परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के विषय में जगद्गुरुपद के सन्तों के गौरवोद्गार !

पूर्वाम्नाय श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्‍चलानंदसरस्वती, श्रीगोवर्द्धनमठ-पुरीपीठाधीश्‍वर, ओडिशा

प.पू. डॉ. आठवलेजी सत्त्वशील, त्यागी और महान पुरुष है । उनका कार्य आदि शंकराचार्यजी के कार्य समान है ! – (सितम्बर २०१३ में पू. (डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी से बोलते समय व्यक्त उद्गार)

 

जगद्गुरु श्री शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती, कांची कामकोटी, तमिलनाडु

प्रत्येक युग में देवासुर युद्ध होता है । इस युग में सनातन संस्था प.पू. डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में युद्ध कर रही है ।

 

जगद्गुरु शंकराचार्य विद्याशंकरभारती, करवीर पीठ, कोल्हापुर, महाराष्ट्र

प.पू. डॉ. आठवलेजी का कार्य जनहित और राष्ट्रहित में है । इससे हिन्दू धर्म की ग्लानि निश्‍चितरूप से दूर होगी और ‘सनातन धर्मानुसार आचरण करें’ ऐसा जनता को लगेगा और तद्नुसार निश्‍चितरूप से वह अपना आचरण सुधारेगीे ।

सन्दर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीके सर्वांगीण कार्यका संक्षिप्त परिचय’

 

जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी, रामानंदाचार्य दक्षिण पीठ, नाणीजधाम (रत्नागिरी)

१. समाजमें अन्य साधु-सन्तोंद्वारा किए जा रहे कार्य की अपेक्षा अनेक गुना महान कार्य प.पू. डॉ. आठवलेजी कर रहे हैं । – जगद्गुरु नरेंद्राचार्यजी महाराज, नाणीज, जनपद रत्नागिरी, महाराष्ट्र. (साप्ताहिक सनातन प्रभात, २००७)

२. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी अवतारी पुरुष हैं !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी) का कार्य असाधारण है । भगवान ने उन्हें पृथ्वी पर एक विशेष उद्देश्य से भेजा है । वे अवतारी पुरुष हैं । सनातन संस्था विश्वशांति के लिए कार्य कर रही है । सनातन के साधक अत्यंत भाग्यशाली हैं कि उन्हें परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे सद्गुरु प्राप्त हुए हैं । इस आश्रम में साधक सद्गुरु के मार्गदर्शन में अपना आत्ममूल्यांकन कर रहे हैं । गुरु के बिना आत्मसाक्षात्कार संभव नहीं है, किंतु सनातन आश्रम में गुरु के मार्गदर्शन में आत्मसाक्षात्कार के लिए साधना चल रही है । गुरु-कृपा के संरक्षण में रज-तम का नाश कर सात्त्विकता बढाने के लिए साधक निरंतर प्रयत्नशील हैं । रामानंदाचार्य दक्षिण पीठ, नाणीजधाम (रत्नागिरी) के जगद्गुरु श्री रामानंदाचार्य नरेंद्राचार्यजी १३.७.२०२६ को जब रामनाथी, गोवा स्थित सनातन आश्रम में पधारे थे तब उन्होंने सनातन के साधकों को मार्गदर्शन करते समय ऐसा कहा ।

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