अनुक्रमणिका
- १. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए प्लास्टिक के मग में विशिष्ट परिवर्तन होना
- २. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए प्लास्टिक के मग की ‘यू.ए.एस.’ उपकरण द्वारा किया गया वैज्ञानिक परीक्षण
- ३. मग में काफी चैतन्य निर्माण होना
- ३ अ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में पंचतत्त्वों के स्तर पर हुए विशिष्ट परिवर्तन एवं उसके पीछे का अध्यात्मशास्त्र
- ३ आ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा उत्तम प्रकार से उपयोग में लाए मग की ओर देखकर भावजागृति होना एवं उसे स्पर्श करने पर आनंद एवं प्रीति के स्पंदन प्रतीत होना
- ३ इ. संतों में निर्गुण चैतन्य के प्रभाव से उनके द्वारा उपयोग की वस्तुएं भी निर्गुण की ओर जाना आरंभ होना
- ३ ई. ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए गए मग से सूक्ष्मनाद सुनाई देना’, यह उनका कार्य निर्गुण स्तर पर व्यापक होने का निदर्शक होना
‘उच्च कोटि के संतों द्वारा दैनंदिन उपयोग में लाई निर्जीव वस्तुएं भी उन संतों में विद्यमान सत्त्वगुण से प्रभारित होकर पावन हो जाती हैं । संतों द्वारा उपयोग में लाई वस्तुओं का अध्ययन करने पर अध्यात्म की अनेक नई बातें सामने आईं हैं और प्राप्त हुए इस ज्ञान का, मानव के कल्याण के लिए उपयोग होगा । इस उद्देश्य से परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने अपनी, अन्य संतों एवं कुछ साधकों की वस्तुओं का प्रभामंडल एवं ऊर्जामापक यंत्र की सहायता से अध्ययन किया है । इससे उनकी जिज्ञासा के दर्शन होते हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए प्लास्टिक के मग में विशेष परिवर्तन ध्यान में आया । इस संदर्भ में सूत्र आगे प्रस्तुत हैं ।
१. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए प्लास्टिक के मग में विशिष्ट परिवर्तन होना
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने वर्ष २०१६ से लेकर अगले ४ वर्षतक प्लास्टिक के गुलाबी रंग का मग स्नान के लिए उपयोग किया था । स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में वर्ष २०२० में हुए कुछ विशिष्ट परिवर्तन ध्यान में आए, उदा. मग की ऊपर की ओर गोलाकार किनार हलकी गुलाबी रंग की होना, हाथ को मग का स्पर्श मुलायम और चिकना लगना और उस मग से विशेष नाद सुनाई देना इत्यादि ।
२. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए प्लास्टिक के मग की ‘यू.ए.एस.’ उपकरण द्वारा किया गया वैज्ञानिक परीक्षण
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग का ‘यू.ए.एस्. (युनिवर्सल ऑरा स्कैनर)’ उपकरण द्वारा किए निरीक्षण का विवरण एवं निष्कर्ष आगे दिया है ।
२ अ. किए हुए निरीक्षणों का विवरण
२ अ १. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में ‘इन्फ्रारेड’ एवं ‘अल्ट्रावॉयलेट’ दोनों प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा नहीं पाईं गईं ।
२ अ २. सभी व्यक्ति, वास्तु अथवा वस्तु में सकारात्मक ऊर्जा होती ही है, ऐसा नहीं है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में काफी सकारात्मक ऊर्जा थी और उसका प्रभामंडल २२.५५ मीटर से भी अधिक था ।
२ अ ३. वस्तु के संदर्भ में उनपर धूलकण अथवा उसका थोडासा भाग ‘नमूना’ के रूप में उपयोग कर उस वस्तु का ‘कुल प्रभामंडल’ (ऑरा) नापते हैं । सामान्य वस्तु का कुल प्रभामंडल लगभग १ मीटर होता है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए मग का कुल प्रभामंडल २२.५५ मीटर से भी अधिक था ।
टिप्पणी – परीक्षण का स्थान अपर्याप्त होने से मग की सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल एवं मग का कुल प्रभामंडल २२.५५ मीटर से आगे नाप नहीं पाए ।
२ आ. निष्कर्ष
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चैतन्य के प्रभाव से उनके द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में काफी चैतन्य (सकारात्मक ऊर्जा) निर्माण हुई ।
३. मग में काफी चैतन्य निर्माण होना
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ‘परात्पर गुरु’ पद के संत होने से उनमें बहुत चैतन्य है । उनके चैतन्य का परिणाम उनकी देह, उनकी दैनंदिन उपयोग की वस्तु, उनके कक्ष (निवासस्थान) एवं उनके कक्ष की वस्तुओं पर भी होता है । उन्होंने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग को भी उनका चैतन्यमय हस्तस्पर्श होने से उसमें बहुत चैतन्य निर्माण हो गया ।
३ अ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में पंचतत्त्वों के स्तर पर हुए विशिष्ट परिवर्तन एवं उसके पीछे का अध्यात्मशास्त्र
| परात्पर गुरुडॉक्टर द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए मग में पंचतत्त्वों के स्तर पर हुआ विशिष्टपूर्ण परिवर्तन | मग में हुए विशिष्टपूर्ण परिवर्तनों के पीछे अध्यात्मशास्त्र |
|---|---|
| १. मग के भीतरी भाग को चंदन की सुगंध आना | यह पृथ्वीतत्त्व के स्तर पर परिवर्तन है । चंदन की गंध में देवतातत्त्व आकृष्ट होता है । इसलिए पूजाविधि में देवताओं के लिए चंदन का (इसके साथ ही अत्तर, चंदन गंध की उद्वत्ती इत्यादि का) उपयोग किया जाता है । चंदन में विष्णुतत्त्व अधिक मात्रा में होता है । |
| २. मग की ऊपरी गोलाकार किनार हल्के गुलाबी रंग की होना | यह तेजततत्त्व के स्तर पर परिवर्तन है । इसे कहते हैं ‘वस्तु का निर्गुण की ओर जाना’ । संतों द्वारा प्रक्षेपित होनेवाले चैतन्य के कारण उन्होंने उपयोग में लाई वस्तुओं का रंग फीका होने लगता है । समय के साथ-साथ वह श्वेत-सा दिखाई देने लगता है । अन्य फीकी (हल्के रंग) हुई वस्तुओं की तुलना में इन वस्तुओं से भारी मात्रा में भाव के स्पंदन आते हैं ।) |
| ३. मग का स्पर्श हाथ में अत्यंत कोमल (मुलायम) एवं चिकना लगना | यह वायुतत्त्व के स्तर पर परिवर्तन होने से मन को आनंद प्रदान करनेवाला है । संतों के चैतन्यमय हस्तस्पर्श का यह परिणाम है । |
| ४. मग से निर्वात रिक्ती से नाद सुनाई देना | यह आकाशतत्त्व के स्तर पर परिवर्तन है । उच्च आध्यात्मिक स्तर के संतों में निर्गुण चैतन्य का यह परिक्षाम है । इसके साथ ही इस नाद की लय एकसमान है । |
३ आ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा उत्तम प्रकार से उपयोग में लाए मग की ओर देखकर भावजागृति होना एवं उसे स्पर्श करने पर आनंद एवं प्रीति के स्पंदन प्रतीत होना


परात्पर गुरु डॉक्टरजी स्नान के लिए उपयोग में लाए मग का ‘हैंडल’ (जिस स्थान से मग हाथ में पकडते हैं, वह भाग) टूट गया था । इसलिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ‘फेविकॉल’ लगाकर उसे जोडने के लिए कहा । तदुपरांत कुछ दिनों में पुन: मग का हैंडल टूट गया; तब उन्होंने पुन: उसे ‘फेविकॉल’ लगाने के लिए कहा । आगे कुछ दिनों पश्चात यह ध्यान में आने पर कि ‘फेविकॉल’ लगाने पर भी मग का हैंडल टिकता नहीं है’, उन्होंने हैंडल को लोहे की कीलें मारने के लिए कहा । सामान्य व्यक्ति मग का हैंडल टूटने पर वह मग फेंककर नया मग उपयोग के लिए लेते हैं । इसके विपरीत ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने टूटी हुई वस्तु दुरुस्त कर उसे पुन: कैसे उपयोग में ला सकते हैं’, इसका विचार कर उसे दुरुस्त कर उसका उपयोग करते हैं । इससे परात्पर गुरु डॉक्टरजी में मितव्ययता गुण अनुभव करने मिलता है । उन्होंने उत्तम प्रकार से उपयोग में लाए मग को देखने पर भावजागृति होती है और उसे स्पर्श करने पर आनंद के एवं प्रीति के स्पंदन प्रतीत होते हैं ।
३ इ. संतों में निर्गुण चैतन्य के प्रभाव से उनके द्वारा उपयोग की वस्तुएं भी निर्गुण की ओर जाना आरंभ होना
इससे हमें यह अनुभव करने मिला कि ‘संत जैसे-जैसे निर्गुण की ओर जाते हैं, वैसे-वैसे उनके द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुएं भी कैसे निर्गुण की ओर जाती हैं’ (उदा. मग का गुलाबी रंग फीका होकर सफेद-सा होना), वह हम साधकों को अनुभव करने मिला । ईश्वर ने परात्पर गुरु डॉक्टरजी की प्रत्यक्ष कृति से एवं उनके द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं के माध्यम से हमें यह सिखाया और मानो निर्गुण की एक अमूल्य धरोहर ही हमारे हाथों सौंपी है । यह इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जानेवाली घटना पहली बार हुई है ।’
३ ई. ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा स्नान के लिए उपयोग में लाए गए मग से सूक्ष्मनाद सुनाई देना’, यह उनका कार्य निर्गुण स्तर पर व्यापक होने का निदर्शक होना
परात्पर गुरु डॉक्टरजी का कार्य निर्गुण स्तर पर व्यापक हो रहा है, वैसा इस मग पर भी उनमें निर्गुण चैतन्य का परिणाम होकर वह भी निर्गुण स्तर पर, अर्थात आकाशतत्त्व के स्तर पर अधिक मात्रा में कार्य कर रहे हैं, ऐसा लगा । इसलिए उससे सूक्ष्म नाद अधिक मात्रा में सुनाई देता है ।
संक्षेप में, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी चैतन्य के स्रोत हैं । उनके चैतन्य का बहुत ही अच्छा परिणाम उनके द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं पर होता है और वह टिका रहता है । इसलिए ४ – ५ वर्ष बिना उस मग को उपयोग में लाए भी उसके स्पंदन टिके हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी के प्रत्यक्ष स्पर्श के स्पंदन जिसमें हैं, वह प्रत्येक बात ही समष्टि के कल्याणार्थ चैतन्य का प्रक्षेपण के स्तर पर अमूल्य हो जाती है, यही सत्य है !’
– कु. प्रियांका लोटलीकर, गोवा.
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