भाव एवं भाव के प्रकार

 

 भाव कैसे पहचानते हैं ?

‘साधक का ईश्वर के प्रति रहनेवाला भाव अधिक होने के कारण तथा वह व्यक्ति में भी अधिक मात्रा में व्यक्त होने के कारण ईश्वर के स्मरण से आंसू आते हैं । उसे मिलने के लिए वह व्याकुल होता है । निरंतर उसे ईश्वर का अस्तित्व प्रतीत होता है । सूक्ष्म-सुगंध, सूक्ष्म-दर्शनं, सूक्ष्म-नाद इत्यादि कीअनुभूतियां आती हैं; किंतु ये अनुभूतियां कुछ पल तक ही सीमित रहती हैं ।अतः साधकों का भाव निरंतर के लिए नहीं रहता । साधक अपने जीवन के अनेक प्रसंगों में भावना के स्तर पर रहकर ही निर्णय अपनाता है तथा उसी के अनुसार कृती करता है ।’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से,१२.१२.२००४, प्रातः  ८.४५)

 

व्यष्टी साधना के लिए साक्षीभाव एवं समष्टि साधना के लिए शरणागत भाव आवश्यक

‘साधक की आध्यात्मिक उन्नति के पश्चात् उसका माया के प्रति होनेवाला आकर्षण अल्प होता है तथा अन्यों की ओर से की जानेवाली अपेक्षा की मात्रा भी अल्प हो जाती हैं । अतः ऐसे साधक में साक्षीभाव निर्माण होता है तथा वह प्रत्येक घटना की ओर तटस्थता से देखने के लिए सीखता है । व्यष्टि साधनाकी दृष्टि से साक्षीभाव होना अत्यंत उचित है; किंतु समष्टि के हित लिए आवश्यक सेवा करते समय साक्षीभाव से देखना समष्टि साधना की दृष्टि से साधक के लिए उचित नहीं है । उसके लिए साक्षीभाव से भी आगे बढकर उसने अपना कर्तव्य निरपेक्षता से पूरा करना ईश्वर को अपेक्षित है । (इसे ज्ञानोत्तरकार्य कहते हैं ।)  समष्टि हेतु सेवा करते समय समाज तथा अनिष्ट शक्ति कीओर से अधिक मात्रा में विरोध होने का संभव रहता है । उसके लिए साधक ने ईश्वर को पूरीतरह से शरण जाकर समष्टि सेवा करनी चाहिए । शरणागत भावके कारण अत्यंत कठीन कार्य भी साधक सहजता से पूरा कर सकता है;क्योंकि शरणागत भाव का पालन करनेवाले साधक के माध्यम से साक्षात् ईश्वरही कार्य करता है । किंतु उसके लिए साधक में माया से अलिप्त प्रथम साक्षीभाव आना आवश्यक है तथा तत्पश्चात् समष्टि साधना परिणामकारक करने के लिए शरणागत भाव आना आवश्यक है ।’– ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, २२.११.२००५, प्रातः ११.१५ से११.२०)

 

आध्यात्मिक उन्नति के स्तर तथा व्यक्त एवं अव्यक्त भाव

‘व्यक्त भाव अर्थात् ईश्वर के साथ द्वैत एवं अव्यक्त भाव अर्थात् ईश्वर केसाथ अद्वैत । साधक को धीरे-धीरे अव्यक्त भाव की ओर जाना है ।

१. प्राथमिक स्तर के साधक का भाव जागृत होने के पश्चात् उसे अनुभूति आती है ।

२. अगले स्तर पर जब साधक का भाव निरंतर रूप से जागृत होना आरंभ होता है, तो साधक का भाव कभी नामजप द्वारा व्यक्त होता है, तो कभी आंखों के सामने दिखाई देनेवाले प्रकाश से व्यक्त होता है ।

३. उसके आगे के स्तर में यही भाव श्वास द्वारा व्यक्त होने लगता है । उस समय साधक का ध्यान श्वास की ओर रहता है ।

४. आगे-आगे साधक व्यक्त भाव से अव्यक्त भाव की ओर जाने लगता है ।उस समय उसका भाव ना नाम से ना श्वास से, किसी से भी व्यक्त नहीं होता तथा उसे आनेवाली अनुभूतियों की मात्रा भी धीरे-धीरे घटती जाती हैं ।’

– श्री गुरुतत्त्व (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, ५.१२.२००३, दोपहर१२.३३)

 

व्यक्त भाव के लक्षणं इस प्रकार हैं

भाव व्यक्त होने के ८ लक्षणं हैं । उन्हें `अष्टसात्त्विक भाव’ ऐसे कहा जाता है । उनके लक्षणं इस प्रकार हैं ।

१. स्तंभ (स्तंभित होना)

२. स्वेद (पसीना आना )

३. रोमांच

४. वैस्वर्य (स्वरभंग)

५. कंप

६. वैवर्ण्य (वर्ण परिवर्तन होना )

७. अश्रुपात

८. प्रलय-चेष्टा निरोध (मूच्र्छा आना)

अधिकांश साधकों को देवता की आरती के समय अथवा गुरु / ईश्वर कास्मरण होने से अथवा उनके संदर्भ में अन्य किसी भी कारण से आंखों से पानी आता है । यह भाव के उपर्युक्त दिए गए आठ लक्षणों मेंसे ‘अश्रुपात’ यह लक्षण है । जिस समय आठ भी लक्षण दिखाई देने लगते हैं, उस समय ‘अष्टसात्त्विक भाव’ जागृत हुआ, ऐसे कहा जाता है ।

व्यक्त भाव निर्माण होने के लिए इस प्रकार के कुछ प्रयास कर सकते हैं

१. पूजापाठ, आरती, धार्मिक विधी, नमस्कार के समान धर्माचरण की कृतियां

२. प्रार्थना : प्रार्थना में भक्तों की असमर्थता व्यक्त होती है तथा वह ईश्वर को कर्तापन देता है ।

३. कृतज्ञता : प्रार्थना का दूसरा अर्थ शरणागति तथा शरणागति प्रक्रिया कृतज्ञता व्यक्त करने से ही पूरी होती है; अतः प्रत्येक कृती के पश्चात् कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए ।

४. नामजप : निरंतर ईश्वर के अनुसंधान में रहने का सहज मार्ग अर्थात् उसके नाम का अखंड जप करना ।

५. बीच-बीच में ईश्वर के साथ संभाषण करना  : दैनंदिन जीवन में अनेक प्रसंग, घटनाएं घटती हैं । उनके कारण हमारे मन में आनेवाले विचार, प्रतिक्रियाएं, समस्या इत्यादि ईश्वर को बतानी चाहिए । ‘त्वमेव माता पितात्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव’, ऐसा भाव रखते हुए प्रत्येक बात ईश्वर को बताने से ईश्वर के प्रति प्रेम तथा भाव बढ जाता है ।

 

अव्यक्त (अप्रकट) भाव

व्याख्या

‘हमारे भीतर भाव जागृत रहता है; किंतु वह किसी भी भावना, विचार अथवा कृतीद्वारा व्यक्त नहीं होता । अपने अंतर्मन में उसका अस्तित्व रहता है । ऐसा भाव अर्थात् अव्यक्त भाव ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यमसे, १९.३.२००५, दोपहर १२.३०) तथा ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यमसे २५.७.२००५, सायंकाल ६ से ६.०४)

अव्यक्त भाव निर्माण होने के लिए कुछ आवश्यक घटक

१. गुरुकार्य के प्रति आत्यंतिक लगन होनी चाहिए : ‘प्रत्यक्ष गुरु के देह की सेवा सगुण की सेवा है, तो उनके समष्टि कार्य की सेवा (धर्मसेवा) निर्गुण की सेवा है । साधक में निर्गुण की सेवा के प्रति रहनेवाली लगन से अव्यक्त भावनिर्माण होता है ।

२. प्रत्येक कर्म परिपूर्ण करने का प्रयास करना : ‘योगः कर्मसु कौशलम् ।’,अर्थात् ‘कर्म कौशल्य से, अर्थात् परिपूर्ण करना, यह योग ही (साधना ही) है ।’केवल सेवा ही नहीं, तो प्रत्येक कर्म परिपूर्ण करने का प्रयास किया कि,अव्यक्त भाव शीघ्र गति से निर्माण होता है ।

३.‘दिसेल ते कर्तव्य’ इस वचन के अनुसार सामने आया कर्म अपेक्षा विरहित भाव से अच्छा होने के प्रयास करने से अव्यक्त भाव निर्माण होता है ।

४. अंतर्मन से साधना के प्रयास करना  : साधना करते समय प्रत्येक कृती द्वारामन, बुद्धि तथा अहं का त्याग अनजाने में होना, अर्थात् साधना अंतर्मन तक पहुंचाना ।

संदर्भ : सनातन – निर्मित ‘भाव के प्रकार तथा जागृति’

 

भक्तों को व्यावहारिक रूप से आचरण करते समय रखने के पृथक भाव

१. समभाव

अ. अपने आयु के व्यक्ति के साथ भाई तथा बहन के समान आचरण करना ।
आ. आयु से बडी व्यक्ति के साथ उनके पुत्र समान आचरण करना ।
इ. छोटे बालकों के साथ छोटे बालक के समान आचरण करना ।

२ . आत्मीयता भाव

सभी के प्रति आत्मीयता भाव रखना चाहिए, अर्थात् सभी पर स्वयं के समानप्रेम करना ।

३ . देवताभाव

अपनी पंसद की देवता को सभी में देखना तथा सभी के साथ आदर से आचरणकरना ।

४ . ईश्वरी भाव

भक्त को सभी प्राणिमात्र में तथा वस्तु में भी ईश्वर की अनुभूति आती है ।अतः वह उसी के अनुसार आचरण करता है ।

– (पू.) डॉ. वसंत बाळाजी आठवले (वर्ष १९९०)

 

श्रीकृष्णभक्ति की व्यष्टि उपासना के प्रथम चरण में
प्रवेश करने पर समष्टि भाव, तडप आदि गुणों के कारण
समष्टि सेवा का दायित्व सहजता से निभानेवाली गोपीभाव की साधिका !

गोपियों के समान निरंतर भक्तिरत रहना, साधना का अंतिम चरण नहीं है । यह केवल व्यष्टि साधना का एक चरण साध्य करने समान है । वर्तमान में, व्यष्टि साधना का महत्व ३० प्रतिशत है, तो समष्टि साधना का महत्व ७० प्रतिशत । इसलिए, धर्मप्रचार करने के लिए समाज को धर्मशिक्षा देकर धर्मपालन करने के लिए कहना तथा साधना की ओर मोडना’ आदि जैसी समष्टि साधना करनी चाहिए ।

सनातन संस्था की गोपीभाववाली साधिकाएं भी अब समष्टि साधना करने लगी हैं । अवस्था में छोटी, विशेष शिक्षित न होने पर भी तथा समष्टि का अनुभव न होने पर भी, श्रीकृष्ण की कृपा से वे अच्छी साधना करने लगी हैं । ऐसी गोपीभाव की कुछ और साधिकाएं धर्मकार्य के लिए प्रशिक्षित (तैयार) हो रही हैं ।

(साधको, हमें भी अपने में गोपीभाव बढाकर राष्ट्र और धर्म कार्य के लिए तत्पर होना चाहिए !)

सनातन संस्था की गोपीभाववाली साधिकाएं भी अब समष्टि साधना करने लगी हैं । आयु में छोटी, शिक्षित न होने पर भी और समष्टि का अनुभव न होने पर भी श्रीकृष्ण की कृपा से वे अच्छी साधना करने लगी हैं । ऐसी गोपीभाव की कुछ और साधिकाएं धर्मकार्य के लिए प्रशिक्षित होने लगी हैं ।

गोपियों समान निरंतर भक्तिरत रहना साधना का अंतिम चरण नहीं है । यह केवल व्यष्टि साधना का एक चरण साध्य करने समान है ।

भगवान के प्रती सतत कृतज्ञता कैसे अनुभव करें ?

१. ‘कृतज्ञता अर्थात क्या ? सतत भगवान का स्मरण करना, किसी भी क्षण अनुसंधान टूटने न देना, यही कृतज्ञता है । भगवान को प्रत्येक कर्म में देखना अर्थात कृतज्ञता । इसके लिए हमें आपनी दृष्टी बदलनी चाहिए ।

२. ‘हे भगवान, मुझे सतत अपने स्मरण में रखें,’ ऐसी कृतज्ञता भगवान के प्रति सतत व्यक्त करें ।’

– (परात्पर गुरु) पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (८.२.२०१७)