍वर के प्रति श्रद्धा होती है, वही श्रद्धालु है । जिसमें यह श्रद्धा नहीं, उसके लिए घर में स्नान अथवा कुम्भ पर्व में स्नान किया, दोनों एक समान है ! श्रद्धा रहित कृति करने से पर्व के पुण्य का लाभ कैसे मिलेगा ?

इ. धार्मिक कृत्यों का शास्त्र समझे बिना, स्नान करते
समय देवता से प्रार्थना करने के स्थान पर हंसी-ठिठोली करनेवाले हिन्दू !

ऐसा लगा कि कुम्भ मेले के लिए आए अनेक लोगों का दृष्टिकोण केवल एक यात्रा करना है । बारह वर्षों में आनेवाले कुम्भ मेले के पर्वस्नान के समय रामकुंड पर स्नान करते समय श्रद्धालु जोर-जोर से बातें करते हुए, कोलाहल (शोर) करते हुए एवं हंसी-ठिठोली करते हुए दिखाई दे रहे थे । ऐसे हिन्दू ही हिन्दू धर्म को कलंकित करते हैं । ऐसे लोगों को तीर्थक्षेत्र की पवित्रता का अथवा पर्वस्नान का आध्यात्मिक लाभ कैसे मिलेगा ? उन्हें घूमने जाने का ही फल मिलेगा, यह निश्‍चित है ! क्योंकि श्रद्धा के बिना तीर्थ का फल मिलना असंभव है !’

– डॉ. दुर्गेश शंकर सामंत, भूतपूर्व समूह संपादक, सनातन प्रभात पत्रिका. (वर्ष २००३)

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात