सर्वस्व त्याग कर साधना का आनंद अनुभव करनेवाले साधकों को आश्रय देनेवाली और उन्हें उच्च लोकों की अनुभूति करानेवाली पवित्र वास्तु का नाम है, सनातन आश्रम !


१. समाज के कुछ अज्ञानी लोगों का आश्रम के विषय में भ्रम !

समाज के कुछ अज्ञानी लोग आश्रम को तुच्छ समझते हैं । उन्हें लगता है कि आश्रम में वे लोग रहते हैं, जो अनाथ हैं अथवा जिनकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है अथवा जो गरीब हैं ! इसलिए, उनके मन में इस प्रकार के प्रश्‍न उत्पन्न होते हैं – इतना बडा अनाथाश्रम कौन चलता है ? वहां रहनेवाले लोग कैसे हैं ?

२. आश्रमजीवन का आनंद अनुभव करनेवाले साधकों के लिए सुख-भोग, ऐश्‍वर्य
आदि का महत्त्व शून्य लगना और समाज के लोगों का साधकों को पागल ठहराना

समाज के लोग सनातन के आश्रम में रहनेवाले साधकों को पागल समझते हैं । क्योंकि, आश्रम के छोटे से बडे तक किसी भी साधक को सांसारिक जीवन में रुचि नहीं रहती । इसी प्रकार, वे सब सांसारिक सुखों का, ऐश्‍वर्य का, तन, मन और धन का त्याग कर, आश्रम में साधना करते हैं । साधना करनेवाले व्यक्ति को सुखभोग, ऐश्‍वर्य आदि का महत्त्व शून्य लगता है । इनका त्याग करने पर उसे कभी पश्‍चाताप नहीं होता । वह निरंतर आनंद का अनुभव करता रहता है ।

 

३. ईश्‍वर के सामने याचकभाव से रहने के कारण संसार में सबसे धनवान और भाग्यवान सनातन के साधक !

कु. सुषमा पेडणेकर

सनातन के आश्रम, अर्थात सर्वस्व का त्याग कर, तन-मन-धन अर्पण करनेवाले जीवों का निवास स्थान ! यहां रहनेवाले साधक अपने स्वभावदोष और अहंकार को दूर करने का प्रयत्न करते हैं तथा जीवन का प्रत्येक पल चिंतारहित होकर जीते हैं । ईश्‍वर के सामने निरंतर याचकभाव से रहने के कारण वे विश्‍व के सबसे धनवान और भाग्यवान मानव हैं ।

आश्रमजीवन जीनेवाला व्यक्ति व्यावहारिक जीवन में कितना भी ऊंचे पद पर हो, आश्रम में रहते समय उसके मन में व्यावहारिक जीवन के विषय में कोई प्रश्‍न नहीं रहता । वह अपना सबकुछ ईश्‍वर को समर्पित कर चुका होता है । इसलिए, उसके मन में केवल ईश्‍वर को प्राप्त करने और सेवा के विचार होते हैं ।

 

४. सनातन के आश्रमों का वर्णन करने में आकाश
इतना कागद भी छोटा पड जाएगा; क्योंकि यहां शब्दों की
सीमा से परे रहनेवाले ईश्‍वर को प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है !

सनातन के आश्रमों का वर्णन करने में शब्द कम पड जाएंगे । यदि आकाश को कागद बनाकर उसपर सनातन के आश्रमों के विषय में लिखना आरंभ किया जाए, तो लिखते-लिखते वह भी छोटा पड जाएगा और वर्णन पूरा नहीं हो पाएगा । सनातन के आश्रम, अर्थात व्यक्ति के दुर्गुण समाप्त कर, उसे अच्छा बनाने का स्थान; दुःख से आनंद की ओर ले जाने का स्थान; भावों की नदी में डुबानेवाली भावनदी; शक्ति, चैतन्य, आनंद और शांति अनुभव करने का स्थान, कठिन प्रारब्ध पर विजय पाकर आनंद से जीने का स्थान !

 

५. सनातन के आश्रमों में स्थूल-सूक्ष्म तथा सजीव-निर्जीव सब रूपों में साधकों का ही निवास !

सनातन आश्रम की प्रत्येक स्थूल और सूक्ष्म; सजीव और निर्जीव वस्तु साधक ही है । उनसे निरंतर सीखते रहना चाहिए । सनातन आश्रम, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का विशाल रूप है । इस विशाल रूप में समाए साधकों का परात्पर गुरु डॉक्टरजी न केवल जीवित रहते, अपितु मृत्यु के पश्‍चात भी ध्यान रखते हैं । मृत्यु के पश्‍चात उनकी साधना का दायित्व लेकर उन्हें अनिष्ट शक्तियों से बचाते हैं । यहां हम बुद्धि से न समझी जानेवाली बातें अनुभव कर सकते हैं । यह स्थान सबके लिए निरंतर खुला रहता है । यहां छोटे-बडे का भेदभाव नहीं किया जाता ।

 

६. भगवान की विविध अवस्थाआें का अनुभव होना

सवेरे उठने पर मन में विचार आया, आज भगवान के विषय में कौन-सा भाव रखूं । तब, उत्तररूप में मन में विचार आया, हम आश्रम में रहते हैं, तो यहां भगवान के स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम इन सभी अवस्थाआें का अनुभव कर सकते हैं ! अतः, मैंने उन अवस्थाआें को अनुभव करने का प्रयत्न किया । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने मुझे आश्रम में रहने की और भगवान को अनुभव करने का अवसर दिया; इसलिए मैं उनके चरणों में अनंत कोटि कृतज्ञ व्यक्त करती हूं ।

हे परात्पर गुरु डॉक्टर, गुरु मां, आश्रम के भगवान की इन अलग-अलग अवस्थाआें का मुझे प्रत्येक पल अनुभव हो, यह आपके कोमल चरणों में आर्त प्रार्थना है !

– कु. सुषमा पेडणेकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२१.१०.२०१७)