अहं के प्रकार एवं निर्मिति

अहं के कौन-कौन से प्रकार हैं ?

अ. तामसिक अहं

जिसमें तमोगुण की प्रधानता है । उदाहरणार्थ केवल स्वकर्तृत्व (अर्थात मैं करता हूं, मेरे कारण हुआ) को ही मानना ।

आ. राजसिक अहं

जिसमें रजोगुण की प्रबलता है । उदाहरणार्थ निरंतर सुख के लिए प्रयत्न करना ।

इ. सात्त्विक अहं

जिसमें सत्त्वगुण की प्रधानता है । उदाहरणार्थ त्याग का अहं ।

अहं की निर्मिति होने के क्या कारण हैं ?

 

इसके दो कारण हैं –

१. व्यावहारिक जीवन एवं २. आध्यात्मिक जीवन

१. व्यावहारिक जीवन

अ. नामकरण से अहं का आरंभ होता है । व्यक्ति स्वयं को उसी विशिष्ट नाम से पहचानने लगता है और भूल जाता है कि वास्तव में वह ब्रह्म है ।

आ. धन एवं लोकैषणा के कारण अर्थात संपत्ति, पद, अधिकार, राज्य इत्यादि की प्राप्ति से अहं बढता है, उदाहरणार्थ हिरण्यकश्यप एवं रावण, राज्यप्राप्ति के उपरांत मदोन्मत्त हो गए । फल की अपेक्षा रखने से अहं आता है ।

इ. पारिवारिक अहं : अपने बच्चे, सगे-संबंधी, घर इत्यादि के प्रति ममत्व ।

ई बुद्धि का अहं : बुद्धिजीवी दुष्प्रचार करते हैं कि ‘अध्यात्म, देवता, साधना, भूत प्रेत आदि सब पाखंड है । किसी बात को समझे बिना, उसे अनुभव किए बिना, केवल स्वयं को कोई बात नहीं जंचने पर वे उसे झूठ ठहरा देते हैं !

२. आध्यात्मिक जीवन

अ. पांडित्य का अहं

१. ‘भगवान श्री रामकृष्ण कहते थे, ‘यदि ग्रंथ को विवेक-वैराग्ययुक्त अंतःकरण से न पढें, तो उनके पठन से दांभिकता, अहं इत्यादि बढता है ।

२. वामन पंडित ने सर्व पंडितों एवं विद्वानों को पराजित कर, उन से पराजयपत्र लिखवा लिए थे । एक बार वामन पंडित एक पेड के नीचे संध्या के लिए बैठे । उस पेड की डाल पर एक ब्रह्मराक्षस बैठा था । पेड की दूसरी डाल पर एक और ब्रह्मराक्षस बैठने लगा, तो पहले ब्रह्मराक्षस ने दूसरे को बैठने से मना करते हुए कहा, ‘‘यह स्थान वामन पंडित के लिए रखा है, क्योंकि उसे बहुत अहं हो गया है ।’’ उसी क्षण वामन पंडित ने सर्व पराजयपत्र फाड दिए और साधना के लिए हिमालय की ओर निकल गए ।

आ. पंथ का अहं

सच्चा धर्म है, ‘सब पर निरपेक्ष प्रेम (प्रीति) करना ।’ ऐसा होते हुए भी विविध पंथों के अनुसार साधना करनेवाले कुछ (नासमझ) लोग स्वयं के पंथ को श्रेष्ठ समझकर अन्य पंथों को तुच्छ दृष्टि से देखते हैं ।

इ. संप्रदाय का अहं

सर्व संप्रदायों की उत्पत्ति का मूल उद्देश्य सत् की अर्थात ईश्वर की खोज है; परंतु वर्तमान काल में संप्रदाय के अनुयायियों में अपने संप्रदाय के देवता, संस्थापक, सीख इत्यादि के प्रति अहंकार रहता है । इसलिए उन्हें अन्य संप्रदायों के प्रति अपनापन नहीं लगता ।

ई. साधना का अहं

१. कुछ वर्ष साधना करने से, एक साधक को निर्विचार अवस्था प्राप्त हुई । तदुपरांत वे जानबूझकर अपने मन में यौनसंबधी अथवा हत्या करने जैसे बुरे विचार प्रयत्नपूर्वक लाने लगे; परंतु ऐसे विचार क्षणभर भी नहीं टिकते थे । ऐसा जब २ माह तक चला, तो उन्हें अहंकार हो गया कि ‘मैं अब जीत गया हूं ।’ उसी क्षण उनके मन में अपनेआप ही बुरे विचार आने लगे एवं अगले ५ वर्ष तक बहुत प्रयत्न करने के पश्चात ही ये बुरे विचार रुके । संक्षेप में, अहंकार के कारण उस साधक के ५ वर्ष व्यर्थ गए !

२. सिद्धियों (साधना के फलस्वरूप प्राप्त शक्ति द्वारा अद्भुत चमत्कार होते हैं । इसे सिद्धि कहते हैं ।) के कारण भी अहं हो सकता है, उदाहरणार्थ रावण । संतों द्वारा भी किसी विशेष कार्य के लिए सिद्धियों का प्रयोग होता है; परंतु उनमें अहं नहीं होता ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘अहं-निर्मूलन के लिए साधना ’