अनुक्रमणिका
- १. त्याग के प्रकार एवं उनका ईश्वरप्राप्ति के संदर्भ में महत्त्व
- २.विविध विषयों की आसक्ति के कारण व्यक्ति के जीवन पर होनेवाला परिणाम
- ३. त्याग के प्रकार और त्याग करने से होनेवाले लाभ
- ४. तन-मन-धन का त्याग और सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी द्वारा साधक के अहं का लय होने लगता है । उसका संचित और प्रारब्ध संमाप्त होता है । उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सार्थक होता है ।
१. त्याग के प्रकार एवं उनका ईश्वरप्राप्ति के संदर्भ में महत्त्व
| त्याग के प्रकार | ईश्वरप्राप्ति के संदर्भ में महत्त्व (प्रतिशत) |
| १. तन | १० |
| २. मन | ३० |
| ३. धन | १५ |
| ४. सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी | ४० |
| ५. अन्य | ५ |
| कुल | १०० |
२.विविध विषयों की आसक्ति के कारण व्यक्ति के जीवन पर होनेवाला परिणाम
व्यक्ति शरीरद्वारा विविध सुखों का उपभोग करता है, उदा. रुचिकर पदार्थ खाना-पीना, मनोरंजन, सैर-सपाटा, संभोग इत्यादि । शरीरद्वारा होनेवाली कृति पुन: पुनः करने और उससे मिलनेवाला सुख पुनःपुन: भोगने से व्यक्ति के अंतर्मन पर उसका दृढ संस्कार होता है और उसके मन में इन सभी विषयों के प्रति आसक्ति निर्माण होती है । यह आसक्ति दिनोंदिन बढती जाती है । कालांतर में व्यक्ति को शरीर की मर्यादा ध्यान में आने लगती है । इसके साथ ही उसे कुछ रोग हो जाते हैं; परंतु तब भी उसकी सुख अनुभव करने की आसक्ति अल्प नहीं हाेती । ऐसी परिस्थिति में पहले की भांति सुख न मिलने से वह व्यक्ति दुःखी होता है ।

३. त्याग के प्रकार और त्याग करने से होनेवाले लाभ
३ अ. तन के त्याग से होनेवाले लाभ
३ अ १. विविध विषयों में लगाव कम होकर जीवन आनंददायक बनना : यदि साधक गुरु या अध्यात्मप्रसार की सेवा करता है तो मन में विभिन्न विषयों के माध्यम से सुख पाने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे कम होती जाती है । उसका ध्यान गुरु और गुरु की सेवा पर केंद्रित होता है । तत्पश्चात वह सेवा के लिए समर्पित हो जाता है । सेवा द्वारा साधक को ईश्वरीय शक्ति और कृपा प्राप्त होती है । इस कारण उसे ईश्वरीय आनंद अनुभव होता है । यह आनंद लगातार मिलने से साधक के मन में विभिन्न विषयों की आसक्ति कम हो जाती है ।
३ अ २. वृत्ति त्यागी बनना : शरीर से निरंतर गुरु की सेवा करने से साधक के मन में भोग भोगने की इच्छा कम हो जाती है और उसकी वृत्ति त्यागी हो जाती है । इससे वह विभिन्न विषयों से मिलनेवाले सुख और दुःख से परे आनंद का अनुभव करने लगता है ।
३ अ ३. शरीर में रज-तम का कम होना : साधक में ‘प्रारब्ध, अनिष्ट शक्तियों का कष्ट और बाहरी वातावरण’ के कारण रज-तम (अशुद्ध गुण) उत्पन्न होता है । साधक को सेवा के द्वारा ईश्वरीय शक्ति प्राप्त होती है । इससे उसके शरीर में रज-तमात्मक कणों के नष्ट होने की प्रक्रिया आरंभ होती है ।
३ अ ४. उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होना : जब साधक गुरु के लिए अपने शरीर का त्याग करता है तो गुरु सूक्ष्म रूप से उसके शरीर की देख-रेख करते हैं । कुछ साधकों को प्रारब्ध के कारण रोगों का सामना करना पडता है । उस कष्ट को सहने की शक्ति गुरु साधक को देते हैं, तथा कुछ साधकों को उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है ।
३ अ ५. देहबुद्धि कम होना : व्यक्ति का शरीर पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश, इन पंचतत्त्वों से बना होता है । गुरुसेवा के द्वारा साधक में रज-तम कम होता है और उसके शरीर में पृथ्वी तत्व की शुद्धि होती है । इससे साधक की देहबुद्धि कम होती है और उसे हल्कापन एवं उत्साह अनुभव होता है ।
३ अ ६. अहं कम होना : साधक विभिन्न विषयों में न फंसते हुए गुरुसेवा के लिए शरीर का त्याग करने पर ध्यान केंद्रित करता है । इससे साधक के स्वयं के सुख के विचार कम हो जाते हैं । परिणामस्वरूप उसका अहं कम होता है ।
३ अ ७. गुरुकृपा प्राप्त होना : लगातार गुरुसेवा या अध्यात्मप्रसार के लिए सेवा करते रहने से साधक पर गुरुकृपा होती है । गुरु की कृपादृष्टि सदैव उस पर रहती है । इस कारण साधक की साधना में आनेवाली बाधाएं धीरे-धीरे कम होती जाती हैं ।
३ अ ८. शरीर की शुद्धि होना : शरीर के त्याग से साधक के शरीर में ईश्वरीय तत्व की वृद्धि होती है । इससे साधक के शरीर की शुद्धि होने लगती है ।
३ अ ९. शरीर में देवत्व का निर्माण होना : जब साधक शरीर को भगवान के लिए अर्पित करता है तो साधक का प्रत्येक अंग भगवान की सेवा के लिए समर्पित हो जाता है । इससे भगवान प्रसन्न होते हैं । भगवान की कृपा से साधक के शरीर में देवत्व (ईश्वरीय गुण) का निर्माण होता है।
३ आ. मन के त्याग से होने वाले लाभ

३ आ १. ध्येय का स्मरण रहना :जब मन सतत ईश्वर को समर्पित रहता है तो साधक को यह स्मरण बना रहता है कि “मुझे साधना करके ईश्वरप्राप्ति करनी है”। इस प्रकार मन का लक्ष्य स्पष्ट रहता है जिससे साधक अपने ध्येय से विचलित नहीं होता ।
३ आ २. विविध विषयों से अलिप्त होना : गुरु अथवा ईश्वर का निरंतर स्मरण करने से साधक के मन की इच्छाएं और वासनायुक्त विचार घटते हैं । इससे उसका मन संसार के विभिन्न विषयों से मुक्त होकर स्थिर रहता है तथा सुख और दुःख में अटकता नहीं है ।
३ आ 3.प्रारब्धभोग न्यून होना : वर्तमान और पिछले जन्मों के कर्मदोषों के कारण अंतर्मन में कष्ट उत्पन्न होते हैं । जब साधक अपना मन भगवान को समर्पित करता है, तो कर्मदोषों की तीव्रता घटती है तथा उसे उन कष्टों को सहने की शक्ति भी मिलती है जिससे असहनीय प्रारब्ध भी सुसह्य हो जाता है ।
३ आ ४. नए कर्मदोषों की रचना न होना : मन जब भगवान के नाम पर केंद्रित होता है तो वह सात्त्विक हो जाता है और अनुचित कर्मों से बचता है । परिणामस्वरूप नए कर्मदोष उत्पन्न नहीं होते ।
३ आ ५. दुःख सहने की शक्ति प्राप्त होना : यदि प्रारब्ध की तीव्रता अधिक हो, तो व्यक्ति हताश हो सकता है । निरंतर भगवान का स्मरण करने से उसे ईश्वर का आधार मिलता है और दुःख सहन करने की शक्ति प्राप्त होती है, साथ ही सकारात्मक रूप से जीवन जीने की प्रेरणा भी मिलती है ।
३ आ ६. आध्यात्मिक कष्टों का निवारण : साधना के दौरान पिछले जन्मों के लेन-देन या वर्तमान जन्म की अनिष्ट शक्तियों से साधक को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पीडा का सामना करना पड सकता है । सतत नामजप (भगवान का स्मरण) से ये कष्ट कम होते हैं क्योंकि अनिष्ट शक्तियां चाहे जितनी प्रबल हों, भगवान सर्वशक्तिमान है ।
३ आ ७. मनोबल बढना : जब व्यक्ति अपना मन नामजप में लगा देता है तो उसकी ऊर्जा का व्यय कम होता है और परिणामस्वरूप उसका मनोबल बढता है ।
३ आ ८. मन की शुद्धि होना : नामजप के साथ स्वभावदोष तथा अहं के निर्मूलन का प्रयास और गुणों का संवर्धन आवश्यक है । इससे साधक का मन शुद्ध होता है, रज-तम घटता है तथा सत्त्वगुण में वृद्धि होती है जिससे साधना का आधार सुदृढ होता है और मन की शुद्धि होती है ।
३ आ ९. भाव का निर्माण और ईश्वरीय सहायता प्राप्त होना : जब साधक भगवान के अनुसंधान में रहता है तो भगवान के प्रति भाव धीरे-धीरे विकसित होते हैं । इससे उसे भक्तिमय विचार, सही व्यवहार और संकट से उबरने का ज्ञान प्राप्त होता है जिससे जीवन सरल बनता है ।
३ आ १०. मनोलय (मन का नष्ट होना) : भगवान के स्मरण और स्वभावदोष तथा अहं के निर्मूलन से साधक का मन अंततः ईश्वर से एकाकार हो जाता है । इससे उसे ईश्वर के विचार ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त होती है ।
३ आ ११. निर्विचार अवस्था प्राप्त होना : जब साधक मन को सतत ईश्वर को समर्पित कर देता है, तो धीरे-धीरे निर्विचार (विचार रहित) अवस्था प्राप्त होती है । इस अवस्था में मन के द्वारा उत्पन्न होनेवाली अनेक भावनाएं समाप्त हो जाती हैं और उसे दैवी जीवन की अनुभूति होती है । ऐसे साधक पर अच्छी और बुरी परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं होता और वह कर्मबंधन से परे पहुंच जाता है ।
३ आ १२. परम आनन्द और भगवान का वास अनुभव करना : ईश्वर का सतत स्मरण या निर्विचार अवस्था के कारण साधक किसी भी परिस्थिति में आनंदित रह सकता है तथा अपने हृदय में भगवान का वास और प्रेम अनुभव कर सकता है ।
३ इ. धन का त्याग करने से होनेवाले लाभ

३ इ १. ईश्वर सब भार ले लेते हैं : कलियुग में व्यक्ति अपने जीवन के लिए धन पर निर्भर होता है और धन की कमी से जीवन में अनेक कठिनाइयां आती हैं । जब साधक धन का पूर्ण त्याग कर अपने जीवन को गुरु के भरोसे छोड देता है, तब गुरु स्वयं साधक का सारा भार उठाते हैं और उसकी सर्वापरी देखभाल करते हैं ।
३ इ २. भोगी वृत्ति कम होकर जीवन संतोषजनक होना : धन के कारण मन में अनेक इच्छाएं और वासनाएं उत्पन्न होती हैं, जिससे मन भोगी वृत्ति का हो जाता है और अहंकार बढता है । जब साधक धीरे-धीरे धन का त्याग करता है, तो उस भोगी वृत्ति में कमी आती है, जिससे उसका जीवन अधिक संतोषजनक और शांत बनता है ।
३ इ ३. जीवन में आनेवाली बाधाएं कम होना : धन का त्याग करने पर गुरु की कृपादृष्टि साधक पर बनी रहती है । ऐसे साधक को वर्तमान और भावी आर्थिक बाधाएं नहीं आतीं या यदि आ भी जाती हैं तो गुरु उन्हें दूर करने का मार्ग दिखाते हैं, जिससे साधक स्थिर रह पाता है ।
३ इ ४. कुछ पूर्व जन्मों के लेन-देन का समाधान : व्यक्ति के कई जन्म होते हैं और कई बार वह जानबूझकर या अनजाने में पैसे ले चुका होता है या दे चुका होता है । ऐसे कई लेन-देन के हिसाब मनुष्य को मालूम नहीं रहते और ये उसके जीवन में बाधाएं उत्पन्न करते हैं । जब साधक गुरु को धन अर्पित करता है, तब कुछ लेन-देन के हिसाब निपटने में मदद मिलती है ।
३ इ ५. लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होना : जब साधक गुरु की कृपा पाने के लिए धन का त्याग करता है, तब उस साधक पर माता लक्ष्मी (सम्पत्ति और समृद्धि की देवी) की भी कृपादृष्टि बनी रहती है, जिससे साधक पर भगवान और माता लक्ष्मी दोनों की कृपा रहती है ।
३ ई. सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी से होनेवाले लाभ : जीवन को चलाने के लिए प्राण ही सर्वस्व माना जाता है । वह साधक जो अपने मन में कोई स्वार्थ, स्वयं के लिए सोच या संदेह नहीं रखता और गुरु या गुरुकार्य के लिए पूरे मन से अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार रहता है, उसका त्याग सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । ऐसे व्यक्ति का त्याग बहुत उच्च स्तर का होता है ।
ऐसे साधक परमात्मा और गुरु का लगातार ध्यान और संरक्षण अनुभव करता है । गुरु और ईश्वर दोनों उसकी ओर सूक्ष्म रूप से सचेत रहते हैं, उसकी सहायता करते हैं और उसकी आध्यात्मिक प्रगति बहुत तेज गति से होती है ।
४. तन-मन-धन का त्याग और सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी द्वारा साधक के अहं का लय होने लगता है । उसका संचित और प्रारब्ध संमाप्त होता है । उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सार्थक होता है ।
– श्री राम होनप (सूक्ष्म ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा। (ज्ञान प्राप्ति दिनांक, समय और अवधि : ७.९.२०२५, सुबह १०, १५ सेकंड)
दान और अर्पण का महत्त्व एवं उसमें भेद
त्याग : अर्पण का महत्त्व
सत् के लिए त्याग