स्वीकारने की वृत्ति कैसे बढाना ?

‘स्वीकारने की वृत्ति बढाना’ इस विषय पर श्रीराम से मिला मार्गदर्शन

साधक अपनी स्थिति सुधारे, तो चूक को स्वीकार पाना संभव !

‘एक दिन मेरा श्रीरामसे सूक्ष्म स्तरीय संवाद हुआ । ‘इस जीव के स्वभावदोष और अहं निर्मूलन होनेके लिए कैसे प्रयास करने चाहिए’ इस विषय पर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा से श्रीराम ने मुझे बताया । ‘स्वीकारने की वृत्ति’ कैसे निर्मित करें और उसे कैसे बढाएं’ इस विषय पर श्रीराम ने इस जीव को बहुत प्रेम से आगे का मार्गदर्शन दिया ।

 

१. चूक हो अथवा न हो, उसे स्वीकारने से श्रीराम
कल्याण ही करेंगे, यह ईश्‍वर का श्रीराम के उदाहरण से बताना

मुझमें स्वीकारने की वृत्ति अल्प है । तब ईश्‍वर ने मुझे कहा ‘कोई भी चूक न होते हुए श्रीराम ने १४ वर्ष का वनवास स्वीकार किया । उस समय समाज राक्षसों से त्रस्त था । वनवास में रहकर श्रीराम ने रावण जैसे बलाढ्य असुर और अन्य लाखों असुरों का नाश किया । केवल श्रीराम ने वनवास स्वीकार किया, इसलिए समाज का इतना भला हुआ । इसलिए तुम्हारी एक प्रतिशत भी चूक हो, तो भी तुम्हें उसे १०० प्रतिशत मान लेना चाहिए । तुम्हारी चूक हो अथवा न हो, तुम उसे मानती गई, तो जिस श्रीराम ने अखिल मानवजाति का कल्याण किया, क्या वह तुम्हारा कल्याण नहीं करेगा ?’

 

२. ‘त्रुटिपूर्ण कृति से साधना में हानि होती है’ यह संस्कार चूक
बतानेवाले साधकों के माध्यम से परात्पर गुरु डॉक्टरजी कर रहे हैं, इसलिए चूक
स्वीकारते समय चिडचिडाहट नहीं कृतज्ञता ही व्यक्त होनी चाहिए’ ऐसा श्रीराम का बताना

तत्पश्‍चात श्रीराम में और मुझमें आगे दिया संवाद हुआ।

मैं : मेरी एक ही चूक अलग अलग साधकों ने मुझे अलग अलग दिन बताई । तब ‘एक ही चूक ३ साधक क्यों बताते हैं ?’ ऐसा विचार मेरे मनमें आया और मुझे चिडचिडाहट हुई।

श्रीराम : मां अपने बच्चे को प्रत्येक बार बताती है ‘बेटा, मिट्टी मुख में नहीं डालना । इससे पेट दुखता है । मिट्टी खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ।’ वह जैसे बार बार बताकर बच्चे पर संस्कार करती है, ठीक वैसा ही परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ‘तुमसे हो रहा कृत्य अनुचित है और वैसा करने से तुम्हारी साधना की हानि हो रही है’ यह संस्कार साधकों के माध्यम से तुम्हारे मन पर कर रहे हैं । इसलिए कोई कितनी ही बार चूक बताए, तो भी तुरंत कृतज्ञता व्यक्त करो ।

 

३. चूक कौन बताता है, इसका महत्त्व नहीं; उसे सुधारने का प्रयास करना आवश्यक !

मैं : ‘एक साधिका की मुझसे अधिक चूकें होती हैं, तो भी वह मुझे मेरी चूकें कैसे बताती है ?’ ऐसा मुझे लगता है ।

उस समय श्रीराम ने मुझे ‘अहंनिर्मूलनके लिए साधना’ इस ग्रंथ की वामन पंडित की कथाका स्मरण दिलाया।

श्रीराम : ब्रह्मराक्षस ने वामन पंडितजी को बताया कि उसमें बहुत अहं है । यह सुनकर वामन पंडितजी सभी पराजयपत्र फाड डाले और वे साधना करने हिमालय गए । वामन पंडित ने एक राक्षस की बताया स्वीकार की । तुम्हें तो साधक बता रहे हैं । तुम्हारी साधना की हानि न हो, इसके लिए उनके माध्यम से परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ही तुम्हें बता रहे हैं । इसके लिए सच में तो तुम्हें कृतज्ञ होना चाहिए । आजके समय में यह उदाहरण देखो । एक गुंडे ने एक साधक को उसकी चूक बताई । उसने उसे मानकर चूक सुधारने के प्रयास किए और आगे चलकर वे संत बने ।

श्रीराम ने मुझे घट-घट के वासी राम इस पंक्ति का स्मरण दिलाया । तब ‘सभी में श्रीराम को देखना सीखना चाहिए’ इसका मेरे मन को भान हुआ ।

 

४. चूक किसी भी ढंगसे बताई, तो भी उसे स्वीकारना चाहिए !

मैं : किसी ने चूक बढा चढाकर बताई, तो मैं वह स्वीकार नहीं पाती।

श्रीराम : पाठशाला में शिक्षक हमें डांटते हैं, पीटते हैं और दण्ड भी देते हैं । तब हम ‘शिक्षक मुझे डांटते हैं, इसलिए मैं पाठशाला नहीं जाऊंगा’ ऐसा नहीं कहते । हमें सीखना है, इसलिए हम पाठशाला में जाते ही हैं न ! उसी प्रकार ईश्‍वर को तुम्हारा अहं नष्ट करना है और तुम्हें मोक्ष तक ले जाना है, इसलिए तुम्हें चूक को मानना है और ईश्‍वर का उद्देश्य सफल करना है ।

 

५. स्वयं का स्वीकार करने पर चूक स्वीकार करना सुगम हो जाता है !

मैं : कभी कभी अपनी चूक ध्यान में आनेपर मन कारण ढूंढता है ।

श्रीराम : तुमने स्वयं को नहीं स्वीकारा, इसलिए ऐसा होता है । अपनेआप को पूरे मन से स्वीकार करना है । स्वयं में स्वभावदोष और अहं हैं, यह मानना है । जब स्वयं को स्वीकार करना कठिन हो जाता है, तब ध्यान में रखना है कि तुममें इतने स्वभावदोष और अहं रहते हुए भी परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने तुम्हें स्वीकार किया है । स्वयं को (स्वभावदोष और अहं के साथ) स्वीकार करने से चूक मानना सुगम होता है ।

 

६. जिस साधक के प्रति पूर्वाग्रह है, उसके माध्यम
से चूक बताकर ईश्‍वर का ‘पूर्वाग्रह और स्वीकारने की वृत्ति
का अभाव’ इन दोनों स्वभावदोषों को मिटाने में सहायता करना

श्रीराम : जिनके प्रति हमारे मन में पूर्वाग्रह रहता है उन्हीं साधकों को ईश्‍वर हमारी चूकें बताने के लिए चुनता है, अर्थात् ईश्‍वर एक साथ ‘पूर्वाग्रह ग्रस्तता और स्वीकारने की वृत्ति का अभाव’, इन दोनों स्वभावदोषों को हटाता है । इसलिए जब ऐसा होगा, तब ‘मेरे स्वभावदोष और अहं मिटाने के लिए ईश्‍वर कितनी सहायता कर रहा है !’ इसका भान रखकर उसे तुरंत स्वीकारना है और कृतज्ञता व्यक्त करनी है । ईश्‍वर तुम्हारी छोटी से छोटी चूक ध्यान में ला देता है, क्योंकि ‘यह जीव परिपूर्ण होकर मुझसे (ईश्‍वरसे) एकरूप हो’ ऐसा ईश्‍वर को लगता है ।

 

७. ‘साधक और परिस्थिति गुरू के ही रूप हैं’ ऐसा मानने से स्वीकारना सुगम हो जाता है !

मी : हे श्रीराम, मैं परिस्थिति स्वीकार नहीं कर पाती । अचानक किसी ने कुछ बताया, तो ‘मैं यह नहीं जानती थी अथवा मुझे यह पहले नहीं बताया’ ऐसे विचार तुरंत मन में आते हैं । उसी प्रकार संबद्ध साधिका को यह पहले से पता था, तबभी वह अब अचानक बता रही है, ऐसी उसके प्रति मन में प्रतिक्रियाएं आती हैं । मैं क्या करूं?

