श्री गणेशमूर्ति विसर्जन का विरोध करनेवाले ढोंगी सुधारकों की टोली का पशुवधगृह और अपशिष्ट जल (गंदे पानी) के कारण होनेवाले जलप्रदूषण की ओर अनदेखा !

अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

गणेशोत्सव समीप आ गया है । अब सदा की भांति स्वयं को पर्यावरणप्रेमी कहलानेवाले स्वयंघोषित सुधारक और उनके संगठन के कार्यकर्ता सक्रीय हो जाएंगे । गणेशोत्सव में गणेशमूर्ति विसर्जित करनेसे जलप्रदूषण होता है, ऐसी बात कुछ लोगों ने कुछ वर्ष पूर्व उडाई थी । धर्मशिक्षा के अभाव और कथित पुढारलेपण के कारण अनेक लोग उनकी बातों में आ गए; परंतु अब ये स्वयंघोषित समाजसुधारक और समाजसेवकोंकी पोल खुल गई है । गणपति की मूर्ति को लगाए जानेवाले रंग के कारण जल-प्रदूषण होता है । इस कारण ऐसी मूर्ति तालाब, नदी, खाडी, समुद्र में विसर्जित न कर; कृत्रिम जलाशय में विसर्जित करने की अथवा उन स्वयं घोषित संगठनों को दान देने की फैशन चल पडी है ।

सहस्रों वर्ष से चले आ रहे गणेश मूर्ति के विसर्जन से कभी पर्यावरण की हानि नहीं हुई; परंतु विज्ञान ने केवल १०० वर्ष में ही पर्यावरण नष्ट कर दिया है । जब हिन्दुत्वनिष्ठ यह कहते हैं कि धर्मद्रोहियों को गणेशमूर्ति विसर्जन बंद करना है, इसलिए वे उसके द्वारा होनेवाले तथाकथित प्रदूषण का शोर मचाते हैं, तब धर्मद्रोही प्रतिवाद करते हैं कि, यह हिन्दुत्वनिष्ठों का शोर है, हम वास्तव में प्रदूषण के विरोध में प्रयत्न करते हैं ।

होळी छोटी करें-रोटी दान करें, यह अभियान हों अथवा गणेशमूर्ति दान लेने का अभियान हो, अनिंसवालों से पूछना चाहिए कि आगे दिए हुए प्रदूषण के समय वे क्या करते हैं ? इसके लिए यह लेखप्रपंच है !

 

१. पशूवधगृहों से होनेवाले प्रदूषण को अनदेखा करनेवाले ढोंगी सुधारकों की टोली !

१ अ. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक का ब्यौरा !

नियंत्रक और महालेखापरीक्षक का आर्थिक वर्ष २०१०-११ (३१ मार्च २०११ को समाप्त हुआ आर्थिक वर्ष) के ब्यौरे में जलप्रदूषण के स्रोत के विषय में बताते हुए उन्होंने पशुवधगृहों का उल्लेख किया था । उसमें आगे दिए अनुसार कहा है ।

पशुवधगृहों से बाहर फेंके जानेवाले गंदे पानी के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम १९८६ अंतर्गत मात्रा निर्धारित की गई है और अधिसूचित भी किया गया है । पशुवधगृहों में मांस धोने के लिए और हत्या का स्थान स्वच्छ करने के लिए भारी मात्रा में पानी का उपयोग होता है । विहीत मात्रा के अनुपात में गुणवत्ता रखने के लिए पशुवधगृहों से बाहर छोडे जानेवाले गंदे पानी पर योग्य प्रकार से प्रक्रिया की जाए, ऐसा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने (सी.पी.सी.बी.ने) विहीत किया है । (जनवरी २००१). इन पशुवधगृहों में से बिना प्रक्रिया किए ही छोडे जानेवाले पानी से रोग फैलानेवाले इन घटकों की (रोगकारकों की) वृद्धि होती है । वे भूमि में समाहित होकर वहां का पानी प्रदूषित करते हैं ।

परीक्षण किए गए छह क्षेत्रीय कार्यालयों के अभिलेखों के विश्‍लेषण से ऐसे ध्यान में आया है कि उनके कार्यक्षेत्र की कक्षा में ५६ पशुवधगृह थे । इनमें से ३९ पशुवधगृह प्रदूषण नियंत्रण मंडल से बिना किसी अनुमति के चल रहे थे । इसके साथ ही उन्होंने संमति के लिए सादा आवेदन भी नहीं दिया था । औरंगाबाद (संभाजीनगर) में केवल एक पशुवधगृह के लिए इ.टी.पी. की (एफ्ल्यूएंट ट्रीटमेंट ांट की) व्यवस्था की गई थी । ५५ पशुवधगृह अपना गंदा पानी बिना उस पर कोई प्रक्रिया किए खुले नालों में छोड रहा था । जो अंत में जाकर निकटतम जलस्रोत से मिल रहा था । औरंगाबाद महानगरपालिका, नासिक महापालिका इत्यादि संबंधित स्थानीय संस्थाआें को निर्देश (दिशा) देकर (जुलाई २००८ में) पशुवधगृहों के विरुद्ध कार्यवाही की गई थी, ऐसी प्रविष्टियां क्षेत्रीय कार्यालयों में हैं । तथापि जल अधिनियम १९७४ के विभाग ३३ (अ) के अंतर्गत बंदी के निर्देश अथवा पानी एवं बिजली की आपूर्ति खंडित किए जाने के निर्देश संबंधित पशुवधगृहों को मार्च-अप्रैल २०११ तक दिए नहीं गए थे । महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल द्वारा यद्यपि महानगरपालिकाआें को निर्देश एवं कारण दिखाओ सूचनापत्र जारी किए गए थे, तब भी त्रुटियुक्त पशुवधगृहों पर की जानेवाली कार्यवाही से संबंधित जल (प्रदूषण प्रतिबंध और नियंत्रण) अधिनियम १९४७ के विभाग ४१ से ४४ में दी गईं व्यवस्थाआें का पालन नहीं किया गया था ।

उपरोक्त सभी बातें यही स्पष्ट करती हैं कि इतनी भारी संख्या में अवैधरूप से चल रहे पशुवधगृह और उनके कारण होनेवाली पर्यावरण की हानि स्वयंघोषित ढोंगी सुधारकों को कभी दिखाई नहीं दी । ऐसे पशुवधगृहों के विरोध में कार्यवाही करनेपर विशिष्ट समाज की भावना आहत होंगी । इसलिए ये ढोंगी सुधारक ऐसी बातों के विरोध में कुछ नहीं करते हैं । पशुवधगृहों से होनेवाले इस प्रदूषण को अनदेखा करनेवाली यह ढोंगी सुधारकों की टोली गणेशमूर्ति विसर्जन के संदर्भ में सक्रिय हो जाती है । इस टोली को पशुवधगृह बंद करने का विचार तक का साहस जिस विशिष्ट समाज की आक्रमकता के कारण नहीं हुआ, वैसी आक्रमकता हिन्दू नहीं दिखाते; इसलिए क्या इस टोली को गणपति का अनादर करने का साहस होता है ?

 

२. करोडों लीटर अपशिष्ट जल से नदियां दूषित होने पर भी उसे अनदेखा करनेवाली स्वयंघोषित सुधारकों की टोली !

२ अ. भीमा नदी प्रदूषण नियंत्रण कृति ढांचा

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के पुणे के प्रादेशिक कार्यालय में भीमा नदी प्रदूषण नियंत्रण कृति ढांचा २०१० मे बनाया था । १२७ पानी ढांचे में जलप्रदूषण से संबंधित आगे दिए महत्त्वपूर्ण सूत्र दिए हैं ।

२ अ १. पुणे जिले के अनेक बडे शहर और गांव नदी किनारे बसे हैं । इस नागरी बस्तियों से निर्माण होनेवाला अपशिष्ट पानी (गंदा पानी) कुछ अंश पर प्रक्रिया कर और शेष सर्व पानी बिना किसी प्रक्रिया के भीमा नदी में छोड दिया जाता है । भीमा नदी में विविध नगरपालिका और नागरी बस्तियों से निर्माण हुए अपशिष्ट पानी पर प्रक्रिया कर उसका नि:सारण करना अपेक्षित है । प्रत्यक्ष में प्रतिदिन ५४ करोड १९ लाख २० सहस्र लीटर अपशिष्ट पानी बिना कोई प्रक्रिया किए ही सीधे भीमा नदी में छोड दिया जाता है ।

२ अ २. शहर और स्थानीय स्वराज्य संस्थाआें से बडी मात्रा में घनकचरा निर्माण होता है । यह घनकचरा अत्यंत गलत और अशास्त्रीय पद्धति से खुले में फेंक दिया जाता है । उस पर वर्षा का पानी गिरकर उसमें से लिचेट (leachate) (घनकचरा से निर्माण हुए एक हानिकारक द्रवपदार्थ) पानी के साथ जलस्रोत में जाकर मिल जाता है । ये भी नदी के प्रदूषण का एक कारण है ।

२ अ ३. स्थानीय स्वराज संस्था, उद्योगधंधों से निर्माण होनेवाले घनकचरे का व्यवस्थापन घातक कचरा (व्यवस्थापन एवं नियमन) नियम, १९८९ (सुधारित नियम) इस विनियम में निर्देशित किए गए नियमों समान हो रहे हैं और रुग्णालय इत्यादि से निर्माण होनेवाला घनकचरा जैव वैद्यकीय कचरा (व्यवस्थापन एवं नियमन) नियम १९९८ (सुधारित नियम सहित) इस विनियम में निर्देशित किए नियम समान हो रहे हैं; केवल प्रत्यक्ष में भीमा नदी की घाटी में स्थानीय स्वराज संस्थाआें से निर्माण होनेवाले घनकचरा का योग्य व्यवस्थापन नहीं किया जाता । उसकी मात्रा आगे दिए अनुसार है ।

२ अ ३ अ. पुणे महापालिका के क्षेत्र में प्रतिदिन १ सहस्र ७० मेट्रिक टन कचरा निर्माण होता है और उनमें से ५०० मेट्रिक टन कचरा अशास्त्रीय और गलत पद्धति से खुले में फेंक दिया जाता है ।

२ अ ३ आ. पिंपरी-चिंचवड महापालिका के क्षेत्र में प्रतिदिन ५५० मेट्रिक टन कचरा निर्माण होता है और उनमें से ५२० मेट्रिक टन कचरा अशास्त्रीय और गलत पद्धति से खुले में फेंक दिया जाता है ।

नीचे दी गई सारणी में भीमा नदी के किनारपट्टी की नगरपालिकाआें के क्षेत्र में प्रतिदिन निर्माण होनेवाले सब का सब घनकचरा बिना किसी प्रक्रिया न करते हुए खुले में डाला जाता है, उसकी मात्रा दी है ।

 

३. प्रतिदिन खुले में फेंका जानेवाला कचरा (मेट्रीक टन में)

पुणे जिला परिषद का आरोग्य और पानी आपूर्ति विभाग की ओर से भीमा नदी और तीसरी उपनदियों के किनारे बसे हुए गांवों का सर्वेक्षण किया गया । उसके अनुसार नदी के किनारे लगभग १९६ गांव आते हैं । उन्हें प्रतिदिन २ करोड ४३ लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है । उससे पीने के पानी का स्रोत जांचनेपर कुल ७० गांव बाधित घोषित किए गए ।

आगे दी गई सारणी में तालुकानिहाय गावों की संख्या और बाधित गावों की संख्या का विवरण है ।

नगरपालिका कचरा *
लोणावळा २५
तळेगांव १०.५
आळंदी ०६.०
जुन्नर ०६.०
शिरूर ०५.०
सासवड ०५.०
जेजुरी ०२.०
नगरपालिका कचरा
दौंड ०६.५
बारामती १६.०
इंदापुर ०३.५
देहू ०९.४
खडकी ३२.५

* प्रतिदिन खुले में फेंका जानेवाला कचरा (मेट्रीक टन में)

भीमा नदी में प्रतिदिन कुल १२३ करोड ९६ लाख ३० सहस्र (हजार) लीटर अपशिष्ट पानी (गंदा पानी) छोडा जाता है । उसमें से ६९ करोड ७७ लाख १० सहस्र (हजार) लीटर अपशिष्ट पानी पर प्रक्रिया की जाती है और शेष ५४ करोड १९ लाख २० सहस्र लीटर पर कोई भी प्रक्रिया किए बिना ही भीमा नदी में छोड दिया जाता है ।

आगे दी गई सारणी में तालुकानिहाय गावों की संख्या और बाधित गावों की संख्या का विवरण है ।

तालुका कुल गांवों की संख्या बाधित गांवों की संख्या
दौंड ३३ २९
हवेली ३५ ०१
इंदापुर १९ १९
खेड ३५ १४
शिरूर ११ ०७

वर्ष के ३६५ दिन नदियों में गणेशमूर्तियां विसर्जित नहीं की जातीं, तब भी प्रतिदिन करोडों लीटर अपशिष्ट पानी (गंदा पानी) नदियों में मिलकर उन्हें दूषित कर देता है और स्वयंघोषित सुधारकों की टोली इसे अनदेखा कर देती है । इससे स्पष्ट होता है कि यह टोली केवल हिन्दुआें के त्यौहारों के विरोध में ही कार्य कर रही है । प्रदूषण के लिए पशुवधगृह भी कारणीभूत हैं; परंतु इन स्वयंघोषित सुधारकों ने उसके विरोध में कभी आवाज नहीं उठाई ।

– अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, अध्यक्ष, हिन्दू विधिज्ञ परिषद