त्याग : अर्पण का महत्त्व

हिन्दु धर्म ने त्याग ही मनुष्य जीवन का मुख्य सूत्र बताया है । तन, मन एवं धनमेंसे धन का त्याग करना ही इन सभी की तुलना में सबसे अधिक सहज कर सकते हैं । अर्पण का महत्त्व ध्यान में आने के पश्चात् अपना समर्पण का भावजागृत होकर किए गए अर्पण का अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है । उसके लिए अर्पण का महत्त्व स्पष्ट कर रहे हैं ।

अर्पण करने से होनेवाले लाभ

१. समष्टि पुण्य बढता है

वर्तमान में धरणीकंप, वादळ, बाढ, अकाल के समान अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपत्तियों की मात्रा बढ गई है । इसका मूल कारण अर्थात् समष्टिपाप में अधिक मात्रा में वृद्धि हुई है ! समष्टि पाप अल्प करने के लिए अथवा उसका परिणाम अल्प करने के लिए समाज में पुण्य की मात्रा अधिक करना अत्यंत आवश्यक है । समष्टि पुण्य बढाने के लिए समाज के लोगों को साधना करना आवश्यक है । साधना अर्थात् ईश्वर के लिए तन, मन, धन, बुद्धि तथा प्राण अर्पण करना । इसमें धन की तुलना में तन, मन, बुद्धि तथा प्राण अर्पण करना कठीन होता है; किंतु समाज के अधिकांश लोग यदि सत्कार्य हेतु धन का त्याग करेंगे, तो समाज का एकत्रित पुण्य, अर्थात् समष्टि पुण्य बढ जाएगा तथा समाज सुखी होने के लिए मदद होगी ।

२. समाज की ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढना चाहिऐ

ईश्वर के लिए किए गए किसी भी कृती का फल दस गुना अधिक मात्रा में प्राप्त होता है । इस नियमानुसार ईश्वर के लिए अर्पण किया, तो ईश्वर उसके दसगुना वापस देता है । इस संदर्भ की अनुभूतियां सनातन के अनेक साधकों ने अधिकांश समय प्राप्त की हैं । समाज के लोगों को भी इसी प्रकार की अनुभूति प्राप्त हो तथा उनकी ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढें; इसलिए समाज की ओर से त्याग होना आवश्यक है । समाज की श्रद्धा बढें; इसलिए ईश्वर भी बीच-बीच में स्वयं चमत्कार दिखाते हैं । यदि ईश्वर के इस कार्य में सम्मिलित हुएं, तो निश्चित ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है ।

३. समाज में त्याग की भावना निर्माण करना

संत साईबाबा भी घर-घर जाकर भिक्षा मांगा करते थे । उन्हें तो उसकी आवश्यकता भी नहीं थी । वे स्वयं ईश्वर का सगुण रूप थे । उन्होंने अनेक लोगों के दुःख दूर किए थे; अपितु वे स्वयं प्रत्येक घर में जाकर भीख क्यों मांगते थे ? इसके पीछे का मूल कारण यह है अर्थात् लोगों का कुछ अर्पण हो, भिक्षा दे, जिससे अर्पण देनेवाले को उसका लाभ प्राप्त हो । इस बात से यह ध्यान में आता है कि, ईश्वर कितना दयालु तथा करुणाकर है ! लोगों का भलाहो; इसलिए ईश्वर ही संतों के रूप में घर-घर जाकर लोगों के सामने हाथ फैलाता है । साईबाबा के जीवन का एक प्रसंग आगे प्रस्तुत किया गया है ।

‘साईबाबा एक घर में लगातार दो दिन भीख मांगने हेतु जाते हैं; किंतु यदि उन्हें भिक्षा नहीं दी जाती, तो तिसरे दिन भी वे जब उस घर के सामने भिक्षा मांगने जाते थे, तो उन्हें उनका एक भक्त पूछता था कि, ‘‘बाबा, इस घर के लोग आपको भिक्षा नहीं देते, तो लगातार आप वहां क्यों जाते हैं ?’’ इस पर बाबा उत्तर देते थे कि, ‘‘मैं मेरे लिए नहीं जाता, तो उनमें त्याग की भावना निर्माण हो;इसलिए जाता हूं !’’ त्याग में ही आनंद है । संतों को इस बात का पता रहता है;किंतु यह अनुभूति अन्य भी प्राप्त करें; इसलिए संत भी समाज में जाकर समाजको त्याग की संधी प्रदान करते हैं ।

४. आध्यात्मिक स्तर पर लाभ प्राप्त करने हेतु दान ‘सत्पात्र’ करना आवश्यक !

अर्पण, दान निरंतर ‘सत्पात्री’ करना चाहिए । दान का उचित विनियोग किया गया, तो यजमान को दान का अधिकतम ‘फल’ प्राप्त होता है । वर्तमान में दानस्वीकार करनेवाली ‘सत्पात्री’ व्यक्ति क्वचित ही पाई जाती है । जिन्हें दान देना असंभव रहेगा, उन्हें माह तक गुरुसेवा करनी चाहिए । जिन्हें संभव है, वे दिनमें न्यूनतम एक रुपया अर्पण करें । जिन्हें केवल धन का त्याग करना सहज है,वे एकत्रित धन एक ही बार अर्पण करें ।

सनातन संस्था ‘शास्त्रीय’ परिभाषा में धर्मशिक्षण देती है तथा धर्मजागृति’ का कार्य करती है । साथ ही अन्य अधिकांश आध्यात्मिक संस्थाएं भी अध्यात्मप्रसार का कार्य करती हैं । ये संस्था धन का विनियोग केवल ईश्वरीकार्य के लिए ही करती हैं । ऐसी संस्थाओं को अर्पण देना चाहिए । सर्वसाधक, वाचक, विज्ञापनदाता इत्यादियों को इस संधी का लाभ आध्यात्मिक स्तर पर होने के लिए सभी को प्रयास करने चाहिए ।