श्रीराम : ऐसे प्रसंगों मेें हम कितनी मात्रा में और कितने समय तक स्थिर रह सकते हैं, क्या हमें गुरु का स्मरण होता है, क्या हम ईश्‍वर की सहायता लेते हैं, आदि बातों की परीक्षा होती है । जैसे समर्थजी ने कल्याण की(शिष्य की) परीक्षा ली, वैसे गुरु शिष्य की परीक्षा लेंगे ही । पेड, फूल, नदी आदि में देवत्व अनुभव करना सुगम है, क्योंकि वे मनुष्यके जैसे बोलते नहीं; किन्तु साधक और परिस्थिति भी गुरु के ही रूप हैं । हमारे यहां अचानक बिना सूचनाके अतिथि आएं, तो हम ‘अतिथी देवो भव’कहकर उनका स्वागत ही करते हैं । उन्हें क्या चाहिए, क्या नहीं चाहिए इसका ध्यान रखते ही हैं न !

 

८. श्रीराम के कहे अनुसार ‘साधक देवो भव ।’ ऐसा जप करने
पर अंतर्मनमें जिनके प्रति अयोग्य विचार, पूर्वाग्रह और प्रतिक्रियाएं हैं, ऐसे
साधकों के मुख दिखना और तत्पश्‍चात् सभी साधकों में श्रीराम दिखकर कृतज्ञता लगना

श्रीराम ने मुझे कहा ‘अब तुम ‘साधक देवो भव ।’ ऐसा जप २ मिनट करो । श्रीरामके बताए अनुसार मैंने ‘साधक देवो भव ।’ ऐसा जप २ मिनट किया । तब जिन साधकों के प्रति मेरे मन में अयोग्य विचार, पूर्वग्रह और प्रतिक्रियाएं हैं, उनके मुख मुझे दिखने लगे । उस समय एक साधक का मुख देखकर मुझे अचरज हुआ, क्योंकि ‘मेरे मनमें उनके प्रति अयोग्य विचार नहीं है’, ऐसा मुझे लगता था । उस समय श्रीराम ने मेरे अंतर्मन में उनके प्रति रहनेवाले अयोग्य विचारों का मुझे भान कराया । तब मानस रीतिसे उनके चरणों पर माथा रखकर मैंने उनसे क्षमा मांगी । २ मिनटके उपरांत मैंने जप रोक दिया, किन्तु मैं साधकों में देवत्व अनुभव नहीं कर पाई । कुछ समय के उपरांत मुझे साधकों के मुख क्षणमात्र दिखें और दूसरे क्षण उनके हृदयमें श्रीराम दिखने लगा और मुझे बहुत कृतज्ञता अनुभव हुई ।

 

९. गुरु ही साधकों के रूप में साधना के अगले चरण में ले जाने के लिए आए हैं,
इसे ध्यान में रखकर मानस रीति से साधकों के चरणों पर माथा रखकर प्रार्थना करें !

श्रीराम : गुरु केवल परीक्षा हीनहीं लेते । सच में तो वे तुम्हें कुछ देनेके लिए आते हैं । वह साधकों के रूप में तुम्हें साधना के अगले चरण में ले जानेके लिए आते हैं । तब चिडचिडाहट हुई, प्रतिक्रिया आई और तुम्हारा भाव न हो, तो गुरु तुम्हें क्या देनेवाले हैं, तुम्हें क्या सिखाने वाले हैं, यह तुम कभी नहीं जान पाओगी । इसलिए जब साधक तुम्हें कुछ बताने तुम्हारे पास आते हैं, तब वे साधक अथवा साधिका गुरु ही हैं, इसका ध्यान रखकर मानस रीति से उनके चरणों पर माथा रखें और ‘हे श्रीगुरु, मैं आपकी सेविका हूं । मेरा जन्म आपकी सेवाके लिए ही है । आपकी क्या आज्ञा है ?’ ऐसी प्रार्थना करें ।

 

१०. स्वीकारने की वृत्ति के चरण

अ. पहले अपनी चूक मन से स्वीकारना

आ. तदनंतर दूसरों से हुई चूकों का उत्तरदायित्व लेना

इ. विभागस्तर पर हुई चूकों के लिए स्वयं उत्तरदायी हूं, इसका भान होना

ई. आश्रमस्तर पर हो रही चूकों के लिए स्वयं उत्तरदायी हूं, इसका भान होना

ये ‘स्वीकारने की वृत्ति’के आगे के चरण हैं ।

 

