कृतज्ञताभाव

‘ईश्‍वर की सृष्टि में एक दाना बोने से उसके सहस्रों दानें मिलेंगे । विश्‍व की कौनसी बैंक अथवा ऋणको इतना ब्याज देता है ? इसलिए इतना ब्याज देनेवाले ईश्‍वर का थोडासा तो स्मरण कीजिए । इतनी तो कृतज्ञता होनी दीजिए ।’

१. ‘कृतज्ञता अर्थात क्या ? सतत भगवान का स्मरण करना, किसी भी क्षण अनुसंधान टूटने न देना, यही कृतज्ञता है । भगवान को प्रत्येक कर्म में देखना अर्थात कृतज्ञता । इसके लिए हमें आपनी दृष्टी बदलनी चाहिए ।

२. ‘हे भगवान, मुझे सतत अपने स्मरण में रखें,’ ऐसी कृतज्ञता भगवान के प्रति सतत व्यक्त करें ।’

– (परात्पर गुरु) पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (८.२.२०१७)
 

कृतज्ञताभाव में रहने से होनेवाले लाभ

१. ईश्‍वर के प्रति श्रद्धा बढती है ।

२. मन के विरुद्ध होनेवाली घटनाओं में मन की स्थिरता बढती है ।

३. साधकों के प्रति आनेवाली प्रतिक्रियाएं न्यून होकर पूर्वाग्रह मी उत्पन्न नहीं होता और उससे सीखकर आगे बढना होता है ।

४. कष्ट, प्रारब्ध, दोष एवं अहं के कारण उत्पन्न स्थिति को स्वीकारना संभव होता है तथा अहं के विरुद्ध संघर्ष करने की शक्ति मिलती है ।

५. कृतज्ञताभाव में रहने साधना के प्रयासों में निरंतरता आती है तथा दृढता बढकर प्रयासों को गति प्रदान होती है ।

६. ईश्‍वर द्वारा दिए जानेवाले प्रत्येक क्षण से आनंद लेना संभव होता है ।

७. वातावरण में रज-तम होते हुए भी प्रतिदिन बढते हुए चैतन्य को ग्रहण किया जा सकता है ।

कु. पूजा जाधव, जळगांव

 

साधक की प्रत्येक गतिविधि में कृतज्ञता का अंतर्भूत होना ही कृतज्ञताभाव !

संकल्पना एवं चित्रांकन : श्रीमती उमा रविचंद्रन्, चेन्नई

स्वयं मधुर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने साधकों को भी अखिल सृष्टि की ओर देखने की मधुर दृष्टि प्रदान की है । इसके कारण ही आज साधक साधना में विद्यमान मधुरता का अनुभव कर रहे हैं; इसके लिए उनके चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !

 

कृतज्ञताभाव कैसे उत्पन्न होता है ?

अ. एक बार ज्ञानप्राप्ति की तडप बढी, तो जीव की जिज्ञासा का भी श्रद्धा में रूपांतरण हो जाता है अर्थात ज्ञान प्राप्त करने के विषय में ईश्‍वर के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है ।

आ. कार्य में भाव की निरंतरता आकर उसका अव्यक्त भाव में रूपांतरण हो जाने से कृतज्ञताभाव उत्पन्न होता है ।’

– एक विद्वान (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळजी ‘एक विद्वान’ इस उपनाम से भी लेखन करती हैं । (१६.२.२०१६)

 

कृतज्ञता भाव को अपनाने से साधक का अहं न बढना तथा
अंततः अहंशून्य अवस्था (मोक्षप्राप्ति) को प्राप्त करना सरल बन जाना

