आयुर्वेद का महत्त्व !

‘पूर्वकाल में आयुर्वेद के कारण भी संसार में सर्वत्र भारत का नाम था । आगामी तृतीय विश्वयुद्ध के काल में औषधियां तथा डॉक्टर उपलब्ध नहीं होंगे । उस समय भारत को छोडकर अन्य देशों के नागरिकों के सामने ‘रोगग्रस्त रहना अथवा मरना’, इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा । इसके विपरीत भारत में औषधीय वनस्पति … Read more

बुद्धिप्रमाणवादी एवं कुंडलिनी शक्ति !

साधना करने पर कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है । अभी तक के युगों में लाखों साधकों ने यह अनुभव किया है; परंतु साधना पर विश्वास न रखनेवाले बुद्धिप्रमाणवादी साधना किए बिना ही कहते हैं, ‘कुंडलिनी दिखाओ, नहीं तो वह है ही नहीं !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

बुद्धिमान कौन है ?

‘धन प्राप्त करने के लिए भारतीय अमेरिका जाते हैं, जबकि ईश्वरप्राप्ति के लिए पूरे विश्व से लोग भारत में आते हैं ! इनमें से बुद्धिमान कौन है, यह आप ही निश्चित करें ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

सिद्धांतहीन राजनीतिक दल !

‘सिद्धान्तहीन राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करते हैं ; जबकि साधक केवल ईश्वर को ही प्रसन्न करने के लिए कठोर प्रयास करने को तैयार रहते हैं !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

चुनाव बने बच्चों के खेल !

‘चुनाव के विषय में प्रतिदिन आनेवाले समाचार देखकर लगता है, ‘ अब चुनाव बच्चों के खेल बन गए हैं !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

अधोगामी बुद्धिप्रमाणवादी !

‘बुद्धिप्रमाणवादी आधुनिकतावादी नहीं; अधोगामी होते हैं । इसलिए वे अधोगति को प्राप्त करते हैं ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

मानव श्रेष्ठ या प्राणी एवं वनस्पति ?

‘मानव के अतिरिक्त अन्य कोई प्राणी अथवा वनस्पति छुट्टी नहीं लेता । ईश्वर भी एक भी सेकंड की छुट्टी नहीं लेते । मानव मात्र शनिवार एवं रविवार छुट्टी लेता है । इतना ही नहीं वर्ष में भी कुछ दिन अधिकारपूर्वक छुट्टी लेता है । ऐसे में इस विषय में मानव श्रेष्ठ है या प्राणी एवं … Read more

सनातन के आश्रमों की अद्वितीयता !

‘समाज में, कार्यालय में तथा अन्यत्र अहंकार, झूठ बोलना भ्रष्टाचार इत्यादि का अनुकरण किया जाता है; जबकि सनातन के आश्रमों में सद्गुणों का अनुकरण किया जाता है !’ – (परात्पर गुरु ) डॉ. आठवले

आंतरिक ‘मेक-अप’ का महत्त्व !

‘बाहर का शृंगार (मेक-अप) अन्यों को आकर्षित करता है । इसके विपरीत भीतरी शृंगार (मेक-अप) अर्थात स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन ईश्वर को आकर्षित करता है ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

अति सयाने बुद्धिजीवी !

साधना कर सूक्ष्म स्तरीय ज्ञान होने पर यज्ञ का महत्त्व समझ में आता है । वह न समझने के कारण ही अति सयाने बुद्धिजीवी कहते हैं, ‘यज्ञ में वस्तुएं जलाने के स्थान पर उन्हें गरीबों में बाटें ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले