कुदृष्टि लगने का अर्थ क्या है ?
‘कुदृष्टि लगना, इस प्रकारमें जिस जीव को कुदृष्टि लगी हो, उसके सर्व ओर रज-तमात्मक इच्छाधारी स्पंदनों का वातावरण बनाया जाता है ।
‘कुदृष्टि लगना, इस प्रकारमें जिस जीव को कुदृष्टि लगी हो, उसके सर्व ओर रज-तमात्मक इच्छाधारी स्पंदनों का वातावरण बनाया जाता है ।
हमारी हिन्दू संस्कति में मातृ-पितृ पूजन का बडा महत्त्व है । पिछली दो पीढियों का भी स्मरण रखें । पितृवर्ग जिस लोक में रहते हैं, उसे पितरों का विश्व अथवा पितृलोक कहते हैं ।
अनेक बार हमें लगने लगता है कि अकस्मात वातावरण में दबाव बढ गया है । अनेक बार हमारे चारों ओर नकारात्मक स्पंदन घूम रहे हैं, इसका बोध होने लगता है, साथ ही श्वास लेने में कुछ रुकावट आ रही है, ऐसा भी लगता है ।
साधकों की साधना खंडित हो, इसलिए अनिष्ट शक्तियां हर प्रकारसे प्रयत्न कर रही हैं । इसलिए साधकों की रक्षा होने हेतु प.पू. गुरुदेव समय-समय पर सनातन प्रभात नियतकालिकों के माध्यम से विविध आध्यात्मिक उपचार बताते हैं ।
अनेक साधकों को प्रातः जागने पर विविध प्रकार के कष्ट होते हैं । इस प्रकार के कष्टों से पीडित साधक तथा अन्य साधक भी जब रात में सोने से पूर्व मानस रूप से नामजप की पेटी बनाकर उसमें सोए, तब यह ध्यान में आया कि उन्हें होनेवाले विविध प्रकार के कष्ट घट गए हैं ।
बार-बार बीमार होने अथवा चोट लगने के कारण साधना में बाधाएं आना, आध्यात्मिक कष्ट होना अथवा सेवा करते समय सेवासंबंधी उपकरण, वाहन इत्यादि बंद पडना अथवा अन्य बाधाएं आना आदि पर यह यंत्र उपयुक्त है ।
१. मानस सर्व देहशुद्धि का अभिप्रेत अर्थ यहां सर्व देहशुद्धि, अर्थात स्थूलदेहसहित मनोदेह (मन), कारणदेह (बुद्धि) और महाकारणदेह (अहं) इन सूक्ष्मदेहों की शुद्धि । २. मानस सर्व देहशुद्धि का अध्यात्मशास्त्रीय आधार २ अ. संतों के संकल्प से लाभ ! यह मानस सर्व देहशुद्धि साधना-पद्धति सनातन के छठे संत पू. राजेंद्र शिंदेजी ने बताई है । … Read more
सनातन संस्थाके आस्थाकेन्द्र प.पू. भक्तराज महाराजजीको उनके सर्व भक्त बाबा कहते थे । श्री अनंतानंद साईश, प.पू. बाबाके गुरु थे । भजन, भ्रमण एवं भण्डारा; यही बाबाका जीवन था । लाखों कि.मी. भ्रमण कर उन्होंने अनेक लोगोंमें अध्यात्मके प्रति रूचि उत्पन्न की । प.पू. बाबाने १७.११.१९९५ को इन्दौरमें देहत्याग किया ।
कलियुगमें अधिकांश लोग साधना नहीं करते, अत: वे मायामें फंसे रहते हैं । इसलिए मृत्युके उपरांत ऐसे लोगोंकी लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसी अतृप्त लिंगदेह मर्त्यलोक (मृत्युलोक)में फंस जाती है । मृत्युलोकमें फंसे पूर्वजोंको दत्तात्रेयके नामजपसे गति मिलती है