‘कृतज्ञताभाव को अपनाने से किसी भी कारण से साधक का अहं नहीं बढता । कृतज्ञता भाव में साधक द्वारा संपूर्ण श्रेय गुरु अथवा ईश्‍वर को दिए जाने से साधक में कर्तापन की भावना उत्पन्न नहीं होती । कर्तापन का भाव जितना अल्प होगा, उतना साधक का अहं न्यून होने में सहायता मिलती है । उसके कारण साधक भले कितनी भी आध्यात्मिक उन्नति करे; किंतु उसे अपने गुरु के प्रति कृतज्ञताभाव को नहीं छोडना चाहिए । इससे साधक का अहं तो न्यून होता ही है, साथ ही उसे अहंशून्य स्थिति प्राप्त करना सरल होता है । अहंशून्य अवस्था प्राप्त करना ही मोक्षप्राप्ति है । इसलिए अनेक संत अपना लेखन, भक्तिगीत तथा अन्य काव्य को अपने गुरु का उल्लेख कर करते हैं । उससे उस लेखन का अध्ययन करनेवालों को उस संत की अपेक्षा उसके गुरु की महिमा बडी लगती है तथा उनके प्रति कृतज्ञता प्रतीत होती है ।’

-कु. मधुरा भोसले, सनातन आश्रम, रामनाथी (२५.९.२००५)

 

वस्तु का उपयोग करनेवाले व्यक्ति में उस वस्तु के प्रति
कृतज्ञताभाव अधिक होगा, उतनी उस वस्तु का चैतन्यमय होना

‘किसी वस्तु का उपयोग करनेवाले व्यक्ति में उस वस्तु के प्रति कृतज्ञता का भाव जितना अधिक, उतनी वह वस्तु चैतन्यमय बनकर श्रीकृष्ण तत्त्व के साथ एकरूप हो जाती है और साधकत्व को प्राप्त करती है । ’

-श्रीमती स्मिता जोशी (१५.१.२००७)

 

कृतज्ञता क्या होती है ?

अ. हम ईश्‍वर से प्रार्थना करते हैं और उनके द्वारा सहायता मिलने से उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । यहां हमारे द्वारा की गई कृती (कृत) ईश्‍वर द्वारा करवा ली गई, इसका ज्ञान (‘ज्ञ’) होना ‘कृतज्ञ’ है । संक्षेप में कहा जाए, तो कर्तापन का वास्तविक ज्ञान होना । ‘कृत’ का अर्थ सत्य तथा उसे की गई प्रार्थना के कारण हमारा मनोरथ पूर्ण हुआ, इसका ज्ञान होना ‘कृतज्ञ’ है !

-श्री. संदीप नरेंद्र वैती, मुंबई

आ. ‘श्रद्धा का अर्थ कृतज्ञता का भाव तथा अव्यक्त भाव का परिणाम ही कृतज्ञता का भाव’

  • एक विद्वान (सद्गुरु श्रीमती अंजली गाडगीळजी ‘एक विद्वान’ इस उपनाम से भी लेखन करती हैं । (१६.२.२००६)

 

कृतज्ञता तथा कृतज्ञता का भाव

२१.९.२००४ की सुबह ७.३० बजे मैने नामजप के समय श्री गणपति एवं श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, ‘मेरे हृदय में आपके प्रति कृतज्ञता एवं शरणागति का भाव बढे तथा वह प्रतिक्षण जागृत रहे ।’ उस समय ईश्‍वर ने मुझे निम्नलिखित ज्ञान दिया ।

-कु. मधुरा भोसले, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (२१.९.२००४)

 

कृतज्ञताभाव में रहने से निराशा न आकर
मन आनंदित रहेगा और साधना अच्छी होगी !

साधक स्वभावदोषों की सारणी लिखते हैं । वे स्वभावदोष दूर हों; इसके लिए स्वसूचना देते हैं । साधकों ने यदि इतना ही किया होता, तो वह उचित होता; किंतु कई साधक इन स्वभावदोषों का दिनभर स्मरण कर दुखी हो जाते हैं । कुछ साधक दूसरे साधकों में विद्यमान गुण अथवा उन्नति के साथ अपनी तुलना कर वे उनसे पीछे हैं, यह विचार कर दुखी रहते हैं । उनके ध्यान में यह नहीं आता कि प्रति मास १० सहस्र, ५०  सहस्र अथवा १ लाख रुपए अर्जित करनेवाले यदि उनकी अपेक्षा अधिक धन अर्जित करनेवालों के साथ अपनी तुलना करने लगे, तो वे सदैव ही दुखी रहेंगे । उसके स्थानपर १० सहस्र रुपए अर्जित करनेवाले को ‘जिन्हें नौकरी नहीं है, उनकी अपेक्षा मैं अधिक सुखी हूं’, ‘५० सहस्र रुपए अर्जित करनेवाले को १० सहस्र रुपए अर्जित करनेवालों की अपेक्षा मैं अधिक सुखी हूं तथा १ लाख अर्जित करनेवाले ने मैं ५० सहस्र रुपए अर्जित करनेवालों की अपेक्षा अधिक सुखी हूं’, ऐसा विचार किया, तो वे दुखी न होकर आनंदित होंगे ।

