देवता को चित्र-विचित्र रूप में दिखाकर देवता की अवकृपा ओढ न लें !

उत्सव मनोरंजन और कला के प्रदर्शन के लिए नहीं, अपितु देवता की उपासना कर चैतन्यप्राप्ति के लिए होते हैं । हिन्दुआें के त्योहारों के दिन संबंधित देवता का तत्त्व पृथ्वीपर बडी मात्रा में कार्यरत होता है । श्री गणेश चतुर्थी की कालावधि में श्री गणेशतत्त्व का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए श्री गणेशजी की आराधना की जाती है । श्री गणेशजी की मूर्ति यदि मूर्तिशास्त्र के अनुसार योग्य आकार में अर्थात प्रत्यक्षरूप से श्री गणेशजी के वास्तविक रूप में हो, तो श्रद्धालुआें को उससे लाभ होता है । अध्यात्मशास्त्र के अनुसार देवता के शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और शक्ति एकत्रित होती है । अतएव देवता का रूप धर्मशास्त्र के अनुसार ही होना चाहिए । उससे देवता का तत्त्व कार्यरत होता है । विविध आकारों में, साथ ही विविध वस्तुआें से देवता की मूर्ति बनाई गई, तो उससे उस देवता का तत्त्व प्रक्षेपित नहीं होता और श्रद्धालुआें को भी उससे कुछ लाभ नहीं होता ।

 

अलग-अलग उपकरणों से श्री गणेशमूर्ति !

स्वतंत्रता संग्राम के समय लोकाग्रह के कारण मोहनदास गांधी अथवा नेहरू का रूप सामने रखकर मूर्ति बनाई जाती थी । उसके अनुसार आज भी कुछ स्थानोंपर शिवाजी महाराज की भांति दिखनेवाली, किसी संत की भांति दिखनेवाली मूर्ति बनाई जाती है । फुटबॉल अथवा क्रिकेट खेलनेवाले गणेशजी, बुलेटपर विराजमान गणेशजी जैसी गणेशमूर्तियां भी बनाई जाती हैं । मुंबई के निकट कल्याण के एक गणेशोत्सव मंडल ने तो चिकित्सा उपकरणों से गणेशमूर्ति बनाई थी । उसमें सुंड के रूप में इंजेक्शन की सीरींज, कान के रूप में किडनी ट्रे, मुकुट के रूप में बोतल, आंखों के रूप में कैप्सुल जैसे विविध चिकित्सा उपकरणों का उपयोग किया गया था । ऐसी मूर्तियां बनाते समय केवल कल्पनाविलास तथा आधुनिक जीवनप्रवाह का निष्फल मेल करने का प्रयास किया जाता है, जो सर्वथा अनुचित है; क्योंकि गणेशजी की तुलना किसी नेता, सैनिक, खिलाडी इत्यादि से नहीं की जा सकती । उथली लोकप्रियताा तथा प्रसिद्धि के लिए गणेशमूर्ति का मानवीकरण किया जाता है । संत और देवता में अंतर है; इसलिए संतों के रूप में भी गणेशजी की मूर्ति की स्थापना नहीं करनी चाहिए ।

 

देवता को चित्र-विचित्र रूप में दर्शाने से देवता का अनादर !

वर्ष १९५० में महाराष्ट्र शासन की ओर से गणेशमूर्ति का वेषांतर तथा मानवीकरण करनेपर प्रतिबंध लगा दिया था; परंतु कालांतर से इन नियमों में ढीलापन आ गया । अलग-अलग रूपों में तथा वेशभूषाआें की मूर्तियों के कारण लोगों में विद्यमान उस देवता के प्रति श्रद्धा और भावपर परिणाम होता है, साथ ही देवता को चित्र-विचित्र रूपों में दिखाने से वह देवता का अनादर ही सिद्ध होता है ।
अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से लाभ करा देनेवाली मूर्ति बनाएं !

अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से प्रत्येक देवता एक विशिष्ट तत्त्व है । शब्द, रूप, रस, गंध तथा उनसे संबंधित शक्तियां एकत्रित होती हैं । इस सिद्धांत के अनुसार मूर्तिविज्ञान के अनुसार योग्य मूर्ति बनाने से ही केवल उस मूर्ति में उस संबंधित देवता का तत्त्व आकर्षित होता है । इस सिद्धांत का पालन न कर मूर्ति बनाने से उस मूर्ति में यह तत्त्व नहीं आ सकता । इसके फलस्वरूप अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से श्रद्धालुआें को उससे लाभ नहीं होता ।

सार्वजनिक गणेशोत्सव में कई बार अयोग्य रूप में गणेशमूर्ति लाई जाती है । इसके इन कार्यकर्ताआें को ‘हमने इस वर्ष कुछ नया कर दिखाया’, ऐसा लगता है । कई बार सामान्य हिन्दू भी ऐसी मूर्ति उत्साह के साथ देखने के लिए जाते हैं और इसकी प्रशंसा भी करते हैं । यह सब धर्म के प्रति अज्ञान का परिणाम होता है । वास्तव में ऐसी मूर्ति, तो देवता का अनादर होता है । अब हम इसी विषय में विस्तार से देखेंगे ।

 

श्री गणेशजी का अनादर करनेवाली मूर्ति क्या होती है ?

कई शतकों से ऋषी-मुनी, संत-महात्माआें ने अपने ग्रंथों में श्री गणेशजी के रूप का वर्णन किया है । ‘यह वर्णन उन्होंने अपनी साधना से प्राप्त अनुभूतियों के आधार से ही किया है । कल्पना से नहीं !’, इसे हमें समझ लेना पडेगा । उस रूप से संतों को प्रत्यक्षरूप से ॐ कार की अनुभूतियां भी प्राप्त हुई हैं । धर्मशास्त्र में इसी रूप के विषय में बताया गया है । ‘उपासना के लिए श्री गणेशजी का योग्य रूप यदि सामने रखा गया, तो उससे सामान्य लोगों को इससे अधिकाधिक लाभ होगा’, यह स्पष्ट होने से धर्मशास्त्र में ‘श्री गणेशजी की मूर्ति कैसी होनी चाहिए ?’, इसके निर्देश दिए गए हैं । ऐसा होते हुए भी शतकों से धर्मशास्त्र में विदीत और वह भी संतों को प्राप्त अनुभूतियों के कारण सुनिश्‍चित रूप की अपेक्षा उत्सव में अन्य किसी भी भिन्न रूप में श्री गणेशजी की मूर्ति रखना, तो उसका अनादर ही है न ?

प्लास्टिक से बनी वस्तुआें से, लोहे के साचे में पत्थर डालकर, सब्जियों से, ठंडे पेयों के बोतलों से बनाई गई मूर्तियां, लंबी सुंडवाली अयोग्य रूप में बनाई गई मूर्ति, राजनेताआें के साथ चाय पी रहे गणेशजी, ऐसे विविध रूपों में गणेशमूर्तियां बनाई जाती हैं ।

ऐसी मूर्तियों के कारण श्री गणेशजी का अनादर होता है । श्री गणेशजी की अयोग्य रूप में मूर्ति लाने से आध्यात्मिक स्तरपर तो कोई लाभ होता ही नहीं, उल्टे उससे हानि ही होती है । संतों को, साधना करनेवालों को तथा देवता के प्रति भाव रखनेवालों को इसका अंदर से ही भान होता है ।

श्री गणेशजी का अनादर करनेवाली प्रतिमा का उपयोग करने से वातावरणपर आध्यात्मिक स्तर से नकारात्मक परिणाम बढकर सकारात्मक परिणाम न्यून हो जाता है । सर्वसामान्य प्रतिमा का उपयोग किया गया, तो सकारात्मक परिणाम कुछ मात्रा में बढता है और यदि धर्मशास्त्र के अनुसार साधना के रूप में और संतों के मार्गदर्शन में बनाई गई प्रतिमा का उपयोग करने से इस नकारात्मकता का परिणाम बहुत न्यून होकर सकारात्मक परिणाम बहुत बढता है ।

इससे श्री गणेशजी का अनादर करनेवाली प्रतिमा का उपयोग करना कितना अयोग्य है तथा श्री गणेशजी की धर्मशास्त्र के अनुसार बनाई गई प्रतिमा का उपयोग करना कितना योग्य है, यह स्पष्ट होता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्री गणपति’

व्यावसायिक प्रतिष्ठान क्या कभी अन्य धर्मियों के आस्था के केंद्रों के अनादर का साहस दिखाते हैं ?

एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान द्वारा श्री गणेशजी का अनादर किया गया है । इसके अंतर्गत बालों को श्री गणेशजी का आकार दिया गया है । ११ सितंबर २०१८ को दैनिक लोकमत के पृष्ठ क्र. १ पर यह विज्ञापन प्रकाशित हुआ है ।

इस प्रकार से देवता का मानवीकरण कर उसका उत्पादन की बिक्री के लिए उपयोग करना निंदनीय ही है !

व्यावसायिक प्रतिष्ठान ‘फॉर्च्युन बेसन’ ने श्री गणेशजी रूचि से बेसन के लड्डू खा रहे हैं, ऐसा दिखाया है और इसके द्वारा श्री गणेशजी का अनादर कर विज्ञापन के लिए उनका उपयोग किया है । यह विज्ञापन दैनिक सकाळ के पृष्ठ क्र. ३ पर प्रकाशित हुआ है । (सितंबर २०१८)

 

पुणे के निकट के एरंडवणे परिसर में ‘गणेश भेल’
की ओर से पानीपुरी की १० सहस्र पुरियों से बनाई गई गणेशमूर्ति


खाद्यपदार्थों से मूर्ति बनाना भी श्री गणेशजी का अनादर ही है !

इस प्रकार से ऊंचे और खाद्यपदार्थों से बनाई गई गणेशमूर्ति का पूजन और विसर्जन, तो कैसे करेंगे ?

 

कच्चे केलों के गुच्छे से बनाई गए बहुत बडे आकारवाली श्री गणेशमूर्ती


देवता का अनादर करनेवाला चित्र निकालकर उसका उपयोग मनोरंजन के लिए करना, तो देवता का अनादर ही है !

 

दैनिक सकाळ में प्रकाशित श्री गणेशजी का अनादर करनेवाला चित्र


इस प्रकार से मनुष्यरूप में बनाई गई अशास्त्रीय मूर्तियां धर्मशिक्षा के अभाव का परिणाम !

 

एक पुलिस निरीक्षक द्वारा अपने घर में प्रतिष्ठापित गणेशमूर्ति


(इस पृष्ठपर श्री गणेशजी के चित्र छापने का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करना नहीं है, अपितु पाठकों को वास्तविकता समझ में आए, यह है ! – संपादक)

 

नागपुर के आदिवासी छात्रालय में कूडेकरकट से बनाई गई गणेश प्रतिमा !


कूडेकरकट से बनाई गई गणेशमूर्ति पर्यावरणपूरक नहीं है, अपितु पर्यावरण की हानि करनेवाला है । ‘सृष्टि एको रिसर्च’ इस संस्था द्वारा निकाले गए निष्कर्ष से यह स्पष्ट होता है कि ऐसी मूर्ति के विसर्जन से जल में विद्यमान प्राणवायु (ऑक्सिजन) की मात्रा न्यून हो जाती है, साथ ही जलचरों द्वारा यह कागद खाने से उनकी श्‍वासनली में यह कागद फंसकर उनकी मृत्यु हो जाती है । इसके विपरित ‘सृष्टि इको रिसर्च’ इस संस्था की ओर से प्लास्टर ऑफ पैरिस के कारण जलप्रदूषण नहीं होता, यह निष्कर्ष निकाला गया है ! पर्यावरणपूरक गणेशोत्सव के नामपर आधुनिकतावादियों द्वारा चलाए जानेवाले अभियान पर्यावरण की हानि करनेवाले हैं, इसे ध्यान में लें !

 

धर्महानि रोकना कालानुसार आवश्यक धर्मपालन !

देवताआें की उपासना के मूल में श्रद्धा होती है । देवताआें का किसी भी प्रकार से किया जानेवाला अनादर इस श्रद्धापर ही आघात करता है, जिससे कि वह धर्महानि होती है । धर्महानि रोकना कालानुसार आवश्यक धर्मपालन है और वह उस देवता की समष्टि स्तर की साधना ही है । बिना इस उपासना के देवता की उपासना पूर्ण नहीं हो सकती है । इसलिए गणेशभक्तों को इस विषय में जागरूक होकर धर्महानि को रोकना होगा । सनातन संस्था इस संदर्भ में वैधानिक पद्धति से कार्य कर रही है ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

Donating to Sanatan Sanstha’s extensive work for nation building & protection of Dharma will be considered as

“Satpatre daanam”