वर्तमान बौद्ध राष्ट्र होते हुए भी भगवान श्रीविष्णु पर श्रद्धा दर्शानेवाले महाभारत और रामायण की घटनाआें पर आधारित कंबोडिया का पारंपरिक ‘अप्सरा नृत्य’ !

श्री. विनायक शानभाग

१. सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ और उनके साथ विद्यार्थी साधकों का
इंडोनेशिया से हवाई जहाज द्वारा यात्रा कर कंबोडिया की राजधानी ‘नोम फेन’ पहुंचना

सद्गुरु(श्रीमती) अंजली गाडगीळ और उनके साथ ४ विद्यार्थी साधकों ने २२ मार्च को इंडोनेशिया के बाली द्वीप से कंबोडिया की यात्रा आरंभ की ।२३ मार्च को सवेरे २ घंटे की यात्रा के उपरांत सवेरे १०.४० पर हम कंबोडिया की राजधानी नोम फेन पहुंचे । हमारे पास २३ मार्च का आधा दिन और २४ मार्च का पूरा दिन, इतना ही समय था ।

उसी में ही हमें कंबोडिया का राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय, कंबोडिया के राजा का राजप्रासाद, कंबोडिया का पारंपरिक अप्सरा नृत्य और राष्ट्रीय स्मारक देखने थे । नोम फेन में २३ मार्च को पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि उसी दिन राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय के परिसर में समुद्र मंथन के दृश्यवाला अप्सरा नृत्य दिखाया जाएगा । इसलिए हमने उस दिन वह नृत्य देखना निश्‍चित किया ।

 

२. ‘बौद्ध’ राष्ट्र होते हुए भी वहां के लोगों की भगवान श्रीविष्णु
और भगवान शिव पर श्रद्धा होना तथा उन्हेें हिन्दू धर्म का महत्त्व ज्ञात होना

कंबोडिया ‘बौद्ध’ राष्ट्र होते हुए भी वहां के लोगों की भगवान श्रीविष्णु और भगवान शिव पर श्रद्धा है । कंबोडिया के लोग मानते है कि भगवान श्रीविष्णु उनके रक्षक हैं । इससे यह ध्यान में आया कि उन्हें गरुड, वासुकी, समुद्रमंथन, सुमेरू पर्वत, रामायण, महाभारत आदि हिन्दू धर्म से संबंधित नाम और उनका महत्त्व उन्हें ज्ञात है । उसका एक प्रमाण है प्रतिदिन कंबोडिया के राष्ट्रीय वस्तु संग्रहालय के परिसर में होनेवाला ‘अप्सरा’ नृत्य !

कंबोडिया की नृत्य शैली ‘अप्सरा नृत्य’ कहलाती है । यहां के हिन्दू मंदिरों की भित्तियों पर अलग अलग मुद्रा में अप्सराएं और उनकी नृत्य शैली दिखाई देती है । संभवत: इन मूर्तिंयों से ही यह नृत्य कला आई होगी’, ऐसा लगता है ।

 

३. ‘अप्सरा’ नृत्य में प्रतिदिन अलग अलग दृश्य होते है, नृत्य में सहभागी
कलाकारों द्वारा भारत की पारंपरिक वेशभूषा से मिलती जुलती वेशभूषा धारण करना !

१. अप्सरा नृत्य में समुद्र मंथन की झांकी प्रस्तुत करते हुए कलाकार । इसमें एक ओर देव और दूसरी ओर दानव दिखाई दे रहे हैं । दानवों के हाथ में नाग का मुख है, तो देवताआें के हाथ में नाग की पूंछ दिखाई दे रही है । मध्य में कूर्मावतार धारण किए श्रीविष्णु दिखाई दे रहे हैं ।

‘अप्सरा’ नृत्य में प्रतिदिन अलग अलग दृश्य होते है । कभी रामायण का सीता-हरण और वानर-असुर युद्ध, कभी महाभारत के कुछ चयनित प्रसंग, तो कभी समुद्रमंथन का दृश्य होता है । जिस दिन हम ‘नोम फेन’ पहुंचे, उसी दिन हमें गुरुकृपा से समुद्र मंथन के दृश्यवाला ‘अप्सरा’ नृत्य देखने हेतु मिला । (छायाचित्र क्रमांक १ और २ देखें) उसमें गायक, वादक और नर्तक, ऐसे अनेक अलग अलग कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में होते हैं ।

यह वेशभूषा भारत की पारंपरिक वेशभूषा से मिलती जुलती है और अत्यधिक सुंदर है । ‘भारत से ३ सहस्र कि.मी. दूरी पर कंबोडिया जैसे बौद्ध राष्ट्र में सनातन हिन्दू धर्म की परंपरा नृत्य के रूप में जीवित है और वह उनकी जीवन शैली है’, यह देख कर हमनी ईश्‍वर के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त की ।

४. कंबोडिया में समुद्र मंथन का दृश्य दिखाने
का कारण स्पष्ट करते हुए ‘पूर्वज हिन्दू थे, ऐसाबतानेवाले और
भगवान श्रीविष्णु देश की रक्षा करते है’, ऐसी श्रद्धावाले कंबोडिया के नागरिक !

२. दूसरे प्रसंग में समुद्र मंथन के उपरांत प्राप्त अमृत तथा अन्य वस्तुएं लेकर बैठे देवता दिखाए गए हैं ।

‘अप्सरा’ नृत्य का आरंभ होने से पहले उस नृत्यकला के विशारद और शिक्षक से हमारी भेंट हुई । उन्होने सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ को देखकर ‘आप भारत से आई हुई लगती हैं । यह आपकी साडी से मैंने पहचान लिया । हमारे यहां आज ‘अप्सरा’ नृत्य में समुद्र मंथन का दृश्य होगा’, ऐसा बताया ।

तब सद्गुरु गाडगीळ ने उनसे पूछा ‘‘कंबोडिया में समुद्र मंथन का दृश्य दिखाने का क्या कारण है?’’ तब नृत्य विशारद ने कहा ‘‘यद्यपि मैं बौद्ध हूं, तो भी हमारे पूर्वज हिन्दू ही थे । यहां सभी जितना बुद्ध को मानते हैं, उतना ही भगवान श्रीविष्णु को भी मानते हैं । भगवान श्रीविष्णु हमारे देश की रक्षा करते है, ऐसी हमारी श्रद्धा है ।’’ तत्पश्‍चात हमने समुद्र मंथन का दृश्य और अन्य पारंपरिक दृश्योंवाला वह नृत्य देखा ।

– श्री. विनायक शानभाग, कंबोडिया (२४.३.२०१८)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात