कुंभपर्व, कुंभपर्व उत्पत्तिकी कथा एवं उनका माहात्म्य

जनवरी माहमें कुंभपर्वका लाभ उठानेके लिए देश-विदेशसे श्रद्धालु एकत्र आ रहे हैं । इस निमित्तसे कुंभमेलेकी महिमाका वर्णन करनेवाले सनातन-संस्थाद्वारा प्रकाशित ग्रंथसे पांचवा सूत्र हमारे पाठकोंके लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ।

सारिणी


१. कुंभपर्वका अर्थ

प्रत्येक १२ वर्षके उपरांत प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिकमें आनेवाला पुण्ययोग ।

 

२. उत्पत्तिकी कथा

 

अमृतकुंभ प्राप्ति हेतु देवों एवं दानवोंने (राक्षसोंने) एकत्र होकर क्षीरसागरका मंथन करनेका निश्चय किया । समुद्रमंथन हेतु मेरु (मंदार) पर्वतको बिलोनेके लिए सर्पराज वासुकीको रस्सी बननेकी विनती की गई । वासुकी नागने रस्सी बनकर मेरु पर्वतको लपेटा । उसके मुखकी ओर दानव एवं पूंछकी ओर देवता थे । इस प्रकार समुद्रमंथन किया गया ।

इस समय समुद्रमंथनसे क्रमशः हलाहल विष, कामधेनु (गाय), उच्चैःश्रवा (श्वेत घोडा), ऐरावत (चार दांतवाला हाथी), कौस्तुभमणि, पारिजात कल्पवृक्ष, रंभा आदि देवांगना (अप्सरा), श्री लक्ष्मीदेवी (श्रीविष्णुपत्नी), सुरा (मद्य), सोम (चंद्र), हरिधनु (धनुष), शंख, धन्वंतरि (देवताओंके वैद्य) एवं अमृतकलश (कुंभ) आदि चौदह रत्न बाहर आए । धन्वंतरि देवता हाथमें अमृतकुंभ लेकर जिस क्षण समुद्रसे बाहर आए, उसी क्षण देवताओंके मनमें आया कि दानव अमृत पीकर अमर हो गए तो वे उत्पात मचाएंगे । इसलिए उन्होंने इंद्रपुत्र जयंतको संकेत दिया तथा वे उसी समय धन्वंतरिके हाथोंसे वह अमृतकुंभ लेकर स्वर्गकी दिशामें चले गए । इस अमृतकुंभको प्राप्त करनेके लिए देव-दानवोंमें १२ दिन एवं १२ रातोंतक युद्ध हुआ । इस युद्धमें १२ बार अमृतकुंभ नीचे गिरा । इस समय सूर्यदेवने अमृतकलशकी रक्षा की एवं चंद्रने कलशका अमृत न उडे इस हेतु सावधानी रखी एवं गुरुने राक्षसोंका प्रतिकार कर कलशकी रक्षा की । उस समय जिन १२ स्थानोंपर अमृतकुंभसे बूंदें गिरीं, उन स्थानोंपर उपरोक्त ग्रहोंके विशिष्ट योगसे कुंभपर्व मनाया जाता है । इन १२ स्थानोंमेंसे भूलोकमें प्रयाग (इलाहाबाद), हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिक समाविष्ट हैं ।

 

३. कुंभपर्वक्षेत्र एवं उनका माहात्म्य

३ अ. प्रयाग (इलाहाबाद)

यह उत्तरप्रदेशमें गंगा, यमुना एवं सरस्वतीके पवित्र ‘त्रिवेणी संगम’पर बसा तीर्थस्थान है । गंगा एवं यमुना नदी दिखाई देती हैं; परंतु सरस्वती नदी अदृश्य है । इस पवित्र संगमके कारण ही इसे ‘प्रयागराज’ अथवा ‘तीर्थराज’ कहा जाता है ।

३ आ. व्युत्पत्ति एवं अर्थ

प्रयाग शब्द ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक ‘यज्’ इस धातुसे बना है । इसका अर्थ है ‘बडा यज्ञ करना’ । ‘प्रयाग’ यह नाम अर्थपूर्ण एवं वेदोंके समान प्राचीन है, इसलिए श्रद्धालु इस क्षेत्रको विदेशी आक्रमणकारियोंद्वारा दिए ‘इलाहाबाद’ नामके स्थानपर ‘प्रयाग’ नामसे ही संबोधित करें ।

 

४. क्षेत्रमहिमा

४ अ. प्रजापतिक्षेत्र

खोए हुए चारों वेद पुनः मिलनेपर प्रजापतिने यहां एक महायज्ञ किया था; अतः प्रयागको ‘प्रजापतिक्षेत्र’ भी कहा जाता है ।

 

४ आ. पांच यज्ञवेदियोंकी मध्यवेदी

ब्रह्मदेवकी कुरुक्षेत्र, गया, विराज, पुष्कर एवं प्रयाग, इन पांच यज्ञवेदियोंमेंसे प्रयाग मध्यवेदी है ।

 

४ इ. त्रिस्थली यात्रामेंसे एक

काशी, प्रयाग एवं गया इस त्रिस्थली यात्रामें एक प्रयागका स्थान धार्मिक दृष्टिसे अद्वितीय है ।

 

४ ई. प्रलयकालमें सुरक्षित रहनेवाला क्षेत्र

इस क्षेत्रका माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि महाप्रलयके समय भले ही संपूर्ण विश्व डूब जाए, तब भी प्रयाग नहीं डूबेगा । ऐसा गया है कि प्रलयके अंतमें श्रीविष्णु यहांके अक्षयवटपर शिशुरूपमें शयन करेंगे । इसी प्रकार सर्व देव, ऋषि एवं सिद्ध यहां वास कर, इस क्षेत्रकी रक्षा करेंगे ।

 

५. कुंभपर्वका विविध धर्मग्रंथोंमें वर्णित माहात्म्य

 

५ अ. ऋग्वेद

ऋग्वेदके खिलसूक्तमें कहा गया है –

सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।

ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।। – ऋग्वेद, खिलसूक्त

अर्थ : जहां गंगा-यमुना दोनों नदियां एक होती हैं, वहां स्नान करनेवालोंको स्वर्ग मिलता है एवं जो धीर पुरुष इस संगममें तनुत्याग करते हैं, उन्हें मोक्ष-प्राप्ति होती है ।

 

५ आ. पद्मपुराण

प्रयागराज तीर्थक्षेत्रके विषयमें पद्मपुराणमें कहा गया है –

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

अर्थ : जिस प्रकार ग्रहोंमें सूर्य एवं नक्षत्रोंमें चंद्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सर्व तीर्थोंमें प्रयागराज सर्वोत्तम हैं ।

 

५ इ. कूर्मपुराण

कूर्मपुराणमें कहा गया है कि प्रयाग तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है ।

५ ई. महाभारत

प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो ।।

श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।।

मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते।।

– महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ७४, ७५

अर्थ : हे राजन्, प्रयाग सर्व तीर्थोंमें श्रेष्ठ है । उसका माहात्म्य श्रवण करनेसे, नामसंकीर्तन करनेसे अथवा वहांकी मिट्टीका शरीरपर लेप करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है ।

 

६. तीर्थक्षेत्रकी विधि

प्रयागराजकी तीर्थयात्रा करते समय त्रिवेणीसंगम का पूजन, केशमुंडन, गंगास्नान, पितृश्राद्ध, सुहागिन स्त्रियोंद्वारा वेणीदान एवं देवताओंके दर्शन करना आदि आवश्यक विधियां करनी होती हैं ।

 

६ अ. स्थानदर्शन

प्रयागके स्थानदर्शन करनेके विषयमें एक श्लोकमें कहा गया है –

त्रिवेणीं माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम् ।

वन्देऽक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम् ।।

अर्थ : त्रिवेणी (संगम), वेणीमाधव, सोमेश्वर, भारद्वाज, वासुकी नाग, अक्षयवट, शेष (बलदेव) एवं तीर्थराज प्रयागको मैं वंदन करता हूं ।

संदर्भ : सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा