कुंभमेले में विद्यमान कुछ परंपराएं तथा उनका इतिहास !

 

१. आखाडा शब्द की उत्पत्ति तथा संन्यासियों के प्रकार

‘कुंभपर्व के समय आयोजित धार्मिक सम्मेलन में शस्त्र धारण करने के विषय में निर्णय होकर एकत्रित होने के अखंड आवाहन किया गया । आगे जाकर ‘अखंड’ शब्द ‘आखाडा’ नाम से प्रचलित हुआ । हिन्दू धर्म में ४ आश्रमों में से संन्यासाश्रम को प्रधानता दी गई । आत्मज्ञान प्राप्ति हेतु संन्यास लेना आवश्यक बताया गया है ।

संन्यासी के १. कुटिचक ,२. बहूदक , ३. हंस और ४. परमहंस ये ४ प्रकार बताए गए हैं ।

 

२. हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु संन्यासियों द्वारा भी शस्त्र धारण किया जाना

मुसलमान शासनकर्ताओं ने सनातन हिन्दू धर्म को बलपूर्वक नष्ट करने का प्रयास किया; इसलिए स्वरक्षा, साथ ही हिन्दू धर्म की रक्षा हेतु संन्यासियों ने भी शस्त्र धारण करने का निर्णय किया । तब शास्त्रधारी संन्यासी शस्त्रधारी बन गए । कुंभपर्व के समय आयोजित सम्मेलन में इस आवाहन का प्रचुर मात्रा में प्रत्युत्तर प्राप्त होकर धर्मरक्षा हेतु अपने सर्वस्व के बलिदान के लिए सिद्ध नवयुवक इन संन्यासियों के साथ एकत्रित हुए थे । उन सभी की इच्छा को देखकर उन्हें भी संन्यास दीक्षा दी गई । ये सभी सज्ज होकर वस्त्रादि सभी साधनों को त्यागकर नागा अवस्था में रहने लगें ।

वैश्‍विक स्तरपर सबसे बडी आध्यात्मिक यात्रा के अर्थात कुंभपर्व के प्रातिनिधिक छायाचित्र

 

३. नागा संन्यासियों के आखाडे

पहले आखाडे की स्थापना के आवाहन के पश्‍चात संन्यासियों की संख्या बढने से नए-नए आखाडे बनते चले गए । उनका क्रम निम्नानुसार है –

१. श्री आवाहन आखाडा
२. श्री अटल आखाडा
३. श्री आनंद आखाडा
४. श्री निरंजजी आखाडा
५. श्री जुना आखाडा
६. श्री पंचअग्नि आखाडा
७. श्री नाथपंथी
८. श्री वैष्णवी बैरागी
९. श्री उदासिनी पंचायती बडा आखाडा
१०. श्री उदासिनी बडा आखाडा और
११. श्री निर्मल पंचायती आखाडा

 

४. राजयोगी (शाही) स्नान

४ अ. स्नान का क्रम

कुंभपर्व के समय राजयोगी (शाही) स्नान के समय पहले नागासंन्यासी प्रातःकाल में सूर्योदय से पहले स्नान करते हैं । उसके पाचात बैरागी साधु स्नान करते हैं और उसके पश्‍चात जुने उदाी और नए उदासी स्नान करते है । सबसे अंत में निर्मल आखाडे के साधु स्नान करते हैं । सभी साधुओं के स्नान के पश्‍चात दोपहर में सभी श्रद्धालुओं को स्नान की अनुमति होती है । साधुओं के इस स्नानक्रमपर आधारित यह नियम बना है ।

४ आ. स्नान का पर्व

राजयोगी स्नान के दिन प्रातः ४ बजे से शोभायात्राएं प्रारंभ होती हैं; किंतु सामान्य लोगों को केवल दूरसे ही इन शोभायात्राओं को देखना पडता है । दोपहर १२ बजे के पश्‍चात ही सभी को प्रवेश दिया जाता है । साधुओं की शोभायात्राएं देखना भी एक पर्व होता है । उसमें रेशम के परदे, गद्दे, सिरहाने, तकिए, ऊंचे गालिचे और आभूषणों से अलंकृत किए गए मंडप (शामियाने) होते हैं । अनेक आखाडों के हाथी और घोडे भी होते हैं । इन आखाडों के महंत नासिक में गोदावरी माता का मंदिर तथा कपालेश्‍वर के मंदिर में दर्शन करते हैं । त्र्यंबकेश्‍वर में सभी मंदिरों में दर्शन तथा कुशावर्त में स्नान होता है । नासिक में गंगा के तटपर १२ वर्ष बंद गोदामाता के मंदिर को पहले दिन खोला जाता है । तत्पश्‍चात सभी लोग दर्शन कर पूजाविधी करते हैं । उसके पश्‍चात सभी साधु निहित क्रम के अनुसार स्नान के लिए आते हैं । त्र्यंबकेश्‍वर में प्रातःकाल आरंभ शोभायात्रा पूर्वापार पद्धति से चलती है । प्रत्येक आखाडे की अपनी देवता होती है । साधु, संत, महंत तथा मंडलेश्‍वर अपनी परंपरा के अनुसार हाथी ओर घोडोंपर आरुढ होकर आते हैं । कुशावर्त पहुंचनेपर देवता के साथ पूजन के पश्‍चात राजयोगी स्नान आरंभ होता है । इस समारोह को कोई भी नहीं देख सकता; इसलिए सामान्य लोगों को आखाडे में घूसने का प्रयास नहीं करना चाहिए ।

प्रत्येक आखाडे का अपना एक ध्वज होता है, जिसे धर्मध्वज कहते हैं । ध्वज लगाना सिंहस्थ पर्व का आरंभ होने का प्रतीक होता है ।

जो साधू आजीवन गुहा में रहकर तपश्‍चर्या करते हैं, वे कुंभपर्व के समय में ही बाहर आकर स्नान के लिए एकत्रित होते हैं; इसलिए उनके दर्शन एवं सत्संग का अवश्य लाभ उठाना चाहिए ।

 

५. पेशवाओं द्वारा शैवपंथीय त्र्यंबकेश्‍वर
में तथा वैष्णवपंथीय नासिक में स्नान करें, इस पेशवाओं
द्वारा बनाए गए नियम के अनुसार शोभायात्राओं का संचलित होना

पेशवाओं ने जब से यह नियम बनाया कि शैव पंथीय त्र्यंबकेश्‍वर में तथा वैष्णव पंथीय नासिक में स्नान करें, तब से शोभायात्रा शांति के साथ चलती हैं । इसमें अनेक प्रकार के वाद्य देखना भी आकर्षण का केंद्र होता है । इस में निर्वाणी पंथ का वाद्य डंका घोडेपर, तो निर्मोही पंथ का वाद्य ऊंटपर होता है ।

इस समय धार्मिक घोषणाओं के वातावरण गूंज उठता है । नासिक में प्रत्येक आखाडा अपने ध्वज को स्नान कराता है, गंध लगाता है, फूलों की माला पहनाता है और उसके पश्‍चात साधु स्नान के समय गोदावरी का पूजन करते हैं और गंगा मंदिर में गंगामाता का पूजन किया जाता है ।’

(संदर्भ : नरेंद्रगाथा, जुलाई २००३)