भोजन बनाने के लिए एल्युमिनियम अथवा हिंडालियम के बरतनों का उपयोग न करें !

१. मिट्टीका, तांबा एवं पीतल इत्यादि धातुका महत्त्व

‘रसोईके लिए प्रयोगमें लाई जानेवाली मिट्टी, तांबा एवं पीतल जैसी धातुएं उच्चतम होनेके कारण वे वातावरणसे दैवी घटक ग्रहण करती हैं । इससे ईश्‍वरीय नादकी निर्मिति होती है तथा वातावरण एवं वास्तु शुद्ध रखनेमें सहायता मिलती है ।

 

२. शरीर के लिए हानिकारक एल्युमिनियम

पहले भारत में मिट्टी अथवा पीतल के कलई किए हुए बरतनों में भोजन बनाने की परंपरा थी । स्व. राजीव दीक्षित बार-बार बताते थे कि अंग्रेजों ने भारतीय कैदी शीघ्र मरें, इसलिए कारागृह में एल्युमिनियम के बरतनों का उपयोग प्रारंभ किया था । आज ये बरतन प्रत्येक के घर में पहुंच गए हैं । एल्युमिनियम अथवा हिंडालियम (एल्युमिनियम से बनी एक मिश्रधातु) से बने बरतन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं । इसके कारण आगे दिए अनुसार हैं ।

अ. अन्नद्वारा धातुआें का अंश शरीर में जाकर विविध रोग होना

एल्युमिनियम के बरतन पर यदि स्टील की साधारण चम्मच भी रगडी जाए तो भी इस धातु के कण बाहर निकलते हैं । इन बरतनों में बना हुआ अन्न खाने पर धातुआें का अंश भोजन के माध्यम से शरीर में जाता है । प्रतिदिन अन्न के माध्यम से साधारणतः ५ मिलिग्राम तक एल्युमिनियम सेवन किया जाता है ।

आ. अम्लीय पदार्थों के कारण बरतन के आयन्स अन्न में शीघ्र घुलना

नीम्बू, टमाटर जैसे अम्लीय पदार्थ इन बरतनों में पकाने पर इन बरतनों के आयन्स (विद्युतभारित कण) अन्न में शीघ्र घुलते हैं । ऐसा अन्न शरीर के लिए हानिकारक होता है ।

इ. शरीर में एकत्रित हुआ एल्युमिनियम धीमा विष (स्लो पॉयजन) बनना

मनुष्य के शरीर में ऐसी धातुआें को बाहर निकालने की क्षमता मर्यादित होती है । इस क्षमता से अधिक धातु शरीर में जाने पर वे मांसपेशी, मूत्रपिंड, यकृत (लिवर), हड्डियां आदि स्थानों पर धीरे-धीरे एकत्रित होने लगती है । एल्युमिनियम धातु मस्तिष्क की पेशियों पर भी हानिकारक परिणाम करती है । इस प्रकार शरीर में एकत्रित हुआ एल्युमिनियम स्लो पॉयजन अर्थात धीमा विष बनता है ।

ई. एल्युमिनियम के बरतनों में पका हुआ भोजन खाने से होनेवाले रोग

निराशा, चिंता, स्मृतिलोप, हड्डियों से संबंधित रोग (ऑस्टीओपोेरोसिस), नेत्रों के विकार, मूत्रपिंडों की क्षमता घटना, अतिसार, अतिआम्लता (हाइपरएसिडटी), अपचन, पेट में वेदना, आंतों में सूजन आना (कोलायटिस), बार-बार छाले होना, इसब जैसे (एक्जिमा जैसे) त्वचारोग होते हैं ।

उ. एल्युमिनियम धातु मस्तिष्क की पेशियों पर हानिकारक परिणाम करती है ।

 

३. एल्युमिनियम और हिंडालियम के विकल्प

अ. मिट्टी के बरतन सर्वोत्तम विकल्प हैं । बाजार में ये बरतन न मिलने पर स्थानीय कुम्हार से ये बरतन बनवा लेने चाहिए । भोजन बनाने के लिए मिट्टी के बरतनों का उपयोग करने से शरीर के लिए आवश्यक खनिज भोजन के माध्यम से मिलते हैं । मिट्टी के बरतनों में बने हुए भोजन का स्वाद जो एक बार चख लेगा, वह पुनः कभी अन्य बरतनों का विचार भी नहीं करेगा ।

आ. मिट्टी के बरतनों का उपयोग संभव न हो, तो तांबे-पीतल के कलई किए हुए बरतनों का उपयोग करें । इन बरतनों का उपयोग खट्टे पदार्थों के लिए न करें ।

इ. स्टेनलेस स्टील के बरतनों का उपयोग, यह सरल उपाय है । अभी तक स्टेनलेस स्टील के दुष्परिणाम सामने नहीं आए हैं ।

 

४. स्वास्थ्य के संदर्भ में अनदेखी न करें !

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । अर्थात निरोगी शरीर साधना करने के लिए प्रथम साधन है, ऐसा शास्त्रवचन है । ईश्‍वर द्वारा दिए गए इस शरीर का मूल्य पैसों में करना संभव नहीं है । जिनके घर में एल्युमिनियम के बरतन एक साथ परिवर्तित करना संभव न हो, वे चरण दर चरण बरतन परिवर्तित कर सकते हैं । नए-नए भ्रमणभाष संच, अनावश्यक सौंदर्यप्रसाधन, शरीर के लिए हानिकारक कपडों-बरतनों के साबुन, टूथपेस्ट, नूडल्स, कुरकुरे जैसे पदार्थ जिनमें पोषक पदार्थ नहीं है, बिना काम का और सिरदर्द बढानेवाला दूरदर्शन संच (टीवी), डिश एंटीना आदि पर होनेवाला अनावश्यक व्यय बंद कर इन्हीं पैसों से स्वास्थ्य के लिए आवश्यक ऐसे मिट्टी के बरतन अथवा वैकल्पिक बरतन क्रय कर निरोगी रहना क्या सहज संभव नहीं है ?

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, गोवा. (२३.१.२०१५)

 

५. सत्त्व-रजप्रधान तांबा

अ. ‘जल रखने हेतु तांबेके बर्तनोंका ही उपयोग करें; क्योंकि जल सर्वसमावेशक स्तरपर कार्य करता है । इसलिए तांबेका सत्त्व-रजोगुण जलमें संक्रमित होता है । तांबेके बर्तनमें रखा जल सत्त्व-रजोगुणी बननेके कारण वह अल्प कालावधिमें ब्रह्मांडसे देवताके स्पंदन आकर्षित कर स्वयंमें घनीभूत करता है ।

आ. ऐसे जलका उपयोग अन्न पकाने अथवा पीने हेतु करनेसे देहमें विद्यमान दैवीगुण जागृत होते हैं ।

इ. अन्नसेवन करते समय इस जलकी सहायता लेनेसे देहकी रिक्तियां भी सत्त्वगुणसे आवेशित होती हैं । इससे देहको अन्न पचानेकी प्रक्रियामें अधिकाधिक आध्यात्मिक स्तरपर लाभ होता है तथा देहकी वास्तविक शुद्धि होती है । अन्नसेवन करते समय की जानेवाली प्रार्थनासे सत्त्वगुणके स्पंदन कार्यरत होकर जीवको अन्नसेवनसे आध्यात्मिक स्तरपर (चैतन्यकी सहायतासे) अपेक्षित लाभ प्राप्त
करवाते हैं । यह क्रिया देहकी रज-तमात्मक तरंगोंके विघटनके लिए भी उत्तरदायी होती है । अतः अन्नसेवनकी संपूर्ण प्रक्रिया एक यज्ञकर्म ही बन जाती है ।

 

६. रजोगुणवर्धक पीतल

पीतल रजोगुणवर्धक है; इसलिए पीतलके बर्तनमें अन्न पकाना स्वास्थ्यके लिए लाभदायक होता है । पीतलकी रजोगुणात्मक तरंगोंके वहनके स्पर्शसे (वहनके कारण) अन्नमें विद्यमान रसरिक्तियां भी कार्यरत अवस्थामें पोषक द्रव्य उत्सर्जित करने हेतु सिद्ध होती हैं । यह रजोगुणी प्रक्रिया अन्नके माध्यमसे देहमें संचारित होनेके कारण वह देहकी रिक्तियोंको भी अन्नमें विद्यमान सूक्ष्म-वायु ग्रहण करने हेतु संवेदनशील बनाती है । इस प्रकार अन्नपाचन प्रक्रिया भी सरल एवं सहज बनाई जाती है ।
इसलिए पूर्वकालमें रसोईघरमें तथा पूजाके उपकरणोंमें भी तांबे-पीतलके बर्तनोंका सर्वाधिक समावेश दिखाई देता था ।

 

७. रज-तमप्रधान स्टील

स्टीलमें कुछ मात्रामें लोहे जैसी अशुद्ध धातु होनेके कारण इस प्रकारके बर्तनमें पकाया अन्न देहमें रज-तमका संक्रमण करता है । स्टील धातु रज-तमप्रधान है । इसलिए अन्न पकाने हेतु इसके प्रयोगसे देहको अन्नके पोषक घटकोंका लाभ नहीं, हानि ही होती है तथा देहकी प्रतिकारशक्ति घट जाती है । इससे देहपर वायुमंडलसे विविध रोगोंके आक्रमण होते हैं एवं ऐसे अन्नके कारण अनिष्ट शक्तियोंको देहमें हस्तक्षेप करनेके लिए अवसर मिल जाता है ।

 

८. तमप्रधान मिश्रधातुके बर्तन

अन्य अनेक पद्धतियोंसे बर्तन बनाते समय उपयोगमें लाई जानेवाली अन्य मिश्रधातुएं तमोगुणी होनेके कारण वे भी अन्न पकानेकी प्रक्रियामें अन्नमें तमोगुणका संवर्धन करती हैं तथा जीवके स्वास्थ्यपर विपरीत प्रभाव डालकर उसकी आयु घटाती हैं ।’

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘ रसोई-सामग्रीकी सात्त्विकताका विचार’