जीवन की प्रत्येक कृति का एकमात्र उद्देश्य – साधना

पूजा के लिए डलिया में रखे फूलों की रचना सात्त्विक पद्धति से करने पर उससे भक्तिभाव के स्पंदन निर्मित होते हैं और पूजा भावपूर्ण होती है । माथे पर तिलक लगाने से आचारधर्म का पालन होता है । सब्जी काटने जैसी छोटी सी कृति का भी कुछ शास्त्र है । उसे समझकर उचित ढंग से करने पर साधना होती है । कोई भी कलाकृति सात्त्विक बनाने से उससे स्वयं को और अन्यों को भी सात्त्विकता मिलती है । इस प्रकार प्रत्येक कृति साधना के रूप में होने हेतु परिपूर्ण, भावपूर्ण एवं सात्त्विकता का विचार कर कैसे करें, यह परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने साधकों को सिखाया है ।