साधकों के ध्यान में यह नहीं आता कि ईश्‍वर ने उन्हें मनुष्यजन्म प्रदान किया है, उनमें साधना की रूचि उत्पन्न की है, उन्हें साधना में मार्गदर्शन मिल रहा है और उनकी साधना में उन्नति भी हो रही है, इसका स्मरण रखा, तो ‘पृथ्वीपर रह रहे अधिकांश मनुष्यों की अपेक्षा में हम कितने सौभाग्यशाली हैं’, यह ध्यान में आकर उनके मन में निरंतर कृतज्ञताभाव रहेगा । स्वसूचना सत्रों के समय दोषों का स्मरण कर उन्हें दूर करने हेतु स्वसूचनाएं देना उचित है और दिनभर के अन्य समय में भावपूर्ण नामजप करें अथवा कृतज्ञताभाव में रहें । ‘जहां भाव, वहां ईश्‍वर’ के कारण उस समय मन को आनंद भी मिलता है ।

मेरे इस उदाहरण से कृतज्ञताभाव में रहने से सेवा करना कैसे संभव होता है और मन को आनंद कैसे मिलता है, यह ध्यानमें आएगा । पहले मैं सर्वत्र सत्संग, खुली सभा और अभ्यासवर्ग आदि करने जाता था । आज मैं कहीं जा नहीं सकता; किंतु जब मैं ईश्‍वर के द्वारा आजतक मुझसे जो विविध कार्य करवा लिए हैं, केवल उनका स्मरण करने से ही मुझे कृतज्ञताभाव के साथ आनंदित रहना संभव होता है और कक्ष में बैठकर दिन-रात ग्रंथलेखन की सेवा भी आनंद के साथ करना संभव होता है ।

– परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी

 

साधकों, साधना में उन्नति हेतु कृतज्ञताभाव में रहें !

साधकों को साधना में उन्नति करना संभव न होता हो अथवा स्वभावदोष एवं अहं को दूर करना संभव नहीं होता हो; किंतु वे भावजागृति के लिए प्रयास करें । भाव जागृत होने से साधना में उत्पन्न कई बाधाएं दूर होंगी, ऐसा बताया जाता है । उसके लिए उन्हें ‘भावजागृति हेतु साधना’ ग्रंथ में दिए गए मार्ग के अनुसार प्रयास करने के लिए कहा गया है; किंतु कई साधकों को वह भी संभव नहीं होता । ऐसे साधकों ने निम्नलिखित प्रयास किए, तो उनका भाव जागृत होने में सहायता मिलेगी । ‘हम अकेले रह नहीं सकते और जी भी नहीं सकते’, इसे ध्यान में लेकर परिजन हमारे ओर जो ध्यान देते हैं और हमें जो प्रेम देते हैं, दूसरे लोग भी हमें जो प्रेम देते हैं तथा हमारी सहायता करते हैं, साथ ही भगवान ने हमें जो जीवन प्रदान किया है आदि के संदर्भवाले नित्य जीवन के उदाहरणों का निरंतर स्मरण करने से ५-६ सप्ताह में ही हम में कृतज्ञताभाव उत्पन्न होना प्रारंभ हो जाता है और उससे साधना में उन्नति होने लगती है ।

– परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी

(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भाव के प्रकार एवं जागृति)

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