श्राद्धविधियोंको अनुचित ठहरानेवाले आधुनिक पुरोगामी व्यक्तियोंद्वारा आलोचना तथा उसका खंडन

धर्महानिको रोकने हेतु हिंदुओंको बौद्धिक सामर्थ्य प्राप्त हो, इसी उद्देश्यसे इस ग्रंथमें ; अनुचित विचार एवं आलोचना के खंडन संबंधी विषयका विस्तृत विवेचन किया हैं ।

‘व्रत’संबंधी आलोचनाएं अथवा अनुचित विचार और उनका खंडन

धर्महानिको रोकने हेतु हिंदुओंको बौद्धिक बल प्राप्त होनेके लिए, व्रतोंके संबंधमें अनुचित धारणा और आलोचनाओंका खंडन दे रहे हैं ।

‘विवाहसंस्कार’से संबंधित आलोचना अथवा अनुचित विचार एवं उनका खंडन

धर्मकी हानिको रोककर हिंदुओंको बौद्धिक सामर्थ्य प्राप्त हो इस हेतु ‘विवाहसंस्कार’से संबंधित अनुचित विचार एवं उनका खंडन कर रहे हैं ।

केलेके पत्तेपर भोजन परोसनेकी पद्धति

रंगोलीके माध्यमसे भूमितरंगों एवं शक्तितरंगोंका भोजनकी थालीके नीचे आच्छादन बन जानेसे भोजनके घटक पदार्थ भी इन तरंगोंसे पूरित हो जाते हैं । भोजनके माध्यमसे देहमें इन तरंगोंका संचार होकर पाचनप्रक्रियाको गति प्राप्त होकर देहमें इन तरंगोंका घनीकरण होता है ।

भोजन करनेका स्थान एवं बैठनेकी दिशा

अन्न-सेवन एक यज्ञकर्म ही है । यह यज्ञकर्म, पूर्व दिशामें तेजकी शक्तिरूपी धारणाद्वारा पिंडमें संचारित करनेसे उसका कृत्यको गति प्रदान करनेमें उचित पद्धतिसे विनियोग हो सकता है ।

भोजनपूर्व आचार एवं कुछ सूत्र

‘कर्ता-करावनहार ईश्वर ही हैं । उनके बिना मैं कुछ नहीं कर सकता । उनकी कृपासे ही यह अन्न मिला है। अतः जो भी मिला है, उसे सर्वप्रथम ईश्वरको प्रथम अर्पित करूंगा’, इस कृतज्ञ भावसे देवताको भोजनपूर्व नैवेद्य चढाया जाता है ।

भोजनका समय एवं उनका महत्त्व

उचित समयपर भोजन न करनेसे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य असंतुलित हो सकता है । परिणामस्वरूप आध्यात्मिक स्वास्थ्यपर भी इसका दुष्परिणाम होता है ।

भोजनका महत्त्व एवं भोजनसंबंधी कुछ नियम

‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।’ अर्थात साधनाके लिए शरीर आवश्यक है । शरीर हेतु अन्न आवश्यक है । अन्नसे प्राप्त शक्तिका उपयोग केवल आत्मोन्नतिके लिए नहीं, अपितु समाजकी उन्नतिके लिए भी किया जा सकता है ।