सत् के लिए त्याग

६० प्रतिशत स्तरतक पहुंचनेपर खरे अर्थमें त्यागका आरंभ होता है । आध्यात्मिक उन्नति हेतु तन, मन एवं धन, सभीका त्याग करना पडता है । पदार्थविज्ञानकी दृष्टिसे धनका त्याग सबसे आसान है, क्योंकि हम अपना सारा धन दूसरोंको दे सकते हैं; परंतु अपना तन एवं मन इस प्रकार नहीं दे सकते । फिर भी व्यक्ति प्रथम उनका त्याग कर सकता है अर्थात तनसे शारीरिक सेवा एवं मनसे नामजप कर सकता है । आगे ७० प्रतिशत स्तर तक प्रगति होनेके पश्चात ही साधक धनका भी थोडाबहुत त्याग कर पाता है । सर्कसमें ऊंचे झूलेपर झूलती लडकी जबतक झूलेकी डंडी नहीं छोडती, तब तक दूसरे ऊंचे झूलेपर लटका कलाबाज उसे पकड नहीं सकता । उसी प्रकार जबतक साधक सर्वस्वका त्याग नहीं करता, ईश्वर उसे सहारा नहीं देते । 

त्यागका अर्थ वस्तु-त्याग नहीं, अपितु वस्तुके प्रति आसक्तिका त्याग है । आरंभमें शिष्यके पास जो
कुछ भी है, गुरु उसका त्याग करवाते हैं । अंतमें जब आसक्ति छूट जाती है, तो गुरु शिष्यको भरपूर देते हैं । 

शिवाजी महाराजमें राज्यके प्रति आसक्ति नहीं थी, इसीलिए समर्थ रामदासस्वामीजीने शिवाजी महाराजद्वारा अर्पण किया गया राज्य उन्हें लौटा दिया ।

 

दान (अर्पण)

दान सदैव ‘पात्रे दानम्’ अर्थात ‘सत्पात्रे दानम् (उचित व्यक्तिको दान)’ स्वरूपका होना आवश्यक है । इस संसारमें संतोंसे अधिक सुपात्र कोई नहीं है, इसलिए जो कुछ दान करना हो, उन्हें ही अर्पण करें । यह उपासनाकांडके नामधारक के लिए ही संभव है । कनिष्ठ कर्मयोगका अधिकारी ‘गरीबको अन्न देना, पाठशाला-रुग्णालयोंको चंदा देना’, ऐसे कृत्य भावनावश करता है । इससे केवल पुण्य मिलता है । मुमुक्षुको (मोक्षकी अभिलाषा रखनेवालेको) पाप-पुण्य दोनोंकी इच्छा नहीं रहती, क्योंकि पुण्यसे स्वर्गप्राप्ति होती है, मोक्षप्राप्ति नहीं ।

संत एवं गुरु अर्थात निर्गुण ईश्वरके सगुण (देहधारी) रूप । अतः संत अथवा गुरुको अर्पण करना
ईश्वरको ही अर्पण करनेके समान है । ईश्वरका दिया पुनः ईश्वरको ही अर्पण करनेसे लेन-देनका हिसाब निर्मित नहीं होता, वरन् वह पूर्ण हो जाता है । संक्षेपमें, संतोंको अर्पित करनेसे संचित अल्प हो जाता है, प्रारब्धभोग भोगनेकी क्षमता बढती है, लेन-देन उत्पन्न नहीं होता और न ही पुण्यप्राप्ति होती है । इसलिए जो भी देना हो, केवल संतोंका अथवा सत्कार्यके लिए ही अर्पित करें ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘गुरुकृपायोग’