कुमकुमार्चन विधि और देवीकी आंचलभराई का महत्व

सारणी

१. कुमकुमार्चन

१ अ. कुमकुमार्चनका शास्त्रीय आधार

१ आ. कुमकुमार्चनके परिणामस्वरूप एक साधिकाको हुई एक बोधप्रद अनुभूति

२. देवीकी आंचलभराई

२ अ. देवीकी आंचलभराईका महत्त्व

२ आ. देवीकी आंचलभराईकी उचित पद्धति

२ इ. देवीके आंचलभराईके सूक्ष्म-परिणाम

२ ई. देवीके लिए अर्पित साडी परिधान करनेसे एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति

२ उ. देवीकी आंचलभराई करनेकी सामग्री अंजुलिमें लेकर, विशिष्ट मुद्रामें खडे रहनेके परिणाम

 


 

१. कुमकुमार्चन

 

 

देवीकी उपासनामें कुमकुमार्चनका महत्वपूर्ण स्थान है । अनेक स्थानोंपर नवरात्रिमें भी विशेष रूपसे यह विधि करते हैं । देवी सहस्त्रनाममें दिए देवीके एक-एक नामका उच्चारण कर अथवा देवीका नामजप करते हुए देवीको एक-एक चुटकीभर कुमकुम अर्पण करनेको `कुमकुमार्चन’ कहते हैं ।

कुमकुमार्चन करते समय सर्वप्रथम देवीका आवाहन कर पूजन करते हैं । उपरांत देवीके नामका उच्चारण कर देवीकी मूर्ति पर कुमकुम अर्पण करते हैं। देवीके चरणोंसे आरंभ कर और सिरतक चढाकर, उन्हें कुमकुमसे आच्छादित कर देते हैं । कुमकुमार्चन पूर्ण होनेपर देवीकी आरती उतारते हैं । सबके कल्याणके लिए प्रार्थना करते हैं।

 

१ अ. कुमकुमार्चनका शास्त्रीय आधार

कुमकुमका रंग लाल होता है । मूल कार्यरत शक्तितत्त्वकी निर्मिति लाल रंगके प्रकाशसे हुई है । कुमकुमकी विशिष्ट सुगंध होती है । इस सुगंधकी तरंगें वातावरणमें प्रक्षेपित होती रहती हैं। मूल शक्तितत्त्वके बीजकी सुगंध कुमकुमकी सुगंधके समान ही होती है । कुमकुमद्वारा प्रक्षेपित इन गंध-तरंगोंकी ओर ब्रह्मांडमें विद्यमान शक्तितत्त्वकी तरंगें अल्प कालावधिमें आकृष्ट होती हैं । इसलिए मूल शक्तितत्त्वके रंगके एवं गंध तरंगोंके प्रतीकस्वरूप कुमकुमद्वारा अर्चन कर मूर्तिमें देवीके सगुण तत्त्वको जागृत करते हैं । इससे पूजकको इन शक्तितत्त्वकी तरंगोंका लाभ होता है ।

कुंकुमार्चनमें प्रयोग किया गया कुमकुम, देवीपूजनके फलस्वरूप देवीकी शक्तिसे संचारित हो जाता है । इसके उपयोगसे लोगोंको विविध अनुभूतियां होती है ।

 

१ आ. कुमकुमार्चनके परिणामस्वरूप
एक साधिकाको हुई एक बोधप्रद अनुभूति

कुमकुमार्चन हेतु प्रयोग किए गए कुमकुमको मस्तकपर लगानेसे प्रार्थना एवं नामजप भावपूर्ण होकर उत्साह प्रतीत होना

सत्ताईस जनवरी दो सहस्र चारके दिन वे गोवाके श्री सातेरी देवालयमें कुमकुमार्चन हेतु गई थी । उनके द्वारा चढाए गए कुमकुमसे पुजारीने देवीके मूर्तिका अर्चन किया । उसके उपरांत देवीसे प्रार्थना कर पुजारीने वह कुमकुम श्रीमती रक्षंदाजीको दिया । कुमकुम लेते हुए श्रीमती रक्षंदाजीने देवीसे प्रार्थना की, `हे देवीमां, इस कुमकुमसे हमें शक्ति मिले, हमारी प्रार्थना और नामजप उत्तम ढंगसे हो ।’ तबसे वे जब भी अपने मस्तकपर देवीके प्रसादके रूपमें मिला कुमकुम लगाती हैं, तब उनका नामजप आरंभ हो जाता है और एक अनोखा उत्साह प्रतीत होता है । – श्रीमती रक्षंदा राजेश गांवकर ।

इस अनुभूतिसे देवीको कुमकुमार्चन करनेका और प्रसादस्वरूप वह कुमकुम लगानेका महत्त्व समझमें आता है ।

 

२. देवीकी आंचलभराई

देवीपूजन अंतर्गत आंचलभराई की विधि की जाती है । आंचलभराई अर्थात् देवीको साडी, चोली-वस्त्र और नारियल अर्पण कर, देवीपूजन संपन्न करना ।

 

२ अ. देवीकी आंचलभराईका महत्त्व

देवीको साडी एवं चोली-वस्त्र अर्पण करनेका अर्थ है, अपनी आध्यात्मिक उन्नति अथवा कल्याणके लिए देवीके निर्गुण तत्त्वको, सगुणमें आनेके लिए आवाहन करना । देवीकी आंचलभराई करते समय, प्रत्यक्ष कार्यकी सफलताके लिए देवीसे प्रार्थना करते हैं । इससे पूजनद्वारा कार्यरत देवीके निर्गुण तत्त्वको, साडी एवं चोली-वस्त्रके माध्यमसे, मूर्त सगुण रूपमें साकार होनेके लिए सहायता मिलती है ।

देवीकी आंचलभराई अपनी-अपनी कुलपरंपराके अनुसार अथवा प्रांतानुसार भिन्न प्रकारसे होती है । उत्तर भारतमें देवी मांको लाल चुनरी चढाते हैं । सामान्यत: देवीकी आंचलभराई करते समय देवीको यथाशक्ति साडी और चोली-वस्त्र अथवा केवल चोली-वस्त्र अर्पण करते हैं । विशिष्ट देवीको विशिष्ट रंगकी साडी एवं चोली-वस्त्र अर्पण करनेसे उस देवीका तत्त्व संबंधित व्यक्तिके लिए अल्पावधिमें कार्यरत होता है ।

कुछ देवियोंके नाम एवं उनसे संबंधित रंग

१. श्री दुर्गादेवीको लाल

२. श्री महालक्ष्मीको लाल एवं केसरी

३. श्री महासरस्वतीदेवीको श्वेत एवं लाल

४. श्री महाकालीको जामुनी एवं लाल रंगके वस्त्र अर्पण करने चाहिए ।

इससे स्पष्ट होता है आंचलभराई अंतर्गत किस देवीको कौनसे रंगका वस्त्र अर्पण करना चाहिए । इससे यह भी स्पष्ट होता हैं, कि लाल रंगमें शक्तितत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता सर्वाधिक होती है ।

 

२ आ. देवीकी आंचलभराईकी उचित पद्धति

१. देवीको अर्पण करनेके लिए सूती अथवा रेशमी साड़ीका चयन कीजिए । सूती एवं रेशमी धागोंमें देवतासे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें ग्रहण कर, उन्हें संजोकर रखनेकी क्षमता अन्य धागोंकी तुलनामें अधिक होती है ।

२. देवीका आंचल भरनेके लिए थालीमें साडी रखकर उसपर चोली-वस्त्र, नारियल एवं थोडे चावल रखिए । ध्यान रहे, नारियलकी शिखा देवीकी ओर हो ।

३. यह सर्व सामग्री हाथोंकी अंजुलिमें लेकर, अंजुलि सीनेके सामने कर देवीसमक्ष शरणागत भावसे खडे रहिए ।

४. चैतन्य प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति हेतु देवीसे भावपूर्ण प्रार्थना कीजिए । इससे सगुण देवीतत्त्वके जागृत होनेमें सहायता मिलती है ।

५. आंचलभराईकी सामग्रीको देवीके चरणोंमें अर्पित कीजिए और उसपर चावल चढाइए ।

६. अंतमें देवीको नमस्कार कीजिए ।

इस प्रकार देवीकी आंचलभराई करनेसे देवीतत्त्वका लाभ होता है । संभव हो, तो देवीके चरणोंमें अर्पित वस्त्रको उनके प्रसादके रूपमें स्वीकार कर परिधान करना चाहिए तथा नारियलको प्रसादके रूपमें ग्रहण करना चाहिए । देवीतत्त्वसे संचारित वस्त्र प्रसादके रूपमें परिधान करनेसे देवीतत्त्वका लाभ मिलता रहता है । देवीकी आंचलभराईमें अभी बताई गई सामग्रीका उपयोग करनेसे सूक्ष्म स्तरपर जो प्रक्रिया होती है, वो जान लेते हैं ।

 

२ इ. देवीके आंचलभराईके सूक्ष्म-परिणाम

नारियल की शिखाकी ओर देवीतत्त्व आकृष्ट होता है । इस तत्त्वको साड़ी एवं चोली-वस्त्रमें संचारित करनेमें नारियल सहायक होता है । नारियल की सहायतासे यह तत्त्व साड़ी एवं चोली-वस्त्रमें संचारित होता है । साथ ही, नारियल की शिखासे प्रक्षेपित तरंगोंके कारण, जीवके शरीरके चारों ओर सुरक्षा-कवचका निर्माण होता है । देवीको अर्पित वस्त्रसे पृथ्वीतत्त्वकी सहायतासे सात्त्विक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । नारियल-पानीमें विद्यमान आपतत्त्वकी सहायतासे, नारियलसे आपतत्त्वयुक्त तरंगे प्रक्षेपित होती हैं । इन तरंगोंके कारण, देवीको अर्पित वस्त्रसे प्रक्षेपित तरंगें गतिमान एवं कार्यरत होती हैं । इन तरंगोंसे पूजक महिलाके देहके चारों ओर सुरक्षा-कवचकी निर्मिति होनेमें सहायता मिलती है ।

इस सामग्रीके समान ही चावल भी चैतन्य ग्रहण एवं प्रक्षेपित करनेमें अग्रणी है । इसलिए आंचलभराईमें सर्वसमावेशक चावलका उपयोग किया जाता है । आंचलभराईके फलस्वरूप देवीको अर्पित साडी और चोली-वस्त्र देवीतत्त्वसे आवेशित हो जाते हैं । इन वस्त्रोंमें विद्यमान सात्त्विक तरंगोंके कारण, पूजक महिलाके प्राणदेह एवं प्राणमयकोषकी शुद्धि होनेमें सहायता मिलती है ।

 

२ ई. देवीके लिए अर्पित साडी परिधान
करनेसे एक साधिकाको हुई बोधप्रद अनुभूति ।

देवीको अर्पित साडी प्रसाद समझकर पहननेसे प्राणशक्ति बढना और शरीरके चारों ओर सुरक्षाकवचकी निर्मिति होना

प्रतिदिन अधिकाधिक सात्त्विकताका लाभ हो, इसके लिए मैं सात्त्विक पोशाकके रूपमें साडी पहनती हूं । इससे मुझे सेवा करते हुए उत्साहका अनुभव होता है । एक दिन मैनें देवीके लिए अर्पित साडी उनका प्रसाद समझकर पहनी । इससे मेरी प्राणशक्ति बढ गयी । मुझे अपने शरीरके चारों ओर चैतन्यके सुरक्षाकवचकी निर्मितिका भान हुआ । प्रतिदिन अनिष्ट शक्तियोंके बाह्य आक्रमणोंके कारण मुझे सवेरे जागनेपर प्राणशक्ति एवं उत्साहका अभाव प्रतीत होता था । परंतु जिस दिन मैने देवीके लिए अर्पित साडी पहनी, उस दिन मुझे ऐसा कोई कष्ट नहीं हुआ । मुझे कष्ट होते हैं, इस बातका ही विस्मरण हो गया । – कु. सुषमा

 

२ उ. देवीकी आंचलभराई करनेकी सामग्री
अंजुलिमें लेकर, विशिष्ट मुद्रामें खडे रहनेके परिणाम

देवीकी आंचलभराई करते हुए, हाथोंकी जो मुद्रा बनती है, उससे पूजक महिलाके देहमें विद्यमान कुंडलिनीकी तीन प्रधान नाडियोंमेंसे चंद्रनाड़ी कार्यरत होती है । महिलाके मनोमयकोषमें सत्त्वकणोंकी वृद्धि होनेमें सहायता होती है । देवतासे प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें हाथोंकी उंगलियोंद्वारा महिलाके देहमें संचारित होती हैं । इससे उसके देहमें विद्यमान कुंडलिनीके चक्रोंमें से अनाहत चक्र कार्यरत होता है । फलस्वरूप महिलाके मनमें देवीके प्रति भाव जागृत होता है । इससे महिलाके स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंकी शुद्धि होनेमें सहायता मिलती है ।

 इस मुद्राके कारण पूजक महिला देवताके समक्ष अधिकाधिक विनम्र हो जाती हैं । महिलाकी चंद्रनाडी कार्यरत होनेसे उसका मन शांत होता है । देवीके प्रति भाव जितना अधिक होता है, उतने अधिक कालतक पूजाविधिसे प्राप्त सात्त्विकता बनी रहती है ।

 देवीको अर्पित की जानेवाली साडीपर अन्य सर्व सामग्री रखी जाती है । कुछ स्थानोंपर यह साडी छह गजकी होती है, तो कुछ स्थानोंपर नौ गजकी । पूजकमें देवताके प्रति भावके अनुसार वह देवीको किसी भी प्रकारकी साड़ी अर्पित करे, उसके भावके कारण उसे अपेक्षित लाभ होता ही है; परंतु प्रत्येक व्यक्तिमें देवताके प्रति भाव नहीं होता । इसलिए सामान्य जनोंके लिए प्रत्येक कृति शास्त्रके अनुसार करना अधिक लाभदायक है । देवीको अर्पित की जानेवाली साडी शास्त्रके अनुसार किस प्रकारकी होनी चाहिए, यह समझ लेना आवश्यक है ।

 देवीको नौ गजकी साडी अर्पण करना अधिक उचित होनेका अध्यात्मशास्त्रीय कारण मूल निर्गुण शक्ति अर्थात श्री दुर्गादेवीमें शक्तितत्त्वके सर्व नौ रूप समाए हुए हैं । `९’ का आंकड़ा श्री दुर्गादेवीके कार्य करनेवाले नौ प्रमुख रूपोंका प्रतिनिधित्व करता है । नौ गजकी साडीके नौ स्तर देवीके कार्य करनेवाले नौ रूप दर्शाते हैं । देवीको नौ गजकी साडी अर्पित करना अर्थात देवीको उनके नौ अंगोंसहित प्रकट होकर कार्य करनेके लिए आवाहन करना ।

 इस दृष्टीसे देवीको छह गजकी साडीकी अपेक्षा, नौ गजकी साडी अर्पित करना अधिक योग्य है । परंतु किसी कारणवश नौ गजकी साडी अर्पित करना संभव न हो, तो छह गजकी साडी अर्पित कर सकते हैं ।

देवीको नौ गजकी साडी अर्पित करनेके समानही विशिष्ट आकारका चोली-वस्त्र भी अर्पित करते है । देवीको त्रिकोणीय आकारमें चोली-वस्त्र अर्पित करनेका कारण त्रिकोण आकार ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश इनमेंसे ब्रह्माकी इच्छाशक्तिसे संबंधित है । ब्रह्मांडकी इच्छा-तरंगोंका भ्रमण दार्इ से बार्इ ओर त्रिकोण आकारमें होता है । देवीको चोली-वस्त्र अर्पण करते समय त्रिकोण आकार बनाकर अर्पित करनेका अर्थ है, अपनी आध्यात्मिक उन्नतिके लिए आदिशक्ति श्री दुर्गादेवीकी इच्छाशक्तिकी तरंगें प्रबल कर उनकी कृपा प्राप्त करना । यही कारण है कि, देवीको चोली-वस्त्र त्रिकोण आकारमें अर्पित करते हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवीपूजनसे संबंधित कृतियों का शास्त्र’