११. चूक किसी की भी हो, उसे स्वीकार कर जो सुधार करता है, उसका आगे बढना

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के संदर्भ में पूर्व में हुए एक प्रसंग का स्मरण श्रीराम ने मुझे कराया । एक बार परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में उपस्थित एक संत ने दैनिक में छपी साधकों की चूकें पढकर सुनाई (? दैनिकमें छपे लेखनमें साधकोंसे हुई चूकें—-)। तब परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी उठे और बोले ‘‘साधकों को घडानेमें मैं न्यून रहा।’’ अपनी चूक न रहते हुए भी उन्होंने सबके सामने क्षमा मांगी । वास्तवमें, साक्षात् श्रीविष्णुस्वरूप परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने स्वयं इन चूकों के लिए साधकों का सत्संग लिया था ।

उन्होंने साधना के विविध अंग और विविध योगमार्गों पर मार्गदर्शन देनेवाले अनेक ग्रंथ प्रकाशित किए और आज भी उनका ग्रंथनिर्मिति का कार्य अविरत चल रहा है । दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक नियतकालिकों के माध्यम से उन्होंने सतत साधकों का मार्गदर्शन दिया और आज भी कर रहे हैं । उन्होंने अपनी कृति, आचरण, बोलना, इनसे साधकों को सिखाया है और आज भी वे रात-दिन प्राणों पर खेलकर साधकों की प्रगति के लिए प्रयासरत हैं । उनको क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।

यह उदाहरण बताकर श्रीराम ने कहा ‘इसे ध्यान में रखकर अब आगे बढना है । चूक किसी की भी हो, जो उसे स्वीकारकर सुधारने का प्रयास करता है, उसपर ईश्‍वर तथा गुरु की कृपा होती है और उसका कल्याण होता है ।’

 

१२. ‘गुरु की कृपा प्राप्त करनी है’, इस ध्येय पर ध्यान देने से सबकुछ स्वीकारना संभव

श्रीराम की कृपा से मन में आगे दिए विचार आए ‘चूक न स्वीकारने के सहस्रों कारण रहते हैं; किन्तु ‘गुरु की कृपा प्राप्त करनी है’, यह एक ही कारण सबकुछ स्वीकारने के लिए पर्याप्त है । चूक स्वीकारने से यदि मुझपर गुरुदेवजी की कृपा होकर मुझे ईश्‍वरप्राप्ति और मोक्षप्राप्ति होनेवाली हो, तो मुझे उसे क्यों नहीं स्वीकारना चाहिए ? मेरा ध्येय गुरुदेवजी की कृपा प्राप्त करना है और मुझे उसका ही ध्यान रखना है ।’

हे गुरुदेव, आपकी अखंड कृपा, अपार प्रीति, आपका संकल्प, आपके अस्तित्व से और आप परमदयालु, परमकृपालु, वात्सल्यसिंधु, कारुण्यसिंधु होने के कारण यह सब हो रहा है।

हे गुरुदेव, यह केवल आपकी ही कृपा है । आपने दी यह अनुभूति ही है । मैं उसे आपके कोमल चरणों में धीमे से अर्पित करती हूं । गुरुदेव, अनंत कोटि कृतज्ञता व्यक्त की, तो भी वह थोडी ही है । मैं ‘इस जीव के स्वभावदोष और अहं नष्ट कर उसे आपके चरणों से पूर्णत: एकरूप करा लें’ ऐसी प्रार्थना करती हूं ।’

– कु. सुप्रिया जठार, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

अ. ‘किसी ने भी, कैसे भी, किसी भी रीति से, कितनी भी बार और कितने भी लोगोंके सामने चूक बताई, तो भी उसे मन से स्वीकार पाना, यह है ‘स्वीकारने की वृत्ति होना ।’ इसके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी और श्रीराम का आदर्श सामने रखकर प्रयास करने चाहिए ।

आ. ‘मुझे क्या लगता है ?’ ऐसा विचार करके अपने मन को प्रधानता देने की अपेक्षा ‘सामनेवाले को क्या लगता है ?’ इसे समझ लिया, तो स्वीकारना संभव होता है ।

इ. स्वीकार नहीं पाते, अर्थात् हम कहीं तो न्यून रहते हैं । तब क्षणभर रूककर और तत्काल शरण जाकर प्रार्थना और चिंतन करें । इसके अनंतर की कृति होती है स्वीकारना और उसके अनुसार स्वयं में परिवर्तन करना ।’