श्रीविष्णु के अष्टावतारों में से प्रत्येक अवतार द्वारा किए कार्य की भांति परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा किए जा रहे अवतारी कार्य का साधिका द्वारा किया यथार्थ वर्णन !

कु. निधि देशमुख

१. प.पू. गुरुदेव शिव एवं विष्णु होने के कारण उनकी स्तुति करने के लिए उन्हीं से प्रार्थना करना

१ अ. ‘हर’ को करते हम प्रणाम, करते याचना करें ‘हरि’ का गुणगान ।

भले ही हैं कर्पूरगौर वे, पर राजीवलोचन रखते ।
शिरोमणि हैं ज्ञान के, सबको भक्तिमार्ग दिखाते ॥ १ ॥
स्वयं कष्ट का विषपान करते, उपचारों की संजीवनी देते ।
मोक्ष मार्ग पर चलाते, सनातन धर्मराज्य स्थापित करते ॥ २ ॥
ऐसा आपका यह जीवनपट, ‘हरि-हर’ एकरूपता का प्रमाण ।
‘हर’ को करते हम प्रणाम, करते याचना करें ‘हरि’ का गुणगान ॥ ३ ॥

२. श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं प.पू. गुरुदेवजी की जन्मतिथि,
भाईयों में क्रमांक, अवतारत्व प्रकट होने की अवस्था, तथा संबंध किससे ?

टिप्पणी १ : राम को ‘आत्माराम’ कहते हैं; उन्होंने उच्च चरित्र की शिक्षा दी है । कृष्ण के रूप की चर्चा ही अधिक हुई और उन्होंने देह से किए जानेवाले कर्म की अर्थात कर्ममार्ग की शिक्षा दी है । रोगादि के कारण जर्जर हो चुकी देह के कारण कर्म से; और अल्प सात्त्विकता के कारण आत्मा से जुडाव रखना संभव नहीं, इसलिए गुरुदेवजी ने मन आनंदी रखने की शिक्षा दी है ।

टिप्पणी २ : कलियुग के अंतकालतक अधिकांश जीवों की देह रोगादि के कारण जर्जर हो जाएगी; उस समय गुरुदेवजी का उदाहरण उनके सामने रखने के लिए श्रीविष्णु ने प्रौढावस्था की लीला की है ।

३. अष्टावतारों के कार्य की भांति कलियुग में परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा हो रहा कार्य

३ अ. मत्स्यावतार

१. मत्स्यावतार ने प्रलय के समय विश्‍वबीज का रक्षण किया । वर्तमान संकटकाल में प.पू. गुरुदेव केवल मानव, पशुपक्षी के ही नहीं; संस्कृति, ज्ञान, विद्या, कला आदि के बीज बचा रहे हैं । इसके लिए उन्होंने ‘आध्यात्मिक संग्रहालय’ निर्माण किया है ।

२. मत्स्य अवतार में ईश्‍वर ने प्रवाह के विरुद्ध, अर्थात उद्गम की ओर जाने की शिक्षा दी । उसी प्रकार गुरुदेवजी ने आधुनिकता के प्रवाह के विरुद्ध धर्म की ओर जाने हेतु धर्मशिक्षा दी ।

३ आ. कूर्मावतार

१. इस अवतार ने विश्‍वबीज से पूरी नई सृष्टि निर्माण की । प.पू. गुरुदेवजी ने ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की नींव रखकर एक नई सृष्टि की रचना करने, उनसे जुडे जीवों को इसका दायित्व सौंपा है ।

२. इस अवतार में भगवान ने षड्रिपुआें को नियंत्रित करने की शिक्षा दी । प.पू. गुरुदेवजी ने स्वभावदोष, अहं-निर्मूलन प्रक्रिया सिखायी ।

३ इ. वराह अवतार

१. वराह अवतार ने जलप्रलय से पृथ्वी का रक्षण किया और वेदों को बचाया । प.पू. गुरुदेवजी ने गुरुकुल की स्थापना कर वेदों को नया जीवन प्रदान किया है और अनुचित मतों का खंडन कर यह धरोहर सारे संसार तक पहुंचाई है ।

२. इस अवतार नेे साधना करते समय प्राण भी चले जाएं; तब भी साधना नहीं छोडनी चाहिए, ऐसी शिक्षा दी । ‘प.पू. गुुरुदेवजी ने साधकों के प्राण जाने पर भी उनकी साधना जारी रहे, इसका ध्यान रखा है ।

३ ई. नृसिंह अवतार

१. इस अवतार ने भक्त को बचाने का उदाहरण रखा है; गुरुदेवजी ने साधक कितनी भी विकट स्थिति में फंसा हो और उसे बचाने में कितने भी कष्ट का सामना करना पडे, उसका साथ नहीं छोडा ।

२. इस अवतार में भगवान ने चराचर में अपना अस्तित्व दर्शाया । प.पू. गुरुदेवजी ने पूरे संसार के साधकों को अनुभूतियां प्रदान कर अपना अस्तित्व दर्शाया ।

३ उ. वामन अवतार

१. इस अवतार ने संपूर्ण पृथ्वी पर अपना आधिपत्य दर्शाया । प.पू. गुरुदेवजी ने पृथ्वी पर सनातन धर्मराज्य स्थापना की उद्घोषणा की है ।

२. इस अवतार में भगवान ने अपना सर्वव्यापकत्व दर्शाया । साधकों को गुरुदेवजी की सर्वव्यापकता क्षण-क्षण अनुभव होती है ।

३ ऊ. परशुराम अवतार

१. इस अवतार ने वर्ण-कर्म के परे जाकर अपने कर्तव्य के रूप में समाज का कल्याण किया । प.पू. गुरुदेवजी ने दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन करने का उद्घोष कर समष्टि का उद्धार करने की शिक्षा दी है ।

२. भगवान परशुराम ने अपनी कृति से ब्राह्मतेज और क्षात्रतेज की शिक्षा दी है । प.पू. गुरुदेवजी ने ब्राह्मतेज और क्षात्रतेज युक्त ग्रंथ संकलित कर साधकोंको दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन करना सिखाया ।

३ ए. श्रीरामावतार

१. इस अवतार ने मर्यादा में रहने की शिक्षा दी । प.पू. गुरुदेवजी ने अपनी कार्यपद्धति के माध्यम से मर्यादा निर्धारित करना सिखाया ।

२. श्रीराम ने आदर्श व्यक्तित्व दिखाया । प.पू. गुरुदेवजी ने साधना और स्वसूचना के माध्यम से उसे प्राप्त करना सिखाया है ।

३. श्रीराम ने अपने कर्म से सिखाया कि ‘आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति और आदर्श राजा’ कैसा होता है । यही नहीं ‘आदर्श शत्रु’ कैसा होना चाहिए, यह भी श्रीराम ने कृति से सिखाया । उनके कारण ही आदर्श राज्य-व्यवस्था को रामराज्य कहा जाता है । श्रीराम समान गुरुदेवजी ने भी कृति से आदर्शवत आचरण कर कलियुग में भी आदर्श जीवन जीने का उदाहरण रखा है ।

३ ऐ. श्रीकृष्णावतार

१. श्रीकृष्ण ने हर सीमा लांघने की शिक्षा दी । प.पू. गुुरुदेवजी ने ‘जो दिखाई दे वह कर्तव्य’, यह मंत्र देकर वह करना सिखाया ।

२. श्रीकृष्ण ने विराटता दिखाई । प.पू. गुरुदेवजी ने ‘इस विराटता को जीवन में कैसे अपनाएं’, यह सिखाया ।

३. श्रीराम ने सिखाया कि शांतिकाल में आदर्शवत जीवन कैसे जीना चाहिए । श्रीकृष्ण ने आपातकाल में कैसा जीवन जीना चाहिए, यह अपनी कृति से सिखाया । श्रीकृष्ण पूर्णावतार थे, इसलिए उन्हें अवतार न मानकर अवतारी अर्थात प्रत्यक्ष विष्णु ही माना जाता है । गुरुदेवजी ने आपातकाल में कैसा आचरण होना चाहिए, यह कृति से भी सिखाया और ग्रंथ में लिखकर भी रखा ।

४. सत्ययुग में सात्त्विकता अधिक होने से अवतारों को अवतार कार्य का परिचय कराने की आवश्यकता न रहना और कलियुग में अपने कार्य का परिचय कराने हेतु प.पू. गुरुदेवजी का पृथ्वी पर जन्म लेकर गुरुरूप धारण करना

सत्ययुग में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन आदि अवतार हुए । उस काल में सात्त्विकता अधिक होने के कारण अवतारकार्य से परिचित कराने की आवश्यकता नहीं थी । आज के काल में गुरुदेवजी के अवतारकार्य और धर्म से परिचित कराने के लिए अवतार को ही गुरु का कार्य भी करना पड रहा है । स्वयं के शरीर, वस्तुआें, वास्तु तथा परिसर में हो रहे परिवर्तनों से वे स्वयं ही हमें परिचित कराते हैं और उसका कार्यकारणभाव भी बताते हैं । हम कलियुग के जीवों का सौभाग्य है कि स्वयं अवतार अपने अवतारत्व से परिचित कराने गुरुरूप धारण कर पृथ्वी पर आए ।

श्रीविष्णु जगत के गुरु हैं; इसलिए उन्होंने अपने प्रत्येक अवतार में विश्‍व को ज्ञान प्रदान किया; परंतु इस अवतारी कार्य में ज्ञान प्रदान करने की उन्होंने अभिनव पद्धतियां खोजीं, आचरण से, शब्दों से, मन के विचारों से हर प्रकार से ज्ञान प्रदान किया । कला के माध्यम से, विद्या, गुण, शरीर, मन, बुद्धि इन सभी माध्यमों से साधना कैसे करना, यह सिखाया ।’

– कु. निधि देशमुख, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (४.११.२०१६)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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