पितृपक्ष (महालय पक्ष)

व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत उसकी आत्मा को सद्गति मिले, इसलिए श्राद्ध करना – यह हिन्दू धर्म का वैशिष्टय है । प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष को महालय श्राद्ध किया जाता है । श्राद्ध करने का महत्त्व, पद्धति, श्राद्धपक्ष में शुभकार्य करना निषिद्ध क्यों है, इसका कारण इस लेख के माध्यम से जानेंं ।

१. पक्ष

भाद्रपद मास का कृष्णपक्ष

पितृपक्ष (महालय पक्ष) चलचित्र

 

२. पितृपक्ष में श्राद्ध करने का महत्त्व

पितरों के लिए श्राद्ध न करने पर उनकी अतृप्त इच्छाओं के रहने से परिवारवालों को कष्ट हो सकता है। श्राद्ध से पितरों का रक्षण होता है, उनको आगे की गति मिलती है और अपना जीवन भी सहज होता है । पितृपक्ष में पितरों का महालय श्राद्ध करने से वे वर्षभर तृप्त रहते हैं ।

 

३. पितृपक्ष में श्राद्ध क्यों करें ?

अ. `पितृपक्ष में वातावरण में तिर्यक तरंगों की (रज-तमात्मक तरंगों की) तथा यमतरंगों की अधिकता होती है । इसलिए पितृपक्ष में श्राद्ध करने से रज-तमात्मक कोषों से संबंधित पितरों के लिए पृथ्वी की वातावरण-कक्षा में आना सरल होता है । इसलिए हिन्दू धर्म में बताए गए विधि कर्म उस विशिष्ट काल में करना अधिक श्रेयस्कर है ।’

– एक विद्वान श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, १२.८.२००५, सायं. ६.०२

आ. हिन्दू धर्मशास्त्र कहता है कि पितृपक्ष, व्रत है । इसकी अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से आमावस्या तक रहती है । इस काल में प्रतिदिन महालय श्राद्ध करना चाहिए ।

इ. पितृपक्ष में पितर यमलोक से धरती पर अपने वंशजों के घर रहने आते हैं । इस काल में एक दिन श्राद्ध करने पर, पितर वर्षभर तृप्त रहते हैं ।

ई. पितृपक्ष में अपने सब पितरों के लिए श्राद्ध करने से उनकी वासना, इच्छा शांत होती है और आगे जाने के लिए ऊर्जा मिलती है ।

– श्रीमती मेघना वाघमारे

 

४. श्राद्ध करने की पद्धति

अ. भाद्रपद प्रतिपदा से अमावस तक प्रतिदिन महालयश्राद्ध करना चाहिए, ऐसा शास्त्रवचन है । यदि यह संभव न हो, तो जिस तिथि पर अपने पिता का देहांत हुआ हो, उस दिन इस पक्ष में सर्व पितरों को उद्देशित कर महालयश्राद्ध करने का परिपाठ है । यह श्राद्ध पितृत्रयी – पिता, पितामह (दादा), प्रपितामह (परदादा); मातृत्रयी – माता, पितामही, प्रपितामही; सापत्नमाता, मातामह (नाना), मातृपितामह, मातृप्रपितामह, मातामही (नानी), मातृपितामही, मातृप्रपितामही, पत्नी, पुत्र, कन्या, पितृव्य (चाचा), मातुल (मामा), बंधु, बूआ, मौसी, बहन, पितृव्यपुत्र, जंवाई, बहनका बेटा, ससुर-सास, आचार्य, उपाध्याय, गुरु, मित्र, शिष्य इन सबके प्रीत्यर्थ करना होता है । जो कोई जीवित हैं, उन्हें छोडकर अन्य सभी का नाम लेकर इसे करते हैं ।

आ. देवताओं की जगह धूरिलोचन संज्ञक विश्वेदेव को लें ।

इ. संभव हो, तो भगवान के लिए दो, चार पार्वण (मातृत्रयी, पितृत्रयी, मातामहत्रयी एवं मातामहीत्रयी) हेतु प्रत्येक के लिए तीन एवं पत्नी इत्यादि एकोद्दिष्ट गण हेतु, प्रत्येक के लिए एक ब्राह्मण बुलाएं । इतना संभव न हो, तो देवता के लिए एक, चार पार्वणों के लिए चार और सर्व एकोद्दिष्ट गण के लिए एक, ऐसे पांच ब्राह्मण बुलाएं ।

ई. योग्य तिथि पर महालयश्राद्ध करना संभव न हो, तो ‘यावद्वृश्चिकदर्शनम्’ अर्थात सूर्य के वृश्चिक राशि में जाने तक किसी भी योग्य तिथि पर करें ।’

उ. पितृपक्ष की विविध तिथियों पर विशिष्ट व्यक्तियों के लिए आवश्यक श्राद्ध आगे दी गई सारणी अनुसार हैं ।

तिथि श्राद्ध का नाम किसके लिए ? विधिविशेष
१. चतुर्थी अथवा पंचमी (भरणी नक्षत्र के समय) भरणी मृत व्यक्ति (टिप्पणी १)
२. नवमी अविधवा नवमी मृत सौभाग्यवती स्त्री श्राद्ध के स्थान पर सौभाग्यवती को भोजन परोसते हैं
३. त्रयोदशी बालभोलनी तेरस (सौराष्ट्रीय नाम) छोटे बालक काकबलि
४. चतुर्दशी घातचतुर्दशी दुर्घटना में मृत, शस्त्र से मारे गए

टिप्पणी १ – पितृपक्ष के भरणी नक्षत्र के दिन श्राद्ध करने से गया जाकर श्राद्ध करने पर प्राप्त होनेवाला फल मिलता है । शास्त्रानुसार भरणी श्राद्ध वर्षश्राद्ध के उपरांत करें  । वर्षश्राद्ध से पूर्व सपिंडीकरण किया जाता है । तत्पश्चात भरणी श्राद्ध करने से मृत व्यक्ति की आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्ति मिलने में सहायता होती है । यह श्राद्ध प्रत्येक पितृपक्ष में करें । कालानुरूप प्रचलित पद्धतिनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बारहवें दिन ही ‘सपिंडीकरण’ किया जाता है । अतः कुछ शास्त्रकारों के मत में व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत उस वर्ष आनेवाले पितृपक्ष में ही भरणी श्राद्ध किया जा सकता है ।

 

५. पितृपक्ष में दत्तात्रेय देवता (दत्त) का नामजप करने का महत्त्व

दत्त के नामजप से पूर्वजों को गति मिलने में व उनके कष्टों से रक्षा होने में सहायता मिलती है । अतएव पितृपक्ष में प्रतिदिन दत्त का न्यूनतम ७२ माला (६ घंटे) नामजप करें ।

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