मृत्यु एक अपरिहार्य सत्य है । आज नहीं तो कल प्रत्येक जीव को उसके प्रारब्धकर्मानुसार वह आती ही है ! जीव की मृत्यु के समय मुख में नाम होना महत्त्वपूर्ण क्यों है, इस विषय का विवेचन इस लेख में किया है । इसके साथ ही मरणासन्न व्यक्ति के प्राण यदि नहीं निकल रहे हों, तो उसके हाथों नमक का दान करवाएं अथवा नमक-रोटी का उतारा दें, ऐेसा कहने के पीछे शास्त्र क्या है, यह भी इस लेख से ध्यान में आएगा । इससे जीवन में साधना का महत्त्व भी ध्यान में आएगा ।
१. मरते समय मुख में नाम होने का महत्त्व

‘जिस समय कोई जीव मरता है, तब उसकी देह में विद्यमान सूक्ष्म ऊर्जा सूक्ष्म वायुओं के रूप में उसकी देह में कार्यरत होती है । इन वायुओं के आधार पर उसे अगली गति मिलती है ।
१ अ. नामसाधना न करनेवाला
अ. नामसाधना न करनेवाले जीव को कोई भी आंतरिक ऊर्जा (नामजप से निर्माण हुई सूक्ष्म ऊर्जा) अथवा बाह्यात्मक ऊर्जा (गुरु अथवा देवता का आशीर्वादात्मक बल) न मिलने से ऐसे जीव अनेकानेक वर्षों तक एक ही योनी में अपनी आशा-आकांक्षाओं को लेकर भटकते रहते हैं ।
आ. इस लिंगदेह को किसी का भी संरक्षण न होने से उनके अनिष्ट शक्तियों के नियंत्रण में जाने की और वर्षोंतक उनके नीचे काम करने की संभावना होती है । ऐसी लिंगदेह को अगली गति मिलने के लिए श्राद्धकर्म से बाह्यात्मक बल की आपूर्ति आवश्यक होती है ।
१ आ. मरते समय मुख में नाम होना
मरते समय जीव के मुख में नाम होगा, तो उसकी देह में सात्त्विक ऊर्जा का प्रवाह संक्रमित होते रहने से वे भूलोक, भुवलोक (टिप्पणी १) अथवा अन्य स्थानों पर न भटकते हुए शीघ्र अपने कर्मोंनुसार अगली गति को प्राप्त होते हैं ।’
– श्री गुरुतत्त्व (श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळ के माध्यम से, १६.३.२००५, दोपहर १२.३६)
टिप्पणी १ – भुवलोक : ‘भूलोक’ अर्थात पृथ्वी । भूलोक एवं स्वर्गलोक के बीच ‘भुवलोक’ है ।
२. मरणासन्न व्यक्ति के संदर्भ में की जानेवाली कृति
२ अ. व्यक्ति के प्राणोत्क्रमण होने का समय समीप आने की बात ध्यान में आते ही परिवारवालों द्वारा की जानेवाली कृ्तियां
२ अ १. व्यक्ति को शुद्ध की हुई भूमि पर दक्षिण की ओर सिर कर लिटाएं : उस व्यक्ति को भूमि पर जिस स्थान पर रखेंगे, वहां उसे ठीक से रख पाएं और आसपास थोडी जगह शेष रह जाए, इतने आकार की भूमि को गाय के गोबर से लीप लें । वह यदि संभव न हो, तो भूमि पर गोमय (गाय का गोबर) अथवा यज्ञ की विभूती का पानी छिडकें । यदि फर्श पर टाईल्स लगे हों, तो वह स्थान गोमूत्रमिश्रित पानी से (अथवा गोमूत्र-अर्कमिश्रित पानी से) पोछ लें । तदुपरांत उस भूमि पर काले तिल डालकर उन पर दर्भ (उपलब्ध हो तो) दक्षिण की ओर अग्र कर फैला दें । उस पर चटाई, कंबल, रग अथवा लोई (ऊन की मोटी धोती) बिछा दें । उस पर व्यक्ति का सिर दक्षिण की ओर करके सुलाएं ।
२ अ २. संभव हो तो व्यक्ति के मुख में गंगाजल डालें !
२ अ ३. व्यक्ति के चारों ओर भगवान दत्तात्रेय की सात्त्विक नामजप-पट्टियाें का मंडल डालें ! : व्यक्ति के मस्तक एवं पैरों के पंजों के पास ‘श्री गुरुदेव दत्त’ के नामजप की एक-एक पट्टी और शरीर के बाईं और दाईं ओर २ – २ नामजप-पट्टियां रखें । ये नामजप-पट्टियां बिछाई गई चटाई के बाहर अथवा चटाई के नीचे सुविधानुसार रखें ।

३. मरणासन्न व्यक्ति के प्राण यदि न निकल रहे हों, तो क्या करें ?
इहलोक में (पृथ्वीपर) जीवनयापन के समय कुछ लोगों की व्यावहारिक इच्छाएं अतृप्त रह जाती हैं, इसके साथ ही उन्होंने अपने जीवन में साधना भी नहीं की होती है । इसलिए ऐसे व्यक्ति रज-तमप्रधान बन जाते हैं । सूक्ष्म जगत की अनिष्ट शक्तियों को ऐसे व्यक्तियों की मृत्यु के पश्चात उनकी लिंगदेहों को अपने नियंत्रण में लेना और उन्हें अपना दास (गुलाम) बनाना आसान हो जाता है । इसलिए ऐसे व्यक्ति की मृत्यु के समय उनकी लिंगदेह पर नियंत्रण पाना और उनसे बुरे कर्म करवाने के लिए अनिष्ट शक्तियों की एकदूसरे से स्पर्धा होती है । यदि व्यक्ति साधना करनेवाला हुआ, तो कई बार उसकी साधना का फल खींचने के लिए अनिष्ट शक्तियां प्रयत्न करती हैं । अनिष्ट शक्तियों की एक-दूसरे से स्पर्धा करने के परिणामस्वरूप मरणासन्न व्यक्ति के प्राण सहजता से नहीं निकलते और देह में अटके रहने से मरणासन्न व्यक्ति को भरपूर यातना होती है । उस व्यक्ति को इससे छुटकारा दिलाने के लिए की जानेवाली उपाययोजना आगे दी गई हैं ।
३ अ. मरणासन्न व्यक्ति के लिए नमक-रोटी अथवा नमक-मांस का टुकडा (पकाया हुआ) का उतारा देना
३ आ. ‘उतारा देना’ का अर्थ क्या है ? : ‘कुछ वस्तु अनिष्ट शक्तियों को अर्पण कर उस माध्यम से अनिष्ट शक्तियों की इच्छाओं को तृप्त करना’, इस प्रक्रिया को ‘उतारा देना’ कहते हैं ।
३ इ. नमक-राेटी / भाकरी (ज्वार अथवा बाजरे इत्यादि की रोटी) का अथवा नमक-मांस के पकाए गए टुकडे का उतारा देने के पीछे अध्यात्मशास्त्र : ‘नमक से प्रक्षेपित होनेवाली रज-तमात्मक लहरियोंयुक्त सूक्ष्म वायु अनिष्ट शक्तियों को ग्रहण करना तुरंत ही संभव होता है । इसका कारण है यह वायु अत्यंत हलकी होने से वह उतारे के आसपास विद्यमान वायुकोष से अनिष्ट शक्तियों को ग्रहण करना आसना हो जाता है । इसके लिए मरणासन्न व्यक्ति के लिए नमक-रोटी/भाकरी का अथवा नमक-पके हुए मांस के टुकडे का उतारा देने से मर्यादित काल तक उस व्यक्ति पर अनिष्ट शक्तियों की पकड ढीली हो जाती है और उस व्यक्ति के प्राण देह की कक्षा से सुलभता से निकल जाते हैं ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २१.३.२००५, रात्रि ९.५५ एवं २५.१२.२००६, रात्रि ९.५५)
३ ई. मरणासन्न व्यक्ति को प्रार्थना करने के लिए कहना : मरणासन्न व्यक्ति प्रार्थना करने की स्थिति में हो तो उसे उपास्यदेवता अथवा भगवान दत्तात्रेय से आगे दी गई प्रार्थना करने के लिए कहें ।
‘हे भगवन, मृत्यु के समय होनेवाली वेदना सहन करने के लिए मुझे बल दें । आपकी कृपा से मेरी मृत्यु सुलभ हो । मुझे नामजप का सतत स्मरण रहे । आपकी कृपा से मुझे सद्गति मिले ।’
मरणासन्न व्यक्ति प्रार्थना करने की स्थिति में न हो तो उसके कान में अन्य व्यक्ति ऊपर दी गई प्रार्थना करे ।
३ उ. परिवारवालों का प्रार्थना करना : परिवारवालों को भी मरणासन्न व्यक्ति के लिए उसका नाम लेकर ऊपर दिए समान प्रार्थना करें ।
३ ऊ. मरणासन्न व्यक्ति एवं परिवार को नामजप करना : मरणासन्न व्यक्ति नामजप करने की स्थिति में हो तो उसे उपास्यदेवता का अथवा दत्तात्रेय का नामजप करने के लिए कहें । परिवारवालों के लिए भी संभव हो तो मरणासन्न व्यक्ति के लिए यह नामजप करें ।
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