भोजनके संदर्भमें सर्वसाधारण सूत्र

सारिणी


१. भोजन

अन्न उष्ण (गरम) हो । उससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है । ऐसे अन्नका पाचन शीघ्र होता है । उससे वायुका अनुलोमन (‘वात’ नामक दोषका योग्य दिशामें वहन होना) होता है एवं कफक्षय होता है । अन्न अति उष्ण भी न हो । ‘एक बार ठंडे हुए अन्नपदार्थ पुनः उष्ण कर (तपाकर) न खाएं’, यह आयुर्वेदका नियम है । अन्न स्निग्ध हो । इससे उसका स्वाद अच्छा होता है । उससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है । स्निग्ध अन्नका पाचन शीघ्र होकर वह वातका अनुलोमन करता है, उचित मात्रामें लेनेसे शरीरकी पुष्टि होती है, धातु दृढ होकर बलवृद्धि होती है । भोजनमें मीठे, खट्टे, खारे, तीखे, कडवे एवं कसैले स्वादोंसे युक्त अन्नपदार्थ हों । थालीमें अधिक अन्न परोसकर रखा हो, तो भोजन आरंभ करनेसे पूर्व ही उसे दूसरी थालीमें निकालकर रखें । भोजन अपने हाथोंसे लेना पडे, तो थालीमें जितना आवश्यक उतना ही अन्न लें । सर्व पदार्थ परोसे जानेतक भोजन आरंभ न करें । पंगतमें सभी एक ही समयपर भोजन आरंभ करें ।

२. भोजनके समय किए जानेवाले आचार एवं कुछ सूत्र

भोजनके समयके आचार दाहिने हाथसे भोजन करें । छोटे बच्चोंको भी दाहिने हाथसे भोजन करनेका अभ्यास कराएं । अन्नका ग्रास लेते समय पांचों उंगलियोंका प्रयोग करें । यथासंभव कांटे-चम्मचसे न खाएं । दाल-चावल एवं उसपर घी, इनसे भोजन आरंभ करें । भोजनके आरंभमें भारी, स्निग्ध, मीठे, शीत एवं गाढे पदार्थ सेवन करें । भोजनके बीचमें खट्टे एवं खारे पदार्थ तथा भोजनके अंतमें तीखे एवं कडवे पदार्थ सेवन करें । भोजन करते समय प्रत्येक ग्रास अनेक बार (३२ बार) चबाएं । भोजन करते हुए मध्यमें अल्प जल पीएं । जलपात्रको (गिलासको) मुख लगाकर जल पीएं; ऊपरसे न पीएं । बाएं हाथमें जलपात्र लेकर दाहिना हाथ उलटा कर जलपात्रके निचले भागको आधार देकर जल पीएं । उच्छिष्ट (जूठे) हाथसे जल न पीएं । ग्रीवा उठाकर जल न पीएं । जल पीते समय ‘गट् ऽ गट् ऽ’, ऐसी ध्वनि न करें ।

३. भोजन करते समय यह करें !

यथासंभव पवित्रता (शुचिता, सुमंगलता) एवं स्पर्श-अस्पर्शकी परंपराओंका पालन करें । यथासंभव सर्व अन्नपदार्थोंको मिलाकर सेवन करनेकी अपेक्षा रुचि अनुसार पदार्थोंका स्वाद लेकर अन्नका सेवन करें ।

४. भोजन करते समय यह न करें !

भोजन करते समय (अथवा देवालयमें जाते समय) चर्मकी (चमडेकी) वस्तुएं अपने साथ न रखें । भोजन करते समय बाएं हाथपर भार देकर न बैठें । भोजन करते समय अन्नका स्पर्श हथेलीको न होने दें । भोजन शीघ्रतासे न करें । ऐसा करनेसे अन्नपाचन ठीकसे नहीं होता तथा अन्नका स्वाद भी समझमें नहीं आता । धीमी गतिसे भी भोजन न करें । मध्यम गतिसे भोजन करें । भोजन करते समय, जल पीते समय एवं आचमन करते समय मुखसे ध्वनि (आवाज) न करें। भोजन करते समय किसी भी प्रकारका तनाव न हो । प्रसन्नचित्त होकर भोजन करें । भोजन करते समय परस्पर बातें न करें तथा अनावश्यक चर्चा, विवाद आदि टालें ।

४अ. भोजन करते समय चल दूरभाषपर (‘मोबाईल’पर) बात न करें । भोजन करते समय कुछ न पढें । दूरदर्शनके (टीवीके) कार्यक्रम देखते हुए अथवा मायासे संबंधित चर्चा करते हुए भोजन न करें । भोजनकी निंदा करते हुए भोजन न करें । अन्न प्राणस्वरूप है, उसे सम्मानपूर्वक ग्रहण करनेसे ही बल एवं तेजसमें वृद्धि होती है । भोजनकी थालीमें उंगलीसे न लिखें । भोजन करते समय मध्यमें उठकर न जाएं । भोजन करते समय एक-दूसरेको स्पर्श न करें । भोजन करते समय अपनी थालीका अन्न दूसरेको न दें । एक ही थालीमें दो व्यक्ति एक साथ अन्न-सेवन न करें । भोजन करते समय दूसरेकी थालीमें न देखें; अपनी थालीपर ही ध्यान दें । अन्नमें केश हो, तो वह अन्न न खाएं । लेटकर, टूटे-फुटे पात्रोंमें अथवा भूमिपर अन्न लेकर न खाएं । उच्छिष्ट हाथ लेकर न बैठें एवं न ही शयन करें । भोजनके उपरांत थालीमें हाथ न धोएं । पंगतमें सभीका भोजन पूर्ण हुए बिना न उठें । सभीका भोजन हुए बिना पंगतसे उठनेपर प्रायश्चित करें । खडे रहकर अथवा चलते-फिरते भोजन न करें । भोजन कर रहे व्यक्तिको नमस्कार न करें ।

५. पालथी लगाकर भोजनके लिए बैठनेसे भोजनकी
सात्त्विकता जीवकी संपूर्ण देहमें सहजतासे ग्रहण होना

‘भोजन करते समय पुरुष सुखासनमें (पालथी लगाकर) बैठें । सुखासनमें बैठनेसे जीवकी देहमें विद्यमान सूक्ष्म-वायु एवं उनके प्रवाह सुचारू रूपसे कार्यरत होते हैं । साथ ही जीवकी देहमें विद्यमान त्रिगुण भी कुछ मात्रामें स्थिर होते हैं । अतः जीवद्वारा भोजनसे ग्रहण की गई सात्त्विकता उसकी देहमें सहजतासे ग्रहण होती है तथा स्थूल एवं प्राणदेहों को आवश्यक मात्रामें ऊर्जाकी आपूर्ति होती है ।’ – श्री गुरुतत्त्व (श्रीमती अंजली गाडगीळके माध्यमसे, २०.६.२००७, दोपहर ३.३५)

६. पालथी लगाकर भोजन हेतु बैठनेपर अन्नपाचनमें सहायता होना

‘पालथी लगाकर भोजन हेतु बैठनेसे अन्नका पाचन व्यवस्थित होता है । पालथीकी विशिष्ट स्थितिके कारण पेटमें अन्न भली-भांति मिश्रित होता है । इस स्थितिमें आगे झुककर भोजन करना पडता है । इस कारण, पेटकी स्नायुओंका (मांस पेशियोंका) बारंबार आकुंचन एवं प्रसरण होता है । इससे पाचन हेतु आवश्यक रक्तकी आपूर्ति बढ जाती है । उसी प्रकार, अन्न ग्रहण करते समय उत्पन्न होनेवाला वात (गैस) बाहर निकलनेमें सहायता होती है ।

७. स्त्रियोंको भोजन करते समय दायां घुटना पेटसे (शरीरसे) सटाकर क्यों बैठना चाहिए ?

दायां घुटना पेटसे सटाकर बैठनेकी स्थिति मणिपुरचक्र (नाभिस्थान) कार्यरत होनेमें सहायता मिलती है । इस स्थितिके कारण जीवके रजोगुणी विचारोंकी गति भी नियंत्रित रहती है तथा भोजनकी क्रिया किसी भी प्रकारके कष्टदायक स्पंदनोंकी उत्पत्तिसे मुक्त रहती है । इसलिए पूर्वकालकी स्त्रियां अपनी रजोगुणी कार्यकारी शक्तिपर नियंत्रण रखनेके लिए पूजा करते समय अथवा भोजनके लिए बैठते समय दायां घुटना पेटसे सटाकर बैठा करती थीं ।

(संदर्भ : सनातनका ग्रंथ – भोजनसे संबंधित आचार)

भोजन करते समय पालन करनेयोग्य आचारों से
संबंधित नियमों का प.पू. पांडे महाराज द्वारा किया गया मार्गदर्शन

१. भोजन के पहले चित्राहुति (अन्न का वह भाग जो भोजन के पहले निकालकर रखा जाता है) क्यों देते है ?

अन्न से मन बनता है । मन में संकल्प और विकल्प आते हैं और उसके अनुसार हम कर्म करते हैं । कर्म से अच्छे बुरे कृत्य होते हैं । बुरे कर्म और चूकें करने से पाप लगता है । पाप से दुःख होता है । मृत्यु के पश्‍चात हमें यमयातना भोगनी पडती है । ये यमयातनाएं भोगनी न पडे यह भी चित्राहुति का एक उद्देश्य है । हमारे कर्मों की फलश्रुति चित्रगुप्त संकलित करते हैं, जिसे मृत्यु के पश्‍चात वह यम को बताते हैं । जिसके अनुसार यम उसे योग्य न्याय देकर दंड देते हैं । इन यमयातनाआें से मुक्ति पाने और उसका सदैव स्मरण रखने हेतु भोजन (अन्न) ग्रहण करने के पूर्व चित्राहुति दी जाती है ।

२. अन्न ग्रहण करते समय मौन पालन का शास्त्र

भोजन करते समय बातें नहीं करनी चाहिए, ऐसा शास्त्र में लिखा है । भोजन करते समय बातें करने सेे मन बहिर्मुख होता है जिससे हम पर रज-तम का प्रभाव बढता है; इसलिए मौन रहना चाहिए । अन्न ग्रहण करते समय ईश्‍वर का नाम लेना चाहिए जिससे अन्न में चैतन्य निर्माण होता है । परिणामस्वरूप शक्ति और चैतन्य ग्रहण होकर हवन होता है जिससे मन सात्त्विक बनता है तथा सकारात्मक विचार आते हैं और हमसे अच्छे कर्म होते हैं । अन्न ग्रहण करते समय ईश्‍वर के अनुसंधान में रहने से चैतन्यशक्ति का प्रभाव बढता है जिससे मन में विकल्प नहीं आते ।

– प.पू. परशराम पांडे, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (जून २०१६)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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