अनुक्रमणिका
- १. स्तोत्रपाठ अथवा नामजप करना
- २. पूजास्थल की शुद्धि व उपकरणों की जागृति करना
- ३. रंगोली बनाना
- ४. शंखनाद करना
- ५. देवतापूजन के लिए आसन का प्रयोग करना स्तर के अनुसार प्रयुक्त आसन
- ६. आचमन करना
- ७. निर्माल्यविसर्जन
- ८. प्राणायाम, देशकाल उच्चारण, संकल्प व न्यास करें ।
- ९. कलश, शंख, घंटी व दीप की पूजा
- १०. पूजासामग्री व पूजास्थल की तथा अपनी शुद्धि
- ११. देवताओंकी मूर्ति एवं चित्रों की स्वच्छता
प्रस्तुत लेख में हम पूजा के पूर्व, पूजास्थल और उपकरणों की शुद्धि कैसे करें; देवी-देवता के तत्त्व से संबंधित रंगोली बनाना, पूजा हेतु बैठने के लिए आसनों के विविध प्रकार, भगवान पर चढाए गए पुष्प (निर्माल्य) उतारने की और देवी-देवताओं के चित्र और मूर्ति पोछने की योग्य पद्धति संबंधी जानकारी देखेंगे ।
१. स्तोत्रपाठ अथवा नामजप करना
पूजा की तैयारी करते समय स्तोत्रपाठ अथवा नामजप कभी भी कर सकते हैं । नामजप की तुलना में स्तोत्र में सगुण तत्त्व अधिक होता है; इसलिए स्तोत्र का उच्चारण ऊंचे स्वर में करें तथा नामजप मन में करें । नामजप मन ही मन में न हो, तो ऊंचे स्वर में करने में कोई आपत्ति नहीं ।
२. पूजास्थल की शुद्धि व उपकरणों की जागृति करना
अ. पूजास्थल की शुद्धि
१. पूजाघर में झाडू लगाएं । यथासंभव पूजा करनेवाला ही झाडू लगाए ।
२. झाडू लगाने के उपरांत कमरे को गोबर से लीपें । कमरे की भूमि मिट्टी की हो, तो उसे गोबर से लीपना संभव है । भूमि मिट्टी की न हो, तो उसे स्वच्छ जल से पोछें ।
३. कमरे में आम के या तुलसी के पत्तेसे गोमूत्र छिडकें । गोमूत्र उपलब्ध न हो, तो विभूति के जल का प्रयोग करें । तत्पश्चात् कमरे में धूप दिखाएं ।
आ. उपकरणों की जागृति
देवतापूजन के उपकरणों को भली-भांति स्वच्छ कर लें । उन पर तुलसीदल अथवा दूर्वा से जल का प्रोक्षण करें ।
३. रंगोली बनाना
अ. स्त्रियाेंको रंगोली बनानी चाहिए। अगर वे ऐसा करने में असमर्थ हैं, तो पुरुषों को रंगोली बनानी चाहिए।
आ. रंगोली ऐसी हो, जो मुख्य देवता का तत्त्व आकर्षित करे । उसी प्रकार किसी विशेष देवता की पूजा करते समय उस तत्त्व से संबंधित रंगोली बनाएं ।
इ. रंगोली बनाने के उपरांत उस पर हलदी-कुमकुम डालें ।
ई. रंगोली में देवता के तत्त्व हेतु पूरक रंगोें का प्रयोग करें, उदा. श्री गणपति की रंगोलीमें लाल रंग व हनुमान की रंगोलीमें सिंदूरी रंग का प्रयोग करें । (इसके लिए शीघ्र ही सात्त्विक रंगोली लेखमाला प्रस्तुत करेंगे !)
४. शंखनाद करना
अ. खडे होकर, गर्दन ऊर्ध्व दिशा की ओर (ऊपर) कर, एकाग्रता साध्य करने का प्रयत्न करें ।
आ. श्वास को छातीमें पूर्णतः भर लें ।
इ. तदुपरांत शंंखध्वनि आरंभ कर ध्वनि की तीव्रता बढाते जाएं व अंतमें तीव्र नाद करें । जहांतक संभव हो, शंख एक श्वासमें बजाएं ।
ई. शंखिणी का नाद न करें ।
५. देवतापूजन के लिए आसन का प्रयोग करना स्तर के अनुसार प्रयुक्त आसन
१. कम स्तर के (२० से ३० प्रतिशत स्तरके) पूजक, अर्थात् साधारण पूजक आसन के लिए पीढा लें । पीढा दो पट्टियों को जोडकर न बनाया गया हो, अर्थात् वह अखंड हो । पीढेमें लोहे की कीलें न हों । यथासंभव पीढे पर रंग न चढाया गया हो ।
२. मध्यम स्तर के (३० से ५० प्रतिशत स्तरके) पूजक रेशमी या तत्सम आसन का प्रयोग करें ।
३. उच्च स्तर के (५० प्रतिशत से अधिक स्तरके) पूजक कोई भी आसन का प्रयोग करें ।
आसन के नीचे रंगोली बनाएं । आसन के लिए कंबल, रेशमी वस्त्र इत्यादि लिया हो, तो उसके चारों ओर रंगोली बनाएं । तदुपरांत उस पर बैठने से पूर्व खडे होकर भूमि व देवतासे प्रार्थना करें, ‘आसन के स्थान पर आप का ही चैतन्यमय निवास रहे ।’
६. आचमन करना
अ. जल से भरा कलश, जलपात्र, आचमनी व जल छोडने के लिए ताम्रपात्र लें । कलश का थोडासा जल पात्र में डालें । तत्पश्चात् पात्र का जल आचमनी द्वारा बाएं हाथ से दाहिनी हथेली पर लेकर, ‘श्री केशवाय नमः ।’ कहकर उसे प्राशन करें । पुन: जल लेकर ‘श्री नारायणाय नमः ।’ कहकर उसे प्राशन करें । तदुपरांत पुन: एक बार जल लेकर ‘श्री माधवाय नमः ।’ कहकर प्राशन करें । अंत में हथेली पर जल लेकर ‘श्री गोिंवदाय नमः ।’ कहकर उसे ताम्रपात्र में छोडें ।
आ. आचमन करते समय जल पीने की ध्वनि न करें ।
७. निर्माल्यविसर्जन
अ. देवताओं पर चढाए गए निर्माल्य को उठाएं ।
आ. निर्माल्य हटाने के उपरांत उसे सूंघकर अपनी बांई ओर रखें ।
८. प्राणायाम, देशकाल उच्चारण, संकल्प व न्यास करें ।
९. कलश, शंख, घंटी व दीप की पूजा
शास्त्र में बताए अनुसार साधारणत: उपकरणों की पूजा करते समय उपकरणों पर गंध, अक्षत व फूल एकत्रित अर्पण करें । कुछ स्थानों पर उक्त घटकों के साथ ही तुलसीपत्र अर्पण करने की पद्धति है ।
अ. शंख की पूजा करते समय उसमें जल भरें । शंख को अक्षत अर्पण न करें ।
आ. घंटी को तुलसीपत्र अर्पण न करें ।
इ. कुछ स्थानों पर दीप को गंध, अक्षत व फूल अर्पण करने के उपरांत हलदी-कुमकुम अर्पण करने की भी पद्धति है ।
१०. पूजासामग्री व पूजास्थल की तथा अपनी शुद्धि
आचमनीमेें कलश व शंख का जल एकत्रित करें । तुलसीपत्रसे ‘पुंडरीकाक्षाय नमः ।’ का मंत्रोच्चारण कर वह जल पूजासामग्रीपर, आसपास तथा अपने शरीर पर छिडकें । अंत में वह तुलसीपत्र ताम्रपात्र में छोडें ।
देवताओं की मूर्तियों व चित्रों को स्वच्छ करना : यदि देवताओं की मूर्तियां धातु की हों, तो उन्हें नींबू, इमली और पानी से धोने के उपरांत वस्त्र से स्वच्छ पोेंछ लें । मिट्टी की मूर्ति हो, तो सूखे वस्त्र से धीरे-धीरे पोंछें । देवताओं के चित्र हों, तो उन्हें गीले वस्त्र से पोंछने के उपरांत सूखे वस्त्र से पोंछें । मूर्तियों व चित्रों को पोंछते समय देवता के (छाती के स्थान पर स्थित) अनाहतचक्र के बिंदु से आरंभ कर परिक्रमा-समान गोलाकार दिशा में बाहर की ओर पोंछते जाएं ।
११. देवताओंकी मूर्ति एवं चित्रों की स्वच्छता
आरती करते समय जिस प्रकार आरतीकी थाली देवताओंके अनाहतचक्रसे (छातीसे) ऊपर मस्तककी ओर, तदुपरान्त नीचे लाते हैं, उसी प्रकार प्रदक्षिणाकार मार्गसे देवताओंके चित्र एवं मूर्तियां अन्दरसे बाहरकी दिशामें पोंछें ।
मूर्ति और देवतापूजनके उपकरण जैसी सात्त्विक वस्तुओंकी मलिनता दूर करने हेतु यथा सम्भव रंगोली, इमली, नींबू, रीठा जैसे प्राकृतिक घटकोंका उपयोग करें; क्योंकि वे सत्त्वगुणी होते हैं ।’
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