बुद्धिप्रमाणवादियों की सीमा !

‘बुद्धिप्रमाणवादियों को अहंकार होता है, ‘मानव ने नए-नए यंत्र खोजे ।’ उन्हें यह समझ में नहीं आता कि ईश्वर ने जीवाणु, पशु-पक्षी, ७०-८० वर्ष चलनेवाला एक यंत्र अर्थात मानव शरीर जैसी अरबों वस्तुएं बनाई हैं । उनमें से एक भी वस्तु क्या वैज्ञानिक बना पाए हैं ?’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

संस्कृत को अंग्रेजी के समान महत्व क्यों नहीं मिलता ?

‘भारत की पाठशाला में तामसिक अंग्रेजी भाषा सिखाई जाती है; परंतु सात्त्विक संस्कृत भाषा नहीं सिखाई जाती । यह स्वाभाविक ही है; क्योंकि स्वतंत्रता से लेकर अभी तक भारत पर राज्य करनेवाले सभी तामसिक राजनीतिक दलों को तामसिक अंग्रेजी अपनी लगती है !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

हास्यास्पद बुद्धिप्रमाणवादी !

‘जैसे प्राथमिक कक्षा में पढनेवाला बच्चा स्नातकोत्तर अथवा डॉक्टरेट कर चुके व्यक्ति से विवाद करेगा, वैसे बुद्धिप्रमाणवादी अध्यात्म के अधिकारी व्यक्ति से विवाद करते हैं !’ – परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

‘साम्यवाद’ शब्द का कुछ अर्थ है क्या ?

‘शरीर की बनावट, स्वभाव के गुण-दोष, कला, बुद्धि, धन इत्यादी घटकोंं में ७५० करोड़ में से २ व्यक्तियों में भी समानता नहीं है । ऐसे में ‘साम्यवाद’ शब्द का कुछ अर्थ है क्या ?’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

आश्‍चर्य

‘पैसा अर्जित करने की अपेक्षा उसका त्याग करना अधिक सुलभ है, तब भी मानव नहीं करता, यह आश्‍चर्य है !’ – परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

हिन्दुओं अब तो जाग जाओ और इतिहास से शिक्षा लो !

‘कुछ भी अनुचित होने पर हिन्दू प्रत्येक बार ’हमसे कहां न्यूनता रही’, इसका विचार न कर, अंग्रेजी शिक्षाप्रणाली इत्यादि को दोष देते हैं । अंग्रेजों के आने से पहले मुसलमानों ने भी भारत पर राज्य किया । ‘इसके लिए अंग्रेज नहीं, अपितु हिन्दुओं की अनुचित विचारधारा ही कारणीभूत है !’, यह वे ध्यान में नहीं … Read more

सनातन संस्था का अनोखापन !

‘वर्तमान में समाज में प्रत्येक व्यक्ति मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए विविध पदवियां एवं धन अर्जित करता है। इसके विपरीत सनातन संस्था में प्रत्येक व्यक्ति किसी भी व्यावहारिक फल की अपेक्षा न रख; तन, मन एवं धन का अधिकाधिक त्याग करता है ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

सनातन प्रभात और अन्य नियतकालिकों में भेद

अन्य नियतकालिकों में बच्चों के जन्मदिन के उपलक्ष्य में छायाचित्र छापने हेतु विज्ञापन के पैसे देते हैं, जबकि ‘सनातन प्रभात’ में गुणवान बच्चों के छायाचित्रों के साथ उनकी आध्यात्मिक गुणविशेषताएं भी छापते हैं ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

साम्यवाद की समानता

‘गरीबी होना अथवा न होना, इसके पीछे ‘प्रारब्ध’ ऐसा कुछ कारण है’, यह न जाननेवाले साम्यवाद की डींगे हांकते है और जो गरीब हैं अथवा नहीं है, उनमें समानता लाने का प्रयत्न करते हैं !’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

हास्यास्पद पश्चिमी शिक्षणप्रणाली !

‘पश्चिमी शिक्षण किसी भी समस्या के मूल कारण तक, उदा. प्रारब्ध, अनिष्ट शक्ति, कालमहात्म्य तक नहीं जाता । क्षयरोग होने पर क्षयरोग के कीटाणु मारने की औषधि न देकर केवल खांसी की औषधि देने जैसा उनका उपाय है !’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले