सिंहस्थ पर्वमें गोदावरीस्नान अत्यंत पवित्र क्यो माना गया है?

सारिणी


१. सिंहस्थ कुंभमेला

गुरुग्रहके सिंह राशिमें प्रवेश करनेके मुहूर्तपर नासिकमें कुंभमेलेका आयोजन होता है । इसलिए इसे ‘सिंहस्थ’की उपाधि लगाई जाती है । पुराणमें वर्णित है कि सिंहस्थके १३ मासके पुण्यकालमें नासिक क्षेत्रमें साढेतीन कोटि तीर्थ एवं तैंतीस कोटि देवता गोदावरी नदीके संपर्कमें आते हैं ।

२. सिंहस्थ कुंभमेलेकी तीर्थयात्राके लाभ

गुरुग्रह सिंह राशिमें आनेपर साक्षात मां गंगा गुप्तरूपसे माता गोदावरीसे मिलने आती हैं । इस कारण, सिंहस्थ पर्वमें गोदावरीस्नान अत्यंत पवित्र माना गया है । इस विषयमें एक श्लोक है –

षष्ठिवर्षसहदाणि भागिरथ्यावगाहनम् ।
सकृद्गोदावरीस्नानं सिंहस्थे च बृहस्पतौ ।।
– पद्मपुराण

अर्थ : ६० सहस्त्र वर्ष भागीरथी नदीमें स्नान करनेसे जितना पुण्य मिलता है, उतना पुण्य गुरुके सिंह राशिमें आनेपर गोदावरीमें किए केवल एक स्नानसे प्राप्त होता है । पुराणमें वर्णित है कि सिंहस्थके एक वर्षके कालखंडमें दान, तप आदि कर्म करनेवालोंका पुण्य अनंत गुना बढ जाता है ।

३. सिंहस्थ तीर्थयात्रा करनेकी विधि

पुण्याहवाचन एवं नांदीश्राद्ध कर गोदावरीमें स्नान करें । तत्पश्चात, वहीं श्राद्धादि कृत्य कर पंचवटीस्थित श्रीरामके दर्शन करें । सिंहस्थ पर्वकालमें महर्षि कश्यपने त्र्यंबकेश्वरके कुशावर्तमें पितृतर्पण तथा श्राद्धादि कर्म करनेके लिए कहा है । अतएव नासिक क्षेत्रसे त्र्यंबकेश्वर जाकर कुशावर्तमें स्नान, श्राद्धादि कृत्य कर भगवान त्र्यंबकेश्वरके दर्शन करें । वहांसे लौटकर पुनः पंचवटीमें श्रीरामके दर्शन करें । गोदावरीकी पूजा करें । फलयुक्त अघ्र्य दें । तत्पश्चात, ब्राह्मणोंको दान दें । पश्चात क्षौर (मुंडन) कर बिन लवणके (नमकके) उपवास करें । इस प्रकार सिंहस्थ यात्राका समापन होता है ।

४. सिंहस्थ कुंभमेलेके समय शैव पंथियोंके कुशावर्त
कुंडमें एवं वैष्णव पंथियोंके रामकुंडमें स्नान करनेका कारण

वर्ष १७६२ में नासिकमें शैव संन्यासियों एवं वैष्णव बैरागियोंके मध्य भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें ३,१०० साधु मारे गए थे । इन साधुओंमें १,८०० संन्यासी एवं १,३०० बैरागी थे । इस संघर्षके पश्चात माधवराव पेशवाने दोनों समुदायोंमें संधि करवाकर एक व्यवस्था लागू की । तदनुसार शैव संन्यासियोंके १० अखाडे त्र्यंबकेश्वरमें एकत्र आकर कुशावर्त कुंडमें पवित्र (शाही) स्नान करते हैं । उसी प्रकार, वैष्णव बैरागियोंके ३ अखाडे नासिकमें एकत्र होकर रामकुंडमें पवित्र स्नान करते हैं ।

५. ‘सिंहस्थ कुंभमेलेमें नासिक और त्र्यंबकेश्वर’का विवाद अनुचित !

सिंहस्थ कुंभमेला नासिकका है कि त्र्यंबकेश्वरका, यह विवाद कुछ स्थानीय क्षेत्रप्रेमी नागरिकोंने उत्पन्न किया है । इसलिए, सिंहस्थ कुंभमेलेमें आए श्रद्धालुओंके मनमें प्रश्न उत्पन्न होता है कि ‘खरा कुंभमेला कौनसा ?’ वास्तवमें, इन पवित्र तीर्थस्थलोंमें निवास करनेवाले लोगोंने धर्मशास्त्रका उचित अध्ययन नहीं किया; इसलिए यह विवाद उत्पन्न हुआ है, जो सर्वथा अनुचित है । सिंहस्थ कुंभमेला, नासिक और त्र्यंबकेश्वर दोनों क्षेत्रोंके लिए समानरूपसे लागू है । क्योंकि –

१. सिंहस्थ कुंभमेला प्रमुखतः गोदावरी तीर्थसे संबंधित है तथा यह तीर्थ नासिक और त्र्यंबकेश्वर दोनों क्षेत्रोंसे संबंधित है ।

२. धर्मशास्त्रमें वर्णित सिंहस्थ यात्रा, नासिक एवं त्र्यंबकेश्वर गए बिना विधिवत पूर्ण नहीं की जा सकती ।

६. दक्षिण भारतका कुंभमेला

६.१ कुंभकोणम (तमिलनाडु)

यह दक्षिण भारतके प्राचीन तीर्थक्षेत्रोंमेंसे एक है । यह प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र कावेरी नदीके तटपर तंजावर जनपदमें (तमिलनाडुमें) बसा है । यहां कुंभेश्वर महादेवका सबसे प्राचीन मंदिर है । प्रयागके उपरांत कुंभकोणमकी महिमा है । इस तीर्थक्षेत्रमें २० एकड फैला महामखम् सरोवर है । प्रत्येक १२ वर्षोंके उपरांत गुरु ग्रहके सिंह राशिमें प्रवेश करनेपर गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, महानदी, पयोष्णी एवं सरयू इत्यादि नौ नदियां (नौगंगा) इस सरोवरमें स्नान हेतु आती हैं । श्रद्धालुओंकी ऐसी श्रद्धा है कि उस समय वहां स्नान करनेसे पापोंका क्षालन होता है । इसलिए इस कालावधिमें यहां प्रयागसमान कुंभमेला लगता है । यह कुंभमेला प्रचलित नहीं है, तब भी दक्षिण भारतमें यहीं कुंभमेला होनेके कारण १० लाखसे अधिक श्रद्धालु यहां आते हैं ।

(संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा)