ईश्वरप्राप्ति के लिए हर युग में विविध उपासना बताई गई है । ‘कलियुग में नाम ही आधार है’, ऐसे संतों ने बताया है । इसका अर्थ है कि कलियुग में नामजप ही श्रेष्ठ साधना है । नामजप का संस्कार मन पर होने के लिए बडे आवाज में (वैखरी में) करना लाभदायी होता है । भगवान के नामजप अर्थात शब्द के साथ उसका रूप, रस, स्पर्श, गंध तथा शक्ती भी होती है । इसलिए नामजप का उच्चारण उचित पद्धति से करना महत्त्वपूर्ण है ।
देवी का नामजप आगे दिएनुसार करें – ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’
‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ यह नामजप सात्त्विक पद्धति से कैसे करें, यह सुनेंगे ।
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