कुंभमेला : हिंदू संस्कृति अंतर्गत समानताका प्रतीक

सारिणी


१. सहस्त्रो वर्षोंकी परंपरा एवं हिंदुओंकी सांस्कृतिक एकताका खुला व्यासपीठ !

पुराणोंमें कुंभमेलेका उल्लेख है । नारद पुराणमें बताया गया है, ‘कुंभमेला अति उत्तम होता है ।’ कुछ विद्वानोंके अनुसार, ईसापूर्व ३४६४ में यह मेला प्रारंभ हुआ होगा, अर्थात यह सिंधुसंस्कृतिसे १ सहस्त्र वर्षपूर्वकी परंपरा है । वर्ष ६२९ में चीनी यात्री हुआंगत्संगने भी अपनी पुस्तक ‘भारतयात्राका वर्णन’में कुंभमेलेका वर्णन किया है तथा ‘सम्राट हर्षवर्धनके शासनकालमें प्रयागमें हिंदुओंका कुंभमेला होता है ।’ ऐसा उल्लेख किया है । प्रयागराज (इलाहाबाद), हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वरनासिक, इन चार स्थानोंपर होनेवाले कुंभमेलोंके निमित्त धर्मव्यवस्थाद्वारा चार सार्वजनिक मंच हिंदू समाजको उपलब्ध करवाए हैं । कुंभमेलेके ये चार क्षेत्र चार दिशाओंके प्रतीक हैं । परिवहनके आधुनिक साधनोंकी खोज होनेसे पूर्वसे ये कुंभमेले लग रहे हैं । उस समय भारतकी चारों दिशाओंसे एक स्थानपर एकत्रित होना सहजसाध्य नहीं था । इसीलिए ये कुंभमेले भारतीय एकताके प्रतीक एवं हिंदू संस्कृति अंतर्गत समानताके सूत्र सिद्ध होते हैं ।

२. करोडों श्रद्धालु आकर्षित करनेवाला मेला

प्रयागके महाकुंभमेलेमें न्यूनतम ५ करोड श्रद्धालु गंगास्नानके लिए आते हैं । जबकि हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिकके कुंभमेलोंमें १ से २ करोड श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं । इन मेलोंमें जैन, बौद्ध एवं सिख पंथोंके अनुयायी भी सम्मिलित होते हैं । प्रयागके कुंभमेलेके श्रद्धालुओंकी उपस्थिति ‘गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रेकॉर्डस’में पंजीकृत (दर्ज) हुई है । इस कारण विश्वमें कुंभमेलेके प्रति आकर्षण जागृत हुआ तथा विविध देशोंके नागरिक भी इस मेलेमें बडे उत्साहसे सम्मिलित होते हैं ।

३. केवल पंचांगके माध्यमसे १२ वर्षोंमें एक बार आनेवाले पवित्र कुंभमेलेकी जानकारी पूर्वमें ही देकर करोडों हिंदुओंको बिना निमंत्रणके एकत्रित कर पानेवाला प्राचीन हिंदू धर्म !

‘वर्ष १९४२ में भारतके वॉईसराय लॉर्ड लिनलिथगोने पं. मदनमोहन मालवीयके साथ प्रयागका कुंभमेला विमानसे देखा । वे लक्षावधि (लाखों) श्रद्धालुओंका जनसागर देखकर आश्चर्यचकित हो गए । उन्होंने उत्सुकतावश पं. मालवीयसे प्रश्न किया, ‘‘इस कुंभमेलेमें जनसमूहको एकत्रित करनेके लिए आयोजकोंको अत्यधिक परिश्रम करना पडा होगा न ? आयोजकोंको इस कार्यके लिए कितना व्यय (खर्च) करना पडा होगा ?’’ पं. मालवीयने उत्तर दिया, ‘‘केवल दो पैसे !’’ यह उत्तर सुनकर लॉर्ड लिनलिथगोने पं. मालवीयसे प्रतिप्रश्न किया, ‘‘पंडितजी, आप विनोद (मजाक) कर रहे हैं ?’’ पं. मालवीयने थैलीसे पंचांग निकाला तथा वह लॉर्ड लिनलिथगोके हाथमें देते हुए बोले, ‘‘इसका मूल्य केवल दो पैसे है । इससे जनसामान्यको कुंभपर्वके पवित्र कालखंडकी जानकारी मिलती है । उसके अनुसार सब जन उस समय स्नानके लिए स्वयं उपस्थित रहते हैं । किसी भी व्यक्तिको व्यक्तिगत निमंत्रण नहीं दिया जाता ।’’ (‘केशव संवाद’, २७.७.२००७)

४. अंनिसवालोंको चपत देनेवाला श्रद्धाका मेला !

‘प्रयागके (इलाहाबादके) कुंभमेलेमें बिना किसी निमंत्रणके तथा प्रसारमाध्यमोंद्वारा विज्ञापन अथवा यात्रा-व्ययमें किसी प्रकारकी छूट, आर्थिक अनुदान इत्यादि न होते हुए भी ५ कोटिसे (करोडसे) अधिक श्रद्धालु आते हैं, इसका मुख्य कारण हिंदुओंकी धर्मश्रद्धा है । गंगामाता तथा पवित्र त्रिवेणी संगमके तीर्थ, इनपर श्रद्धाके कारण साधु-संतोंसहित हिंदू समाज इतनी बडी संख्यामें वहां एकत्रित होता है । किसी भी अहिंदू पंथमें इतनी बडी संख्यामें श्रद्धालु एकत्रित नहीं होते अथवा कभी एकत्रित होनेका समाचार सुनाई नहीं दिया है । ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ जैसे नास्तिकवादी संगठन भी श्रद्धाहीन नास्तिकों को इतनी बडी संख्यामें एकत्र करना तो दूर; परंतु निमंत्रण देकर भी १०० लोगोंको एकत्र नहीं कर सकते । इससे हिंदू धर्मकी अद्वितीयता ज्ञात होती है ।’ – डॉ. जयंत आठवले, संकलनकर्ता ( निज भाद्रपद कृष्ण ७, कलियुग वर्ष ५११४ ७.१०.२०१२)

५. बिना किसी आर्थिक सहायताकी अपेक्षाके आयोजित होनेवाला कुंभमेला !

‘आजकल आर्थिक सहायताकी अपेक्षाके बिना तो छोडिए; परंतु आर्थिक सहायताकी अपेक्षासे भी इतना विशाल जनसमूह किसी राजनीतिक अथवा सामाजिक कार्यक्रममें एकत्रित नहीं होता; परंतु प्रत्येक १२ वर्षोंके पश्चात विविध स्थानोंपर होनेवाले कुंभमेलेमें आनेवाले करोडों श्रद्धालुओंको किसी प्रकारकी आर्थिक सहायताकी अपेक्षा नहीं रहती ।

(संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा)